वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

चौथा लघुकथा संग्रह -प्रकाशित ;2026


                                    काँच कंक्रीट और करुणा



            ‘काँच कंक्रीट और करुणा’केवल लघुकथा संग्रह नहीं बल्कि आधुनिक समाज का एक्सरे हैं । बार -बार ख्याल आता है –यदि हमने कंक्रीट की कठोरता नहीं त्यागी तो काँच की तरह हमारा वजूद बिखर जाएगा । अंतत: करुणा ही वह डोर है जो हमें बचा सकती है।”  

सुधा भार्गव    

ई-मेल: subharga@gmail.com                             

         मेरा यह लघुकथा संग्रह पिछले माह ही प्रकाशित हुआ है। हालांकि इससे पहले मेरे तीन लघुकथा संग्रह निकल चुके हैं लेकिन बलराम भाई जी (डॉ .बलराम अग्रवाल)के परामर्श के बिना मुझे कभी भी संतोष नहीं हुआ। जब भी मुझे कोई समस्या सताती है,उनके सामने ले बैठती हूं।वे तुरंत उसका हल निकाल देते हैं।ऐसा व्यक्तित्व है उनका!खुद आगे बढ़ते हैं और दूसरों को लेकर चलते हैं। इस संग्रह की लघुकथाओं को खंडों में विभाजित करने की प्रेरणा भी उनसे ही  मिली।जब उन्होंने सुझाव दिया तो  इस पर उनकी मोहर भी लगनी जरूरी हो गई थी। व्यस्त  होते हुए भी उन्होंने समय निकाला और लघुकथाओं का तथ्यात्मक और कलात्मक विश्लेषण बड़ी बारीकी से किया। जिसका उन्होंने शीर्षक दिया ----

 लघुकथाओं का विस्तृत फलक 

उसका एक अंश ---

    ‘मन का मधुमास’ इस संग्रह के छठे खंड का शीर्षक है। इस खंड की लघुकथाएँ ‘सृजन का स्पर्श’, ‘‘फूल, तितली और अहसास’ तथा ‘पीली चिट्ठी’ आदि वस्तुत: स्तरीय गद्य-काव्य हैं। इन्हें ऐसा गद्य-गीत भी कह सकते हैं जिनकी समीक्षा के लिए मात्र लघुकथा-समीक्षा अथवा लघुकथा-आलोचना के टूल्स ही पर्याप्त नहीं होंगे, बाहर से भी लेने होंगे। लघुकथा दरअसल ऐसी गद्य-विधा है जिसका एक सिरा कथा से मिलता है और दूसरा काव्य से; कोई तीसरा सिरा व्यंग्य से मिलता है तो चौथा नाटक से। इसके पाँचवें, छठे, सातवें…सिरे भी हैं जो साहित्य की किसी न किसी विधा अथवा शैली से अक्सर जा मिलते हैं। ऐसे में, सामान्य पाठक को ही नहीं, धुरन्धर आलोचक को भी बहुत-कुछ सोचना-समझना, उलझना पड़ जाता है। यह कहना कि बहुत-सी कहानियों में भी ऐसा देखने में आ जाता है, न्यायसंगत नहीं होगा; क्योंकि जब बात लघुकथा की चल रही हो तो लघुकथा ही केन्द्र में रहनी चाहिए, कोई अन्य विधा नहीं। अन्य विधा की ओर जाना मुद्दे से आँखें चुराना और पलायन करने-जैसा होगा। कुल मिलाकर यह कि इस संग्रह के पहले खंड से लेकर अन्तिम खंड तक लघुकथा अपने विस्तृत फलक में मौजूद है। अनायास अथवा सप्रयास जैसे भी आए हों, अनेक प्रयोग इन लघुकथाओं में दृष्टिगत हैं। ऐसे प्रयोगों को पहचाना जाना चाहिए और उनका खुली मानसिकता से स्वागत किया जाना चाहिए।

मोबाइल : 8826499115                                                               एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी,सेक्टर 120                                                    

 नोएडा-201301 (उप्र)                                                         

      इस लघुकथा संग्रह के दौरान डॉ. जितेंद्र जीतू जी से परिचित हुई । उनके व्यंग संसार में झांकने का अवसर मिला। एक बार के कहने से ही वे इस संग्रह की भूमिका सहर्ष लिखने को तैयार हो गए। इसके लिए मैं उनकी हमेशा आभारी रहूंगी।उन्होंने अपना काफी समय देकर लघुकथाओं  की गहन विवेचना की। प्रथम खंड की  लघुकथाओं की सराहना करके उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया । समय-समय पर रोबोटिक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा भी हुई। इस टेक्नोलॉजी पर उन्होंने प्रकाश डाला तो  मुझे भी प्रकाश मिला।

भूमिका का एक अंश 

   इस तरह कुल 90 लघुकथाओं के साथ सुधा जी का यह संग्रह तैयार हुआ है। लघुकथाओं को इस प्रकार खंडों में विभक्त करके लिखना परिश्रम का कार्य है। रोबोटिक लघुकथाएं तो वास्तव में सुधा जी को एक पृथक ही क्लास में रखती हैं। लगभग समस्त लघुकथाओं में प्रतीकों और रस - अलंकारों का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है। यही इनकी लघुकथाओं का सौंदर्य है। संग्रह की लघुकथाएं शास्त्रीयता के बिंदु पर खरी उतरती हैं। हो सकता है कतिपय लघुकथाएं समस्त पाठकीय स्तरों पर संतुष्टि का अहसास कराने में सक्षम न हों परन्तु इसका यह अर्थ कदापि न लगाया जाए कि उन्होंने अपनी  ओर से  लघुकथाओं को सींचने में और उनके पात्रों की परवरिश में किंचित कम परिश्रम किया होगा। मुझे उम्मीद है कि समस्त लघुकथा-जगत प्रस्तुत लघुकथा-संग्रह का स्वागत हृदय से करेगा।

- (डॉ) जितेन्द्र जीतू

jitendra.jeetu1.com

 वरिष्ठ लघुकथाकार श्याम सुंदर अग्रवाल जी , उमेश महादोषी, कमल चोपड़ा, योगराज प्रभाकर , अशोक भाटिया , माधव नागदा,सुकेश साहनी ,रामेश्वर काम्बोज, कांता रॉय,पवन जैन जी की भी ऋणी रहूंगी जिनके कारण प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से मेरे लेखन कार्य को ऊर्जा मिलती रही, नए-नए अनुभव हुए और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ।इस संदर्भ में अपने लघुकथाकार व साहित्यिक मित्र पवित्रा अग्रवाल ,मधु जैन , प्रेरणा गुप्ता,अंजु खरबन्दा ,ऋता शेखर को सदैव याद रहूंगी जिन्होंने बड़े धैर्य से गोष्ठियों में तो —कभी ऑनलाइन पर ,तो कभी व्हाट्सएप पर मेरी लघुकथाएं पढ़ीं और सुनी।फिर बेबाकी से उन्होंने उनके बारे में अपने विचार व्यक्त किए। 

   इसका आवरण व अंदर की  चित्रांकन योजना बहुत आकर्षक है। इसके लिए संजय जी और उनकी प्रकाशन टीम का बहुत बहुत धन्यवाद।