हिन्दी साहित्य एक विशाल समुद्र है जिसकी हर लहर एक शुभ्र विधा है | जब यह लहर सहज व सार्थकता के सांचे में ढली हृदय के कोने सौन्दर्य देखते ही बनता है
| इसी को ध्यान में रखते हुए इस ब्लॉग का आरम्भ किया है | इसका सदैव प्रयास रहेगा स्वस्थ , अर्थयुक्त और उद्देश्य पूर्ण सृजन |
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
एक प्रयास
तूलिकासदन में मैंने तूलिका चलाकर उसे संतुष्ट करने का छोटा सा प्रयास किया है मगर संतोष कहाँ !इसकी रचनाएँ स्वरचित एवं प्रकाशित हैं |अपना अमूल्य समय देकर अनेक मित्रों ने इसका अवलोकन किया है I आशा है भविष्य में भी इसी प्रकार का सहयोग मिलता रहेगा I २०१० में पहली बार कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूं Iसुधी पाठक अवश्य साहित्य की इस विधा में रूचि लेंगे I
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
लघुकथा
गुमसुम -- सुधा भार्गव

चार वर्ष का नन्हा टोडी- ''माँ का दुलारा ,बाबा का प्यारा ,बहन का निराला राजा भैया I''
पॉँच वर्ष का होते ही वह स्कूल जाने लगा i तब से ये सारे विशेषण छू-मंतर हो गये i स्कूल जाते समय माँ हिदायत देती -कायदे से रहना i नन्हा समझ न पाया -कायदा किसे कहते हैं i
बाबा बोले ,''ज्यादा बातें न करना I '' नन्हा अचकचा गया ,बाबा को क्या हो गया है i
मेरी बातें सुनकर हँसते थे ,गले लगाते थे ;वे ही कह रहे हैं --चुप रहना I
स्कूल का प्रथम दिन था बच्चे धीरे -धीरे स्कूल के प्रांगण में कदम रख रहे थे I कक्षा में वे कुछ देर खामोश रहे नजरें ऊपर उठीं I एक दूसरे से टकराईं I चेहरों पर धूप सी फैल गयी I कक्षा में मैडम के घुसते ही बच्चे अपनी जगह खड़े हो गये I चहलकदमी ,चहचाहट से मैडम के माथे पर बल पड़ गये I नन्हा टोडी मन ही मन दोहराने लगा --बातें नहीं करना है , कायदे से रहना है I
दो बच्चों ने एक दूसरे को देखा साथ -साथ मुस्काने लगे मैडम को उनकी भोली मुस्कान काँटे सी चुभ गयी मैडम ने उनमें से एक का कान उमेठ दिया ,दूसरे को मुर्गा बना दिया --''अब भूल जाओगे सारी शैतानी i ''
नन्हें टोडी के दिमाग ने फिर ढूँढना शुरू कर दिया --यह शैतानी क्या होती है ?क्या हँसने को- - - - शैतानी कहते हैं ?वह गुमसुम हो गया I
वह घर पहुंचा तो शरीर कम मन ज्यादा थक चुका था I घर आकर उसने राहत की साँस ली I ''बेटा ,थक गए होगे खाना खाकर सो जाओ ''माँ ने कहा I
''माँ आज मैं नहीं सोऊंगा ,आप सो जाओ ''कहकर वह अपने खिलौनों में उलझकर मन की थकान मिटाने लगा I''
''उफ !क्या खटपट कर रहा है ?मुझे सोने दे और तू भी सो जा ;वर्ना तेरी मैडम से कह दूंगी I''
'' यह मैडम ,माँ और मेरे बीच कहाँ से आ टपकी !''नन्हे को दिखाई देने लगा वह लड़का जिसका मैडम ने कान मरोड़ा था I वह डर गया I
नन्हा टोडी स्कूल जाता रहा ,पर सहमा -सहमा I अब कक्षा में एकदम चुप रहने लगा I मैडम ने पूछा-''पांच फलों के नाम बताओ ?''और उसकी तरफ इशारा किया ,''तुम हमेशा चुप बैठे रहते हो खड़े होकर बताओ I''
नन्हा टोडी जनता था ;मगर मैडम की घुड़की से हकलाने लगा I
मैडम ने उसकी डायरी उठाई और उसमें लिखा ,''आपका बच्चा बहुत सुस्त है ,बहुत गुमसुम रहता है I हकलाता भी है I तुरंत किसी अच्छे डाक्टर को दिखाइये I
चित्रांकन -सुधा भार्गव

चार वर्ष का नन्हा टोडी- ''माँ का दुलारा ,बाबा का प्यारा ,बहन का निराला राजा भैया I''
पॉँच वर्ष का होते ही वह स्कूल जाने लगा i तब से ये सारे विशेषण छू-मंतर हो गये i स्कूल जाते समय माँ हिदायत देती -कायदे से रहना i नन्हा समझ न पाया -कायदा किसे कहते हैं i
बाबा बोले ,''ज्यादा बातें न करना I '' नन्हा अचकचा गया ,बाबा को क्या हो गया है i
मेरी बातें सुनकर हँसते थे ,गले लगाते थे ;वे ही कह रहे हैं --चुप रहना I
स्कूल का प्रथम दिन था बच्चे धीरे -धीरे स्कूल के प्रांगण में कदम रख रहे थे I कक्षा में वे कुछ देर खामोश रहे नजरें ऊपर उठीं I एक दूसरे से टकराईं I चेहरों पर धूप सी फैल गयी I कक्षा में मैडम के घुसते ही बच्चे अपनी जगह खड़े हो गये I चहलकदमी ,चहचाहट से मैडम के माथे पर बल पड़ गये I नन्हा टोडी मन ही मन दोहराने लगा --बातें नहीं करना है , कायदे से रहना है I
दो बच्चों ने एक दूसरे को देखा साथ -साथ मुस्काने लगे मैडम को उनकी भोली मुस्कान काँटे सी चुभ गयी मैडम ने उनमें से एक का कान उमेठ दिया ,दूसरे को मुर्गा बना दिया --''अब भूल जाओगे सारी शैतानी i ''
नन्हें टोडी के दिमाग ने फिर ढूँढना शुरू कर दिया --यह शैतानी क्या होती है ?क्या हँसने को- - - - शैतानी कहते हैं ?वह गुमसुम हो गया I
वह घर पहुंचा तो शरीर कम मन ज्यादा थक चुका था I घर आकर उसने राहत की साँस ली I ''बेटा ,थक गए होगे खाना खाकर सो जाओ ''माँ ने कहा I
''माँ आज मैं नहीं सोऊंगा ,आप सो जाओ ''कहकर वह अपने खिलौनों में उलझकर मन की थकान मिटाने लगा I''
''उफ !क्या खटपट कर रहा है ?मुझे सोने दे और तू भी सो जा ;वर्ना तेरी मैडम से कह दूंगी I''
'' यह मैडम ,माँ और मेरे बीच कहाँ से आ टपकी !''नन्हे को दिखाई देने लगा वह लड़का जिसका मैडम ने कान मरोड़ा था I वह डर गया I
नन्हा टोडी स्कूल जाता रहा ,पर सहमा -सहमा I अब कक्षा में एकदम चुप रहने लगा I मैडम ने पूछा-''पांच फलों के नाम बताओ ?''और उसकी तरफ इशारा किया ,''तुम हमेशा चुप बैठे रहते हो खड़े होकर बताओ I''
नन्हा टोडी जनता था ;मगर मैडम की घुड़की से हकलाने लगा I
मैडम ने उसकी डायरी उठाई और उसमें लिखा ,''आपका बच्चा बहुत सुस्त है ,बहुत गुमसुम रहता है I हकलाता भी है I तुरंत किसी अच्छे डाक्टर को दिखाइये I
चित्रांकन -सुधा भार्गव
सोमवार, 21 सितंबर 2009
मेरी पहली लघुकथा
शेरनी हार चुकी थी
कुछ समय बाद वह उठा !छमिया के छोड़े कपड़े कूट- कूट कर सुखाये !रसोई साफ की और चाय बनाकर आवाज लगाई--
'अरी उठ ,चाय पी ले !देर होने से मालकिन खफा होगी !'
'सोने दे ,देह दुःख रही है !'
'ला दबा दूँ !'
'बस रहने दे !ला चाय दे दे !अरे राम ,बड़ी गरम चाय है ,ले आधी तू पी ले!'
'ला ,यह तो अमृत है !'
'बस रहने दे ,तुझे तो सारे दिन रासलीला ही सूझे है !'
किसनू का मुहँ छोटा सा हो गया और चल दिया छुन्नू के रोने की आवाज सुनकर !
छमिया के नाम पर ही तो उसने अपने बेटे का नाम रखा ताकि उसको बुलाते समय छमिया के नाम का संगीत गूजें! दूध की बोतल उसके मुंह से लगा दी !छमिया ने देखा तो संतोष से उसकी आँखें चमकने लगीं !किसनू पर प्यार आया पर छमिया का स्वार्थ साफ झलक रहा था !किसनू उसकी औलाद की इतनी देखभाल न करता तो उसे कभी का छोड़ कर भाग जाती ।
उस दिन अँधेरा जल्दी हो गया ,बादलों में बरसने की होड़ लगी थी !किसनू को चैन कहाँ ,--आँखे दरवाजे की तरफ ही लगीं थीं !हांफते हुए छमिया घर में घुसी ,ऊपर से नीचे तक भीगी ! किसनू की आँखें उस पर टिकी की टिकी रह गईं !छमिया अनदेखा करती आगे बढ़ गई । अपने बच्चे की ओर देखा और उसे चूमने लगी। किसनू एक मिनट सहता रहा ,अपने को काबू में न रख सका । बलिष्ट भुजाओं में उसे जकड़ कर यौवन की चिंगारी प्रज्जवलित कर ही दी !छमिया को इस अचानक हमले की आशा न थी । निढाल होकर बोली --'तू तो सारे दिन खटिया तोड़े है और रात को मेरी हड्डियाँ !'
शांत रहने वाले किसनू को उसकी बात गहरी चुभन दे गई !उसका पौरुष जाग उठा -
'कल से मैं दो घंटे सुबह दो घंटे शाम बाहर जाया करूँगा। '
'काहे ?
'काम करने !'
'तुझे तो साल में दो महीने ही राजगिरी का काम मिले है !बरसात में भला कहाँ काम ?
'करने को बहुत काम !रिक्शा चलाऊंगा ,बोझ उठाऊंगा ,नहीं तो किसी होटल में बरतन ही माँज लूँगा !काम करने में काहे की शर्म। '
'काम पर कैसे जाऊँगी ?'
'मैं क्या जानूँ ,तुझे तो मुझसे बहुत शिकायत रहत है !अब तू ही सोच के सुबह बता दीजो ,मुझे क्या करना है !'
'उसे विचारों के भंवर में छोड़ करवट बदलकर किसनू सो गया पर छमिया की आँखों में नींद कहाँ ? शेरनी हार चुकी थी।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
लघुकथा -फसल/एक टके में बारह
लघुकथा तो एक ऐसी सरिता है जिसे शीघ्रता से बहकर समुन्द्र में मिलना होता है !

फसल
'क्या कर रहे हो ?'
'अर्से से बीज बोने की कोशिश कर रहा हूँ पर एक भी अंकु र नहीं फूटा !'
लगता है बंजर है !'
'ठीक से खाद नहीं दी होगी !'
'दी थी । '
'कम दी होगी ,फिर सींचना भी जरूरी है । '
वह तन कर खड़ाहो गया !पत्थरों को रोकने के लिए ह्रदय कपाट बंद किये !प्यार
से सींचता हुआ देता रहा उसमें दिमागी रोशनाई की खाद !
उसमें ऐसा डूबा कि अंकुरों की बाढ़ आ गयी और दोस्ती की फसल लहलहा उठी !
* * * * *
लघुकथा
एक टके में बारह
सरोजा का मन आज घूमने में नहीं लगा मन खिन्न जो हो उठा था।
उठते ही पुलकायमान हो विशेष जन्मदिन की गुनगुनी धूप में वह सिर से पैर तक नहा चुकी थी !और इस् अवसर पर हंसनी की तरह मोंती ही मोती चुगना चाहती थी इसीलिए तो घूमने के लिए तैयार हुई तो अपने पति का इंतजार करने लगी ! वैसे तो दोनों ने नियम बना रखा था -----
-सुबह उठकर बिना एक दूसरे की प्रतीक्षा किये घूमने निकल जाना ताकि सुखद
बेला के साहचर्य से बंचित न होना पड़े !लेकिन आज वह सोचने बैठ गई ! अपनी विचारधारा
में बहने लगी --
कौशल के साथ ही घूमने जाऊँगी !अकेला जाना मुझे अच्छा नहीं लगता ,उन्होंने
कितने प्यार से मुबारक बाद दी है ! क्या मैं ५ मिनट इंतजार नहीं कर सकती . पल में ही बालू का टीला ढह गया और उसकी जगह हरे -भरे उद्यान ने ले ली !
उस दिन कौशल को तैयार होने में समय लग रहा था गत रात सोने में काफी विलंब हो गया
उस दिन कौशल को तैयार होने में समय लग रहा था गत रात सोने में काफी विलंब हो गया
था !सरोजा ने हँसकर कहा --'देखिए मैं आपका इन्तजार कर रही हूँ । मेरी जैसी कोई मिलेगी
,भी नहीं !'
'कौशल ने तपाक से कहा --'एक टके में बारह मिलेंगी !'
सरोजा अवाक !इन्द्र धनुषी निखार गायब होकर उसके मुखड़े को स्याह कर गया !अस्फुट स्वर में बुदबुदाई -'ऐसा नहीं कहना था -----!'
कौशल के लिए 'आप ' शब्द का प्रयोग करने में भी उसे शर्म आ रही थी !
वह तुंरत कुर्सी से उठी और तेजी से पार्क की ओर कदम बढा दिये !विचारों के झंझावत में निश्चय नहीं कर पा रही थी कि कब तक ----------?
पुरुष नारी को अपमानित करके उसे हीन समझता रहेगा !
चित्रांकन -सुधा भार्गव
* * * * *
,भी नहीं !'
'कौशल ने तपाक से कहा --'एक टके में बारह मिलेंगी !'
सरोजा अवाक !इन्द्र धनुषी निखार गायब होकर उसके मुखड़े को स्याह कर गया !अस्फुट स्वर में बुदबुदाई -'ऐसा नहीं कहना था -----!'
कौशल के लिए 'आप ' शब्द का प्रयोग करने में भी उसे शर्म आ रही थी !
वह तुंरत कुर्सी से उठी और तेजी से पार्क की ओर कदम बढा दिये !विचारों के झंझावत में निश्चय नहीं कर पा रही थी कि कब तक ----------?
पुरुष नारी को अपमानित करके उसे हीन समझता रहेगा !
चित्रांकन -सुधा भार्गव
* * * * *
बुधवार, 16 सितंबर 2009
लघुकथा -पहली रात
लघुकथा वह जो सीधी दिल में उतर जाए !
पहली रात

बंसी बिहार का रहनेवाला गबरू जवान है !
गाँव के मुखिया का चौकीदार होते हुए
भी उसके लड़के से बंसी का याराना है !
पिछले हफ्ते ही तो बंसी की शादी रनिया
से हुई है ! सुना है मुंह दिखाई में मुखिया
की हवेली से उसे एक सोने का हार और
सितारों जड़ी सुन्दर सी साड़ी मिली !यह
भी कहा गया -पहली रात वह यही हार
और रेशमी साड़ी पहनेगी !अब इसे हुक्म
समझो या अपनापन !
विवाह के बाद रमिया पहली बार मायके
गई !बंसी मालिक की खिदमत में रहा !
रमिया की सहेलियों ने उसे घेर लिया
और चुहलबाजी करने लगीं --बतारी,
जीजा जी कैसे हैं ? वे तुझसे क्या बोले ? प्रश्नों की
झड़ी ने उसकी छिपी वेदना पर अंगारे
रख दिए !सिसकियों के बीच उसके
मुंह से निकल गया --'पहली रात मुखिया
के लड़के के साथ सोयी थी !'
* * *
शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
लघुकथा -2
मर्म स्थल को स्पर्श करती है लघुकथा |
लक्ष्मी
चकोरी दूसरी बार गर्भवती हुई तो फुलवा फूला न समाया !ज्यों -ज्यों प्रसवकाल समीप आता गया फुलवा हवा में उड़ने लगा मगर चकोरी की नींद गायब हो गई !
-पूछ बैठी --पिछली बार नन्ही सी जान का गला घोंट दिया था !
!इस बार उसने ही दोबारा जन्म ले लिया तो तुम क्या करोगे ?
'करूँगा क्या !छाती से लगाकर रखूँगा !अब तो वह लक्ष्मी होगी !देख तो -----इस अखबार में लिखा है ---अगर कन्या हुई तो उसके जन्म के समय .,फिर थोडा बड़े होने पर और फिर शादीके समय सरकार अच्छी -खासी रकम देगी !तीन -तीन बार !वाह री किस्मत !
सोच रहा हूँ -मैं भी देसी की जगह विलायती दारू पीने लगूं!'
* * * * * * *
||२|| कहाँ जायेगी ?
दादी के समय से घंटी घर का चौका -बर्तन किया करती थी !हम उसे काकी कहा करते थे !वह बहुत मेहनती थी !जिन दिनों घर में नल नहीं था ,वह तीन -तीन मटके अपने सिर पर रखती और उन्हें दूसरी मंजिल पर पहुंचाती ! पिताजी को दो साल का छोड़कर दादी परलोक सिधार गई ! उन्हें रोता देखकर काकी सीने से लगा दुखी हो उठती !
वह बतियाती जाती और अपना काम भी करती जाती !पिताजी की शादी होते -होते वह काफी बुढा गई ! आँखों से भी कम दिखाई देता !उसके साफ किये बर्तनों को देखकर नाक -भौं सकोड्ती रहती मैं !
गिलास सूंघती -'बदबू ' कहकर पटक देती !माँ उससे कुछ नहीं कहतीं !मेरी बाल बुद्धि में यह नहीं आता था --जब काकी ठीक से काम नहीं कर सकती तो इसे रख क्यों छोड़ा है !
'एक दिन मैंने कहा दिया -'काकी ,तेरे सारे बर्तनों में राख लगी है ! ठीक से धो !'
'क्या कहा !तेरे बाप की हिम्मत नहीं कि कुछ कहे और तू दो दिन की छोकरी मिजाज दिखावे है !'
इतने में पिता जी न जाने कहाँ से आ धमके!मैं भागने लगी !
वे मुस्काते बोले -गन्दगी तो साफ की जा सकती है ,काकी ने तो अपनी जवानी इस घर की सेवा में गुजार दी,बुढ़ापे में कहाँ जायेगी ?'
***
लक्ष्मी
चकोरी दूसरी बार गर्भवती हुई तो फुलवा फूला न समाया !ज्यों -ज्यों प्रसवकाल समीप आता गया फुलवा हवा में उड़ने लगा मगर चकोरी की नींद गायब हो गई !
-पूछ बैठी --पिछली बार नन्ही सी जान का गला घोंट दिया था ! !इस बार उसने ही दोबारा जन्म ले लिया तो तुम क्या करोगे ?
'करूँगा क्या !छाती से लगाकर रखूँगा !अब तो वह लक्ष्मी होगी !देख तो -----इस अखबार में लिखा है ---अगर कन्या हुई तो उसके जन्म के समय .,फिर थोडा बड़े होने पर और फिर शादीके समय सरकार अच्छी -खासी रकम देगी !तीन -तीन बार !वाह री किस्मत !
सोच रहा हूँ -मैं भी देसी की जगह विलायती दारू पीने लगूं!'
* * * * * * *
||२|| कहाँ जायेगी ?
दादी के समय से घंटी घर का चौका -बर्तन किया करती थी !हम उसे काकी कहा करते थे !वह बहुत मेहनती थी !जिन दिनों घर में नल नहीं था ,वह तीन -तीन मटके अपने सिर पर रखती और उन्हें दूसरी मंजिल पर पहुंचाती ! पिताजी को दो साल का छोड़कर दादी परलोक सिधार गई ! उन्हें रोता देखकर काकी सीने से लगा दुखी हो उठती !वह बतियाती जाती और अपना काम भी करती जाती !पिताजी की शादी होते -होते वह काफी बुढा गई ! आँखों से भी कम दिखाई देता !उसके साफ किये बर्तनों को देखकर नाक -भौं सकोड्ती रहती मैं !
गिलास सूंघती -'बदबू ' कहकर पटक देती !माँ उससे कुछ नहीं कहतीं !मेरी बाल बुद्धि में यह नहीं आता था --जब काकी ठीक से काम नहीं कर सकती तो इसे रख क्यों छोड़ा है !
'एक दिन मैंने कहा दिया -'काकी ,तेरे सारे बर्तनों में राख लगी है ! ठीक से धो !'
'क्या कहा !तेरे बाप की हिम्मत नहीं कि कुछ कहे और तू दो दिन की छोकरी मिजाज दिखावे है !'
इतने में पिता जी न जाने कहाँ से आ धमके!मैं भागने लगी !
वे मुस्काते बोले -गन्दगी तो साफ की जा सकती है ,काकी ने तो अपनी जवानी इस घर की सेवा में गुजार दी,बुढ़ापे में कहाँ जायेगी ?'
***
एक पुरूष

||पुरुष ||
एक नर्स ने पोलियो ड्राप्स देने को दरवाजा खटखटाया !अंक में बच्चे को छिपाए बुढ़िया ने दरवाजा खोला ! तेजी से बोली -'चले जाओ !हम बच्चे को ड्राप्स नहीं दिलवा सकते !'
'लेकिन यह तो पूरा कंकाल है !इलाज तो करना ही होगा !'नर्स सकते में आ गयी थी !
'इलाज तो क्या ,हम एक बूंद दूध भी नहीं पिला सकते इस बदनसीब को जबकि चार -चार भैसें खूंटे से बंधी खड़ी हैं !''
'मगर ऐसा क्यों ?'
'इसके बाप ने मना किया है !माँ -बाप का तलाक़ हो चुका है! सारा गुस्सा इस निर्बोध पर निकलता है !
'फिर इसे अपने पास नहीं रखना चाहिए !'
'तो क्या सांपिन को दे दूँ "!
'उसने मुझे दंश दिया ,मैं उसे तिल -तिल मारूंगा !यह सिसकेगा तो वह भी सिसकेगी !मेरे कलेजे को कुछ तो ठंडक मिलेगी !'एक युवक पागल सा कमरे से निकलकर दहाड़ने लगा !
'यह मासूम तो प्रगाढ़ता और प्यार का प्रतीक है !इसे तुम दुनिया में लाए हो !पिता होने के नाते उचित रूप से इसका पालन करो !'
'खूब कहा मैडम आपने तो !इसे पालू और अपना वारिस बना दूँ !सांपिन का बच्चा संपोला ही निकलेगा !इसे मरना होगा !'
'कैसे बाप हो तुम !नर्स ने भौंह तिरछी की !'
'बाप !किसने कहा मैं इसका बाप हूँ !इसकी माँ को जरुर जानता हूँ !'
'तब तुम कौन हो ?'
'एक प्रताडित पुरुष !'
***
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