। साहित्य समाज संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका
2025
मेरी एक लघुकथा
प्रिय का वियोग
"क्या हुआ, प्रिय? तुम इतने अशांत और उदास ! तुम्हारी
नील प्रभा पर
कोहरे की परछाई!?"
नीलांबर ने एक गहरी आह भरी। "क्या कहूँ, धरा! मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे सौंदर्य को निहारने में
है। तुम्हारा हरित आवरण, तुम्हारे गिरि-शिखरों पर
बिछी हिम की चादर,
तुम्हारे सागरों की असीम
गहराइयां - यही तो मेरे जीवन का सार है। परंतु पिछले कुछ दिनों से यह कोहरा मेरे और तुम्हारे बीच एक अभेद्य
दुर्ग बन गया
है। मैं तुम्हें देख
नहीं पा रहा, और मेरे अस्तित्व का उद्देश्य ही जैसे खो गया है।"
अंबर के इन शब्दों से धरती व्यथा से कराह उठी
। अपने वक्ष को सहलाते बोली- “ मेरे ही
स्वार्थी पुत्रों ने महत्त्वाकांक्षा की आग
में मेरे ही शरीर को झोंक दिया है। उनके लोभ की अग्नि से उठने वाला वह जहरीला धुआँ, मेरे और तुम्हारे प्रेम के बीच एक काली दीवार बन गया है।
यह कालापन केवल तुम्हें ही नहीं, मुझे भी
मेरे ही सौंदर्य से विमुख कर रहा है।"
दोनों के मौन में एक अव्यक्त पीड़ा थी, एक ऐसा मौन जो हजारों शब्दों पर भारी था। नीलांबर ने पीड़ा से भरे अश्रुओं की धारा को बादलों के रूप में परिवर्तित कर दिया, जो शुष्क धरती पर बरसने लगे। यह आँसू केवल जल नहीं , बल्कि उनके हृदय की अथाह पीड़ा का प्रतीक थे। पृथ्वी ने उन बूँदों को अपने अंक में ले लिया, मानो वह अपने प्रिय की वेदना को स्वयं में समाहित कर रही हो।
समाप्त


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