मेरी लघुकथा :अधूरी रोटी
अधूरी रोटी /सुधा भार्गव
मैंने उसकी नन्ही-सी हथेली पर चवन्नी धरी और निश्चिंत हो गई। लेकिन वह तो सुबकते लगा , "मैं तो भूखा ही रह जाऊँगा।"
दूसरे दिन मैंने उसकी हथेली पर चार रोटियाँ रख दीं।हताश-सा बोला, "इससे मेरी भूख तो मिट जाएगी पर बाप की भूख का क्या होगा!। उसे शराब की भूख लगी है।"
शराब के नाम से मेरा क्रोध उमड़ आया। मैं तड़पकर बोली, "कोई एक तो भूखा रहेगा ही।" "मैं भूख बर्दाश्त कर सकता हूँ, उसकी मार नहीं।" वह फिर सुबकने लगा।
यंत्रवत मेरे हाथ पर्स की तरफ बढ़ ही गए।
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मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि इंसान को सोचने और बदलने की प्रेरणा भी देता है। आपके शब्दों में अनुभव और ईमानदारी दोनों दिखते हैं। मुझे खास बात यह लगी कि आप बड़ी बातों को भी बहुत सहज तरीके से रखते हैं।
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