वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

मेरी दो लघुकथाएं


 अप्रैल अंक 2022 में प्रकाशित

सुधा भार्गव  

 

   1-वात्सल्य की हिलोरें

सोहर गाई जा रही थी । सोहर गीत पीड़ा और  आनंद के खट्टे -मीठे अनुभवों से लबालब भरे हुये थे। जच्चा बनी वह बिस्तर पर लेटे प्रसव की पीड़ा को भुला मातृत्व के अनोखे आनंद  में डूबी हुई थी। बधाइयों का ताँता लगा हुआ था। बच्चे के पैदा होते ही घर में खुशियों की भरमार जो हो  गई थी। । अचानक घर से बाहर तालियों की थाप  पर बहुत से स्वर गूंज उठे। 'अम्मा तेरा बच्चा बना रहे। तेरे आँगन में फूल खिलें । हाय हाय कितनी देर  हो गई बालक कू तो दिखा दे । नहीं तो घर में ही घुस जाएँगे । फिर न कहियों हम ऐसे हैं ।' पुन

:वही तालियों की थाप। अंतिम वाक्य  सुनते ही जच्चा काँप उठी। समस्त ज़ोर लगाकर चिल्लाई -"इनको जो चाहिए दे दो। बच्चा तो अभी अभी सोया है।" 

"अइयो रामा तेरे कलेजे का टुकड़ा हमारा भी तो कुछ लगे है।ठप्प ठप्प … चट्ट चट्ट --कैसे छोड़ देंगे अपनी जात के को।" एक बोली  

"ला-- ला हमारी गोद में डाल दे।" दूसरी बोली। 

बच्चे को उठाए लड़खड़ाती जच्चा बाहर आई।  कातर स्वर में बोली-"न न अभी नहीं। कुछ दिन मेरी गोदी में खेलने दो। कितनी मुश्किल से गोद हरी हुई है । इसके बिना  मैं मर जाऊँगी। कैसा भी है मेरा खून है।" 

"माई  बड़ी -बड़ी  बात न कर । क्या तू इसके लिए अपने पूरे समाज से लड़ सकेगी ।"

 "हाँ हाँ क्यों नहीं!। आज तुम अपने अधिकारों की बात करती हो  तो इससे तो इसका अधिकार न छीनो।  माँ -बाप और घर से उसे अलग करके तुम्हें क्या मिलेगा!" 

"अरी प्रधाना तू क्यों चुप है। कुछ बोलतीं क्यों नहीं!  तू तो पढ़ी लिखी है । मेरी समझ में इसकी बात धिल्लाभर ना आ रही। "प्रधाना की साथिन ही हाथ नचाते बोली । 

 प्रधाना दूसरी दुनिया में ही खोई थी । ‘अपने से अलग करते समय माँ ने उसे कितना चूमा चाटा था । आँचल फैलाकर रुक्का बाई से दया की भीख मांगी थी। पर वह न पिघली तो न ही पिघली । माँ की पकड़ से खीचते हुए वह उसे दूर बहुत दूर ले  गई।’उसकी आँखों से दो आँसू चूँ पड़े। 

"अरे किस दुनिया में खो गई।" उसकी साथिन ने झझोड़ते हुए कहा। 

प्रधाना ने चौंक कर जच्चा की ओर देखा । वह एक माँ की तड़पन देख चुकी थी। एक और माँ को बिलखता देखने की शक्ति उसमें  नहीं थी। 

उसने एक पल गोद में लिए जच्चा को ऊपर से नीचे तक देखा।   फिर दृढ़ता से बोली-‘हम  यहाँ बच्चे को  आशीर्वाद देने आए हैं उसे लेने नहीं।’  


2-धन्ना सेठ

 

      “ आज पहला लॉक डाउन ख़तम होने  वाला था।पर उससे  पहले ही दूसरे  लॉक डाउन की घोषणा हो गई है।यह तो ३ मई तक चलेगा ।”

      “हाँ सिम्मी , पिछले महीने का पैसा तो बाई को दे दिया है ।उसने तो १९ तारीख  तक ही  काम किया था  पर  पप्पू के पापा तो इतने रहम दिल हैं कि क्या बताऊँ !बोले- पूरे माह का ही दे दो। सो भइया  10 दिन  का  ज्यादा ही उसे मिल गया ।लेकिन इस माह तो पूरे महीने काम पर बाई नहीं  आएगी सो उसे तनख्वाह देने की कोई तुक ही नहीं ।”

     “लेकिन बाई का तो कोई कसूर  नहीं ।चाहकर  भी न आ सकी ।”

    “भई मैं तो सब काम नियम -कायदे से  करती हूँ।”

     “शकीला ,कभी -कभी मानवीयता की खातिर नियम- कायदे ताक पर रखने  पड़ते हैं ।२-3 हजार देने से न तुझे कोई कमी होगी न घर भरेगा पर बाई के बच्चों का पेट भर जाएगा ।उनके चेहरे एक बारगी  खिल उठेंगे ।”

       “मैंने क्या उसके पूरे कुनबे  का ठेका ले रखा है!”शकीला चिढ़  सी गई। 

     “ऐसी ही बात समझ।  साल- साल  बाई हमारे काम करती है । एक दिन न आएं तो कितनी परेशानी हो जाती है । फिर उनकी  परेशानी  में हम काम क्यों न आएं ।यह तो फर्ज बनता है ।”

     “फर्ज तो तभी निभाया जाता  है जब  किसी की औकात हो ।तुम्हारा क्या! तुम तो सिठानी हो--- दो-दो होटल चलते  हैं ।”

    “ लोकडाउन में होटल तो बंद हैं।  पर दो कर्मचारियों के रहने और खाने-पीने  की व्यवस्था होटल  में  कर दी है। वक्त -बेवक्त  शायद वे काम आ जाएँ ।”

    “तो हुआ क्या फायदा उनसे--- तुम्हारे घर तो खाना बनाकर ला नहीं सकते ।बाहर निकलने पर भी तो पाबंदी है।” 

     “फायदे की न पूछ --इतना फायदा हो रहा है--- इतनी संतुष्टि मिल रही है कि कह नहीं सकती ! प्रवासी मजदूरों के तो खाने के लाले ही पड़  गए हैं ।नौकरी जो छूट गई !उनके कष्टों को सोच-सोच कर तो मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं ।मेरे  दोनों कर्मचारी १०० के करीब मजदूरों को  दोनों वक्त  का खाना बनाकर खिलाते  हैं । सोच तो कितनी दुआएं देते होंगे ।”

     “भगवान् जाने दुआएं देते होंगे भी! पर  यह तो वही बात हुई आ बैल तू मुझे  मार । पैसा तो आपदा में सोच-समझ कर ही खर्च करना होगा। सुनते हैं कोरोना  दानव से निबटने के लिए सरकार को बड़ी -बड़ी फैक्ट्रियों के मालिकों से मदद चाहिए । मालिक भी अपने कर्मचारियों की जेब में ही सेंध लगाएंगे।  कहने को तो  पप्पू के पापा  बड़ी सी फैक्टरी के मैनेजर हैं ,पर उनकी  जेब  पर भी न  जाने कब छापा पड़  जाये ।ऐसे में तो बाई की तनख्वाह देने का सवाल ही नहीं उठता ।तेरा क्या तू तो धन्ना सेठ है ।तुझे ही दान-पुण्य का काम मुबारक हो । 

     “दान पुण्य के लिए धन्ना सेठ होना जरूरी नहीं शकीला --इसका सम्बन्ध तो दिल की अमीरी से है ।”

समाप्त 





 



 





शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

समीक्षा


"टकराती रेत" लघुकथा संग्रह की समीक्षा 

                     डॉ मंजू रानी गुप्ता 

 मैं डाॅ• मंजु रानी गुप्ता की बहुत शुक्रगुजार हूँ। अभी हाल में ही उन्होंने मेरे लघुकथा संग्रह -टकराती रेत 'की समीक्षा लिखकर भेजी है। जो मेरे लिए एक आश्चर्य से कम न था। मैंने उनको यह संग्रह भेजा भी न था। पर उन्होंने मेरे ब्लॉग तूलिकासदन से इस संग्रह की लघुकथाओं को बड़ी  मेहनत से एकत्र किया व उनका अवलोकन कर अति  बारीकी से विश्लेषण  किया है । उनका बार बार - धन्यवाद । 

मंजु जी ने 1971 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम• ए• की परीक्षा उत्तीर्ण कर,1975 में " प्रेमचंद कथा साहित्य में सामाजिक जीवन " शोधग्रंथ पर पी•एच• डी• की उपाधि प्राप्त की ।रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज क़लक़त्ते में एसोसियेट प्रोफ़ेसर तथा विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहीं ।
आकाशवाणी कोलकाता तथा दूरदर्शन पर आपके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,लेख एवं कविताओं का भी भरपूर प्रकाशन होता रहता है। आजकल महिलाओं की संस्था "साहित्यिकी" से संबद्ध हैं। कुछ वर्षों तक" साहित्यिकी " पत्रिका का संपादन कार्य वहन किया। संप्रति- वे साहित्य लेखन से जुड़ी हुई हैं ।


" टकराती रेत"
श्रीमती सुधा भार्गव
समीक्षा- मंजु रानी गुप्ता


" टकराती रेत " श्रीमती सुधा भार्गव का एक ऐसा लघु कथा संग्रह है, जो समकालीन होते हुए भी आधुनिक है ।यहाँ स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि समकालीन शब्द कालबोधक है जब कि आधुनिक शब्द मूल्यबोधक भी।कथाएँ स्वतःस्फूर्त हैं और इनका उद्देश्य यथार्थ का उद्घाटन कर जनचेतना को जगाना है ।कथाएँ गहरी संवेदना व व्यापक सहानुभूति से युक्त हैं तथा लेखिका की निरीक्षण शक्ति का परिचय देती हैं ।संग्रह की प्रथम कथा " कीमत " विदेश में रहनेवाले बेटे की संवेदनहीनता को अभिव्यक्ति देती है, जो प्यार से भेजी गई मिठाई की कीमत नहीं समझता ।
कतिपय कथाएँ उन प्रवासी परिवारों की मानसिकता को व्यक्त करती हैं, जो विदेश में रहकर भी अपनी संस्कृति और सभ्यता से जुड़े हुए हैं।
समकालीन रचनाकार का कर्म है कि वह सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक संकट की स्थिति को दर्शाए और व्यक्ति को इनसे लड़ने की हिम्मत दे ।'बंद ताले कथा, विवाह हेतु आए बारातियों की मानसिकता का यथार्थ चित्रण करते हुए, उनके दिमाग के बंद ताले खोलती है ।' दूध का कर्ज ' कथा लिंग भेद करनेवालों पर प्रश्न उठाती है ।'सन्नाटे की रेखाएं ' मृत्यु के उपरांत किए गए कर्मकांडों पर प्रहार करती है।पति की मृत्यु के बाद पत्नी बेहाल है किन्तु उसकी सूनी मांग की ओर किसी का ध्यान नहीं, परिजन तो तेरहवीं के निमंत्रण में अधिक रुचि रखते हैं।'बंदर का तमाशा ' की निर्धन युवती उन गरीबों का प्रतिनिधित्व करती है जो बच्चों तक का तमाशा बनाने पर वाध्य हैं ।नंग-धड़ंग बालक बंदर की भूमिका में नाचता है और विडंबना यह है कि आम जनता नृत्य का आनंद उठाती है। कथा मौजूदा व्यवस्था की व्यंग्यपूर्ण आलोचना करती है। 'कमाऊ पूत 'का बाँके सब्जी मंडी में सब्जी बेचने जाता है, साथ ही माँ की दी हुई उन पानी की बोतलों को साथ ले जाता है जिन्हें माँ ने जरूरतमंद को जल पिलाने के लिए दिया है किन्तु वह उन बोतलों को बेचकर पैसे कमाता है। यह नई पौध है जो जीविका के लिए पानी भी बेच सकती है, किन्तु बाँके निर्धन है उसके लिए थोड़े पैसे भी बहुत मायने रखते हैं।' होलिका का मंदिर 'में मानव की नैतिकता पर प्रश्न उठाया गया है। धर्म के नाम पर मंदिरों में धन- दौलत चढ़ाए जाते हैं लेकिन जरूरतमंद की मदद करने से लोग कतराते हैं ।
कथाएँ संक्षिप्त और सारगर्भित हैं।लेखिका की सकारात्मक दृष्टि चेतना को ऊर्जा प्रदान करती है।'वह आएगा ' 'महोत्सव ' 'असली हिन्दुस्तान ' ऐसी ही कथाएँ हैं।' ' सूरज निकला 'की दलित माँ बेटे के निराश हृदय में आशा की ज्योति जलाते हुए कहती है कि 'पैंसठ वर्षों बाद सूरज तो निकला।हाँ इसकी रोशनी फैलने में समय जरूर लगेगा।'
आज की नई पीढ़ी अपनों से दूर होती जा रही है 'ससुर जी ' और ' दर्द का संगम' जैसी कथाएँ इसी भाव पर आधारित हैं ।प्रायः युवतियाँ धन- दौलत के लोभ में पड़ कर ससुराल में परिजनों को अपनाने में असमर्थ रहती हैं।'दुनियादारी'कथा सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर्ण है, यहाँ घर- घर खाना बनाने वाली निर्धन स्त्री अपने अथक परिश्रम से परिजनों के लिए घर बनवाने का स्वप्न देखती है किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं,प्यार का प्रकाश है जो निरंतर फैल रहा है।
कथाएँ परिवार और समाज की समस्याओं को उकेरतीं हैं।ये बचपन ,यौवन और वृद्धावस्था की आम समस्याओं से जुड़ी हुई हैं, तथा पाठकों की चेतना को झकझोरती हैं।लेखिका सहज और बोधगम्य भाषा- शैली में अपना कथ्य पाठकों तक पहुँचाती हैं ।
कुल मिलाकर लघु कथाएँ मानवीय सत्य तथा यथार्थ से संम्पृक्त हैं ।
समाप्त 


लघुकथा


संरचना -13,2020 वार्षिकी  में मेरी लघुकथा  'पालना 'प्रकाशित हुई है। इसके संपादक वरिष्ठ लघुकथाकार कमल चोपड़ा जी हैं। उनका बहुत बहुत धन्यवाद 

 लघुकथा -पालना
सुधा भार्गव

        पहली किलकारी सुनने से पहले ही अविनाश ने बच्चे का कमरा तो तैयार करवा दिया था पर किसी कारण वश पालना नहीं ख़रीद पाया । बच्चे को माँ के साथ सोते सवा महीना हो चुका था ।अब वह पालना ख़रीदने को बेचैन हो उठा । बच्चे को अलग सुलाने का वह पक्षपाती था ताकि उसका ठीक से विकास हो सके और स्वस्थ रहे ।
उसने एमोज़ोन पर २-३ पालने पसंद किए । पत्नी को दिखाते हुए बोला -
      “इनमें से कोई एक पसंद कर लो।”
     “बच्चे को अभी अलग सुलाने की ज़रूरत नहीं । मैं इसके बिना नहीं सो सकती ।”उसने रोषभरी आँखों से देखा।
      “फिर उसको अपने कमरे में सोने की आदत कैसे पड़ेगी ?”
      “जब समय आएगा आदत भी पड़ जाएगी ।”रुखाई से बोलकर बच्चे की तरफ़ करवट ले ली।
दाल न गलने पर अविनाश झुकता सा बोला -”ठीक है कुछ दिन और सही पर पालना तो पसंद कर दो और हाँ यह भी बता दो उसका तकिया कैसा होना चाहिए ?”
    “मैं अक्सर थक कर माँ की गोद में सो ज़ाया करती ।बिस्तर पर नींद आती ही नहीं थी। माँ तो बैठे बैठे ही न जाने कब कब में झपकी ले लेती। पर उस समय भी चेतन रहती थी। जिधर भी मैं सिर घुमाती ,माँ उसीके अनुसार घुटनों को हिलाकर गड्ढा बना देती और मेरा सर आराम से उस पर टिका रहता।बस तकिया ऐसा ही होना चाहिए ।जरा भी कुनकुनाती तो माँ अपना एक घुटना हिलाने लगती, मुझे लगता मैं पालने में झोटे खा रही हूँ ।फिर सो जाती। एकदम ऐसा ही तकिये वाला पालना खरीद लाओ। हाँ एक चादर भी तो लानी होगी। ।"
     "चादर कैसी हो --वह भी बता दो।"
     "मैं तो माँ की धोती से लिपट कर ही सो जाया करती थी । उसमें उसकी खुशबू जो आती थी ।" मुंह पर मीठी सी हंसी लाते हुए न जाने वह कहाँ खो गई ।
अविनाश पहले तो असमंजस में था फिर एकाएक हंस पड़ा और चुटकी लेते हुए पूछ ही लिया -
    “पालने में कोई म्यूज़िकल टॉय तो लगाना होगा । कैसा खिलौना लाऊँ?
    “ खिलौना भी ऐसा हो जिसमें से माँ की लोरी सा संगीत सुनाई दे और मेरा चुनमुन झट से सो जाए ।”
अविनाश को अब अपनी पत्नी की बातों में आनंद आने लगा था जिसके तार बेपनाह मोहब्बत से जुड़े हुए थे। उसने एक प्रश्न और दाग दिया
    “अच्छा मैडम ,पालने के ऊपर जाली वाली एक छतरी भी तो लगानी जरूरी है जो हमारे बच्चे को मक्खी -मच्छर से बचाये।”
    “हूँ--- छतरी तो माँ के पल्लू की तरह हो तो ज्यादा अच्छा है जो मक्खी- मच्छर से ही नहीं उसे सर्दी-गरमी और लोगों की काली नजर से भी बचाये।"
     अविनाश ने भरपूर निगाहों से पत्नी को निहारा । फिर अपने हाथ में उसका हाथ लेकर बोला--”ऐसा पालना तो तुम्हारे पास पहले से ही है !"
     "मेरे पास ?" विस्मय से उसने देखा।
    “हाँ हाँ तुम्हारी गोदी! गोदी क्या पालने से कम है जिस पर हमेशा तुम्हारी ममताभरी बाहों का चंदोबा तना रहता है। !”
     पत्नी के सूखे होंठ प्रेममयी बारिश की बूँदों से तरल हो उठे ।
     उसने फुर्ती से अपने चुनमुन को कलेजे से लगा लिया । ममता की महक से सोते हुए नवजात शिशु के गुलाबी होठों पर मुस्कान थिरक उठी ।
समाप्त 




बुधवार, 26 मई 2021

लघुकथा

  कला प्रेमी

सुधा भार्गव


वह  नई नवेली दुल्हन !ससुराल  के रीति रिवाजों को सब समय गौर से परखा करती । लोगों की आदतों से जल्दी ही परिचित होना चाहती थी ताकि सबसे अपना तालमेल बैठा सके। जब से आई है डाइनिंग टेबल पर एक से एक सुंदर क्रॉकरी को देख हतप्रभ सी  रह जाती है। इस्तेमाल होने के बाद नन्द बाई   उसे बड़ी सावधानी से धोकर अलमारी में रख देती। दूसरे दिन फिर नई क्रॉकरी निकल आती है । आकर्षल बेल बूटेदार डोंगों में भरी   जायकेदार  सब्जी दुल्हन की भूख को कहीं ज्यादा बढ़ा देती। उसने सोचा-' कुछ दिनों की बात है फिर तो साधारण कप -प्लेट निकल ही जाएँगे। कौन रोजमर्रा में इतनी कीमती क्रॉकरी इस्तेमाल करता है।' पर यह सिलसिला रुका ही नहीं। क्रॉकरी को बदल बदलकर दुबारा इस्तेमाल किया जाने लगा। यह परिवर्तन  हर दिन नयेपन का अहसास दे जाता। 

   एक दिन दुल्हन बोली-"माँ जी सारी क्रॉकरी बहुत ही खूबसूरत है। मुझे तो हर समय डर लगा रहता है टूट न जाए!फिर मेहमानों के लायक तो रहेगी नहीं। ऐसा करती हूँ इन सबको तो करीने से अलमारी में सजाकर रख देती हूँ। साधारण क्रॉकरी मुझे बता दीजिये। कल सुबह की चाय मैं बनाऊँगी ।'' 

   सास ने सहर्ष अनुमति दे दी। पर अपने मन की बात कहे बिना न रही।  अपने स्वर को भरसक मृदुल बनाते हुये बोली- "बहू, टूटे तो टूट जाने दे। दूसरी आ जाएगी। पर यह कहाँ का न्याय है  घर वाले सस्ते कप -प्लेट में चाय पीएं और मेहमान महंगी क्रॉकरी में।खाना बनाना ही तो काफी नहीं उसे कैसे परोसा जाए यह भी तो एक कला है। इससे खाने का स्वाद दुगुना हो जाता है।" 

अगले दिन  बहू सुबह उठते ही स्टोर में गई। शादी में मिले पीहर के उपहारों को खोला। मनमोहक रंगबिरंगा एक टी सैट देख खिल उठी। उसे धोया और मेज पर सजा दिया।  नाश्ता व चाय बनाकर बड़ी बेसबरी से घर वालों  के आने का इंतजार करने लगी। नियत समय से पहले ही सब कुर्सियों पर आन विराजे। चाय की तलक कम सता रही थी ,नई बहू के हाथ की चाय पीने का शौक ज्यादा लग  रहा था।मेज के नजदीक जाते ही देवर पुलकित हो उठा-  "हुर्रे-- हुरे क्या नया -नया  चमकदार टी सैट !

   चाय की चुसकियाँ लेते ही ससुर जी बोले-"भाई इतनी अच्छी चाय तो मैं पहली बार पी रहा  हूँ।" 

दुल्हन प्यार पगे शब्दों में खो सी गई। सास हौने हौले मुस्करा रही थी। 

समाप्त 


मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

टकराती रेत पर चर्चा

सुप्रसिद्ध साहित्यिकी संस्था  कोलकाता की ओर से  

वनिका पब्लिकेशन 
प्रकाशित -2018




 


सोमवार, 20 अगस्त 2018

लघुकथा


चुंबन
     *सुधा भार्गव 

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स्कूल से आते ही राधिका ने अपना बैग कोने में पटका और कुर्सी पर धम्म से बैठती बोली-    
    “माँ माँ --आज मैं बहुत थक गई हूँ।”
    “मैं अभी रानी बिटिया की थकान मिटाती हूँ।ठंडी -ठंडी ठंडाई लाती हूँ।’’
    “ओह माँ ,मुझे कुछ नहीं खाना –पीना।’’
    बच्ची को व्याकुल देख माँ बेचैन हो उठी। उसने उसका  मुखड़ा अपने हाथ में लिया और गाल पर अपने प्यार की मोहर लगा दी।
    “अरे ऐसे नहीं। तुम्हें तो माँ  प्यार  करना भी नहीं आता। रौनक की तरह गालों को नहीं मेरे होंठों पर प्यार करो। ”
    “क्या--?वह चौंक पड़ी। लगा जैसे गरम तवे पर हाथ दिया। “यह रौनक कौन है?”उसने राधिका को पकड़कर बुरी तरह झिंझोड़ डाला।
    “माँ का यह रूप देख राधिका सहम गई। वह समझ न सकी लाड़-दुलार करते -करते  माँ को एक पल में क्या हो गया!
    पत्नी की ऊंची आवाज सुन उसके पापा भी कमरे से बाहर निकल आए। राधिका  उनके पीछे जा छिपी।
    “पापा मुझे बचा लो। मैंने कुछ नहीं किया।’’ वह कातर स्वर में बोली।  
माँ को उसका यह रक्षा कवच जरा भी न सुहाया और पीछे से बुरी तरह खींचती फुफकार उठी-
    इतना तो बता दे---- यह रौनक है कौन ?”
    भयभीत निगाहों से उसने पापा की ओर ताका मानो जाल में फंसी चिड़िया अपने बचाव की भीख मांग रही हो।
   “बेटा, बता दो सब कुछ  अपनी माँ को ,डरने की कोई बात नहीं ।’’ उन्होंने ढाढ़स बँधाया।
   “रौनक—---रौनक -- वह—वह तो मेरी  कक्षा में ही पढ़ता है। कठिन सवाल एक मिनट  में ही हल कर देता है। परसों  अगर मेरी  सहायता नहीं करता तो टीचर जी की बड़ी डांट पड़ती।’’ राधिका रुआंसी सी हो गई।
    “अब उससे बात करने की भी जरूरत नहीं। समझीं तुम । माँ ने उंगली दिखाकर राधिका को डपटा।’’
    ‘पर क्यों?” राधिका ने जानना चाहा।
    “वह अच्छा लड़का नहीं है।’’ माँ ने कहा।
    “पर आप तो उससे कभी मिली भी नहीं ,आपको कैसे पता ?सब उसकी तारीफ करते हैं। फिर वह बुरा कैसे हो गया!?”राधिका ने जानना चाहा।
    “मैंने कह दिया न उससे दूर रह बस।”माँ ने जैसे फतवा जारी कर दिया।  “फिर मेरी मदद कौन करेगा पढ़ाई में—रोज मैडम सजा देगी।’’ वह रोने लगी ।
    “देखो जी इतनी जल्दी किसी निर्णय पर न पहुँचो। पहले स्कूल जाकर ठंडे दिमाग से बात कर लो। अपनी बेटी पर थोड़ा तो विश्वास करो।’’ राधिका के पापा बोले।
    राधिका की माँ को पति की बात फूटी आँख न सुहाई । वह रात भर शक के पिजरे में कैद करवटें ही बदलती रही। उधर राधिका भी सुबकते- सुबकते न जाने कब-कब में  सो गई। इसका अंदाजा माँ को तनिक भी न हुआ पर भीगा तकिया उसके दुख की कहानी बता रहा था।
   अगले दिन माँ प्रिंसपिल के कमरे में बेटी को खींचते हुए ले गई और दहाड़ी –“आप तुरंत रौनक  को बुलवाइए। उसकी कैसे हिम्मत हुई कि वह मेरी बेटी के होंठों को चूमें। आपने कैसे-कैसे बच्चों को इस स्कूल में रख छोड़ा है। ”
   प्रिन्सिपल हैरान से बोले –“बहन जी आपको जरूर कोई हलतफहमी हो गई है। वह नादान तो निहायत मासूम और पढ़ाकू बच्चा है।”
    “मासूमियत की बात छोड़िए –आजकल के बच्चे तो हमारे भी बाप हैं। उम्र से पहले ही बहुत कुछ सीख जाते हैं।”
    “मेरी  बात का विश्वास नहीं तो मैं अभी उसे बुलाता हूँ। आप शांति से तो बैठिए।”प्रिंसीपल ने राधिका की माँ से कहा।
    कुछ ही देर में रौनक ने  आते ही प्रिंसपल और राधिका की माँ से हाथ जोड़कर नमस्ते की।  
    “बेटा, राधिका तुम्हारी ही क्लास मैं है न?”  
    “जी ,मैं उसी के पास बैठता हूँ। वह मेरी दोस्त है। रौनक ने सहजता से कहा।”
    ‘कल क्या तुमने उसके होंठों को चूमा था?”
    “मैंने तो प्यार किया था।’’रौनक ने बिना किसी झिझक के कहा।
    “प्यार ऐसे करते हैं,यह किसने बताया?”प्रिंसिपल ने पूछा। “मेरे  मम्मी-पापा तो ऐसे ही प्यार करते हैं ।”   
    “ठीक है रौनक। अब तुम जाओ।” प्रिन्सिपल ने कहा।     
    रौनक के जाते ही राधिका की माँ अपना सिर पकड़कर बैठ गई।
    एकाएक उसकी आँखों के सामने चलचित्र की भांति एक के बाद एक दृश्य आने जाने लगे-- ऑफिस से आते ही पति का उसे बाहों के घेरे में लेना,चेहरे और होंठों पर चुंबनों की बारिश। सोफे पर सटकर बैठना,बेटी का टुकुर टुकुर देखना।
    राधिका की माँ अंदर ही अंदर शर्म से गड़ी जा रही थी । उसे लग रहा था ,जैसे बेटी के साथ-साथ रौनक भी उन्हें यह सब करता हुआ देखता रहा है।
    चश्में से झाँकती प्रिन्सिपल की दो आँखें उसके चेहरे पर निरंतर आते जाते रंगों को घूर रही थीं। 
( #लघुकथाचौपाल-32(भाग-एक) को इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : https://www.facebook.com/utsahi/posts/10212327842448236 )



बुधवार, 14 मार्च 2018

प्रकाशित लघुकथा


बाल सुदामाघर 
          *सुधा भार्गव 

      छह मास का नन्हा-मुन्ना बालक ! पेट के बल सरकना उसने शुरू कर दिया था। किसी भी समय करवट ले सकता था। कोई और माँ होती तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगता पर वह तो सिर पकड़ कर बैठ गई –हाय री दइया ,इस अपनी जान को किसके भरोसे छोडकर जाऊँ। यह तो कहीं का कहीं सरक जावे। कल तो मजदूरी करने न जा पाई--- आज भी न गई तो हो जावेगी छुट्टी और ये मुआ –मुझ भूखी-प्यासी की सूखी छातियों को चुचुड़-चुचुड़- ---दम ही निकाल देगा।
      अचानक उसके दिमाग में बिजली सी चमकी।  बच्चे को गोदी में ले  झोपड़पट्टी से निकल पड़ी। एक हाथ से बच्चे को सँभाले हुए थी और दूसरे हाथ में एक झोला। जिसमें से रस्सी के टूटे-कुचले टुकड़े झाँकते नजर आ रहे थे। कुछ दूरी पर जाकर उसने बच्चे को सड़क के किनारे पेट के बल लेटा दिया। रस्सी का एक छोर बच्चे के पैर में बांध दिया और दूसरा छोर वही पड़े बड़े से पत्थर से ताकि वह अपनी जगह से हिल न सके। कलेजे पर पत्थर रखकर वह उसे छोड़ पास ही बनने वाले मकान की ईंटें ढोने चली गई।
      ऑफिस जाते समय संयोग से मैं उधर से गुजरी। उस दूधमुंहे बच्चे को देख मेरी तो साँसे ही रुक गईं जो लगातार रोए जा रहा था । हैरानी और खौफ की मिली जुली भावनाओं से बहुत देर तक जख्मी होती रही।बच्चे के आसपास कई लोग कौतूहलवश खड़े थे जिनकी आँखों में एक ही प्रश्न उभर रहा था –यह किस बेरहम का बच्चा है। इतने में सामने से मैली कुचैली धोती पहने एक औरत बदहवास सी दौड़ी आई और बच्चे को उठाकर बेतहाशा चूमने लगी।अंग -अंग टटोलती और कहती जाती –मेरे मनुआ—मेरी जान –तुझे कछु हुआ तो नहीं। फिर बच्चे को सीने से लगा बबककर रो पड़ी।
      मैं तो उसे देख क्रोध की आग में जल उठी और जी चाहा उसका मुंह नोच लूँ। आँखें तरेरते बोली-"तू कैसी माँ है।,इतने छोटे से बच्चे को बेसहारा सड़क पर छोड़ चली गई। एक मिनट को भी तेरा कलेजा न काँपा।"
      "माई क्या करूँ मजदूरी करने जाऊँ तो अपने लाल को कहाँ छोड़ू। लगे तो तू भी काम वाली है। माई तू कहाँ छोड़े है अपने बच्चों को।"   
      "मैं बालघर में छोड़कर जाती हूँ।"
     "भागवाली, मुझे भी ऐसा कोई घर बता दे न,जहां मेरी सी अभागिनें माँ  अपने बच्चों को छोड़ दें और बेफिक्री से मजदूरी कर सकें।"
      उसने मेरे दिमाग में हलचल पैदा कर दी पर अपना मुंह न खोल सकी। कोई बाल सुदामा घर होता तो बताती।