वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

सोमवार, 2 सितंबर 2013

अविराम साहित्यिकी त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित लघुकथा


माँ /सुधा भार्गव 














-बेटा ,एक ही बिल्डिंग में आमने- सामने के फ्लैट में हम लोग रहते हैं मगर मिले मुद्दत हो गई ।
-मुद्दत --!कमाल करती हो माँ !तीन दिन पहले ही तो आया था ।
-तीन दिन ही सही ,हमारे लिए तो तीन युगों के बराबर हैं ।
-क्या बताऊँ --!दफ्तर में बहुत काम था । देर से घर आया । आते ही बच्चे चिपट गए । दो घंटे खाना- खिलाना ,हंसी -ठट्ठा चलता रहा ।
-यह तो अच्छी बात है , तुम बच्चों को इतना प्यार करते हो ,आफिस में भी याद करते होगे । पर एक बात भूल जाते हो --हम भी अपने बच्चे के आने की राह तकते हैं । तुम्हारी शक्ल अपने सामने चाहते हैं ,उसे छू कर बात करना चाहते हैं । लेकिन तुम ---तुम्हारी तो नजरे ही नहीं उठतीं हमारी ओर --बात करना तो दूर । फोन से ही एक बार पूछ लेते --पापा कैसे हो ?
उनकी तरफ मुड़ते हुए उसने पूछा --- आप कैसे हो ?
पापा देख नहीं सकते थे पर कानों में बेटे की आवाज पड़ते ही लगा जैसे निर्जन वन में ठंडी फुआरें पड़ रही हों |
-पापा ,माँ मेरी बात नहीं समझ पातीं पर आप तो समझ सकते हैं --
मैं अकेली जान कहाँ -कहाँ जाऊं--। बच्चों को देखूँ कि बीबी को देखूँ --यहाँ आऊँ या आफिस जाऊं।
बेटे के मुख पर परेशानी की लकीरें देख माँ हिल उठी मानो उसके अंग अंग की धज्जियाँ उड़ रही हों ।
--मेरा तो बुढ़ापा है ,शायद बेटा ,-- सठिया गई हूँ । न जाने क्या -क्या कह गई । कहे सुने को यहीं दफन कर दे ।

एक हाथ से उसने कलेजा थाम रखा था और दूसरा हाथ था वृद्ध के कंधे पर ।
* * * * *    

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें