वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

सोमवार, 12 मई 2014

बड़े ज़ोर –शोर से मनाए जाने वाले मातृ दिवस पर


मेरी दो लघुकथाएँ /सुधा भार्गव 


1-हैपी मदर्स डे 

बेटा तीन साल के बाद पढ़ाई करके विदेश से लौटने वाला था । उसने लौटने का दिन ‘हैपी मदर्स डे’ चुना। वह इस दिन पहुँचकर माँ को चौंका देना चाहता था। आते ही माँ के पैर छुए और बोला माँ –हैपी मदर्स डे।
-हैपी मदरस डे !यह क्या होता है ।
-आज के दिन पूरी दुनिया में हैप्पी मदर्स डे मनाया जा रहा है । लोग अपनी माँ को याद करते हैं। उससे मिलने जाते हैं। उसका विशेष आदर कर तोफे देते हैं। देखो मैं मिलने आ गया और तेरे लिए कीमती तोफा भी लाया हूँ ।
-बस –बस—बहुत हो गया गौरव गान! क्या साल के 365 दिनों में केवल एक दिन को ही तेरी माँ रहती हूँ ?

2-याद न रहा

माँ –बेटे उस छोटे से घर में बड़े आराम से रहा करते पर बेटे की शादी के बाद वह घर छोटा पड़ने लगा । फिर एक बच्चा भी हो गया । पत्नी जिद करने लगी कि किराए पर एक दूसरा फ्लैट पास में ही ले लो ।
-क्या बात करती हो !दुनिया क्या कहेगी ! इसके अलावा मैं भी तो माँ से अलग नहीं रह सकता ।
-आप तो बच्चों की तरह बातें करते हो। मैं भी तो अपने माँ-बाप को छोडकर आपके पास रह रही हूँ । अच्छा ऐसा करो –अपना ट्रांसफर दूसरी जगह करा लो ।तब तो किसी को कुछ कहने का मौका ही नहीं मिलेगा और हमारी ज़िंदगी भी खूबसूरत मोड़ ले लेगी ।
-तुमने ठीक कहा। माँ को भी अपने साथ ले चलेंगे । वह भी नया शहर देख लेगी । पिताजी के मरने के बाद वह इस छोटे से घर से निकली भी नहीं हैं ।
-अभी तो हम खयाली पुलाब ही बना रहे हैं । ट्रांसफर लेकर पहले जम तो जाओ फिर माँ जी को बुलाने की सोचना ।

ट्रांसफर आर्डर हाथ में आते ही बेटा उछल पड़ा –माँ –माँ देखो मेरा ट्रांसफर ऑर्डर । मैं बड़े से शहर में  जा रहा हूँ ।तुझे  भी अपने साथ ले जाऊंगा । मिल मिलकर खूब घूमेंगे । वहाँ मेरी तरक्की होने का मौका भी हैं । 
-बेटा ,भगवान तुझे खूब तरक्की दे। पर मैं तेरे साथ न जा सकूँगी । तेरे पिता ने बड़े शौक से इस घर को बनवाया था । मुझे इससे मोह हो गया है । हाँ बीच –बीच में मिलने जरूर पहुँचूँगी। 

बेटा मन मारकर दूसरे शहर चल दिया पर अगले हफ्ते ही रविवार को माँ के पास आन धमका ।
माँ हैरान ! -बेटा यहाँ तू कैसे । तुझे तो नई जगह में बहुत काम होगा ।
-हाँ माँ बहुत काम है और काम के चक्कर में मैंने तुझे बहुत भूलाने की कोशिश की। सब याद रहा पर तुझे भूलना ही याद न रहा।

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

गणेश पुराण/सुधा भार्गव 








-बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की आज मीटिंग है। उनका अगले वर्ष के लिए चुनाव होगा । तुम्हें  भी मीटिंग में चलना है ।
-मैं क्या करूंगी ?
-तुम्हारा वोट बहुत कीमती है। इमरजेंसी में इसका प्रयोग होगा । मेरे विपक्षी को हराने के  काम आएगा।
-आपका विपक्षी कौन है?
-वही मेरा सौतेला जानी दुश्मन ।
-गोद देने से क्या सौतेला हो गया । कुछ करने से पहले अच्छी तरह सोच लो वरना जानलेवा जख्म जीना मुश्किल कर देंगे । फिर मुझे भाई –भाई के झगड़े में क्यों खचेड़ते हो । मेरे चचेरी बहन उनको ब्याही है । हमने हमेशा अपने को सगी बहने समझा । मेरा यह रिश्ता सदैव को चटक जाएगा । फिर क्या जुड़न हो पाएगी । मैं कैसे आई दरार को पाट पाऊँगी । दुनिया क्या कहेगी ?

-तुमने मेरी बात नहीं मानी तो मैं नाराज हो जाऊँगा। मगर तुम ऐसा करोगी नहीं। तुम मेरी अर्धांगिनी हो ,गृह लक्ष्मी हो । यदि मैं जीत गया तो फैक्ट्री का मालिक बन जाऊंगा । दुश्मन के बदले जिसे डायरेक्टर बनाऊँगा ,वह तो मेरी उँगलियों पर नाचेगा। 
-वह गुलाम कौन है ?
-तुम्हारा भाई ! दो साल की ही तो बात है तुम्हारा बेटा पढ़कर आ जाएगा । फिर उसे तुम्हारे भाईजान के बदले डायरेक्टर बना दूंगा। पूरी फैक्टरी पर मालिकाना मेरा हक होगा। बाहरवालों को एक –एक करके आउट कर दूंगा। उनके शेयर्स ज्यादा दाम देकर खरीद लूँगा ।
-आपका इन बातों में बड़ा दिमाग चलता है ।

-सच्चे व्यापारी को दूरदर्शी ,समझदार होना चाहिए गणेश की तरह ।
-वह कैसे ?
-हाथी की सूंढ की तरह सूंघकर व्यापारी को दूर से ही भाँप लेना चाहिए ,खतरा तो आसपास नहीं मँडरा रहा है। हाथी की निगाहों की तरह नजर में पैनापन हो । इससे सूक्ष्म से सूक्ष्म कोना भी छिपा न रहेगा । उस की ही तरह कान बड़े -खड़े और पेट मोटा होना चाहिए ताकि खुद तो जरा सी खुसर –पुसर भी सुन ले लेकिन अपने भेद पेट में इस प्रकार छिपाए रखे कि दूसरों को उसकी थाह भी न मिले । और बताऊँ ---दिमाग इतना तेज हो कि दूसरों के मन की  बात उगलवा ले । चालें ऐसी आड़ी-तिरछी चले कि बहुत से विभीषण,जयचंद उससे आकर मिल जाएँ । भाई, मैं तो इन्हीं राहों का मुसाफिर हूँ?
-बंद कीजिए अपना गणेश पुराण ।

-हाँ ,वोट देने के साथ –साथ मेरे वैरी के खिलाफ बोलोगी भी । उसे अपमानित करके अपने मन की भड़ास निकाल लूँगा ।
-यह मुझसे नहीं होगा ।
-बस एक बार मेरी बात मान लो फिर जीवनभर तुम्हारे चरणों में पड़ा रहूँगा । विष्णु भगवान के लक्ष्मी पैर दबाती है पर मैं आजीवन तुम्हारे दबाऊंगा और लक्ष्मी पुराण पढ़ता रहूँगा ।  

प्रकाशित -संरचना लघुकथा विशेषांक 2010


रविवार, 9 मार्च 2014

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित -9.3 .2014

मेरी दो लघुकथाएँ /सुधा भार्गव



1-चुनौती

पिता की बड़ी इच्छा थी कि बेटी खूब पढे–लिखे और विदेश जाये। बेटी ने उच्च शिक्षा तो प्राप्त कर ली मगर विदेश न जा पाई। संयोग से विदेश में रहने वाला लड़का मिल गया और शादी के बाद वह  विदेश चली गई।
शीघ्र ही लाड़ली बेटी सुंदर से बेटे की माँ बन गई। खुशियाँ दरवाजे पर दस्तक दे रही थीं पर बेटी ने अनुभव किया, पति बदल रहा है। बाहर कुछ ज्यादा ही समय देने लगा है ।  
उस रात वह अनमनी सी पति के आने का इंतजार कर रही थी। पति आया पर बेमन से बोला– सोई नहीं ?
-सोती कैसे आपके बिना !
-आदत डाल लो बिना मेरे सोने की। ज्यादा चुप रहकर तुम्हें और धोखा नहीं देना चाहता। मेरी  पहले से ही एक विदेशी महिला से शादी हो चुकी है। दो बच्चों का बाप हूँ। मैं तो शादी करना ही नहीं चाहता था, पर मेरे माँ-बाप को तो वारिस चाहिए था, वह भी भारतीय बहू से। उनको उनका वारिस मिल चुका है। मेरी  तरफ से तुम आजाद हो। कहीं भी रहो, कहीं भी जाओ ।
-अच्छा हुआ बता दिया। धोखा तो तुम दे ही चुके हो, पर मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखूंगी। मैं एक वकील हूँ और एक वकील से तुम उसकी औलाद नहीं छीन सकोगे, यह मेरी चुनौती है।

2-द्रौपदी तो नहीं!
बुआ जी बहुत दिनों बाद आई थीं। सारा घर उन्हें घेरे बैठा था। अपनी दोनों भतीजियों को वहां न देख पूछ बैठीं–
-अरे मुरली, तेरी दोनों बेटियाँ कहाँ हैं ?
-आती ही होंगी जिज्जी!…लो आ गईं ।
आते ही दोनों ने बुआजी को प्रणाम किया। वे जूडो-कर्राटे  सीख रही थीं। अगले दिन परीक्षा होने वाली थी। बिना समय नष्ट किये उन्होंने जल्दी-जल्दी नींबू शरबत पीया और लग गईं पैतरेबाजी में।
दो मिनट तो बुआ जी उन्हें देखती रहीं। सामने का दृश्य असहनीय होने पर वह चिल्लाईँ --छोरियों चोट लग जायेगी…ये क्या कर रही हो, ईंटा-पत्थर सेॽ
दूसरे पल और जोर से चिल्लाईं -हे भगवान् इन्होंने तो ईंट टूक-टूक कर दी…अरे मुरली…ये छोरियां हैं या प्रेतात्माएँ। गजब की ताकत है इनके हाथों में। इनसे शादी कौन करेगा?
-अभी तो ये छोटी हैं जिज्जी, सो चिंता नहीं करो।
-चिंता! चिंता क्यों न करूं। इनके लच्छन ठीक नहीं। जहाँ भी जायेंगी, महाभारत मचायेंगी।
-महाभारत ही तो मचायेंगी, द्रौपदी तो नहीं बनेंगी।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

लघुकथा


संदेह के घेरे/ सुधा भार्गव


जावित्री की साध थी कि डाक्टर बेटे के लिए बहू भी डॉक्टर हो और वह साध पूरी हो गई। पता लगते ही 
बधाई देने वालों का तांता लग गया। विवाह के अवसर पर सावित्री बोली –जावित्री, भगवान ने तेरे मन की मुराद तो पूरी कर दी।  
-हाँ दीदी,कल तो गीत संध्या में बहू का नाच होगा।
-तेरी बहू को यह भी हुनर आता है ।
-हाँ !खाना बनाना जरा कम आता है सो वह मैं सीखा दूँगी। मैं तो अपनी बहू को सर्वगुणसम्पन्न देखना चाहती हूँ ।
बहू का डांस होने पर सब ने भूरि-भूरि प्रशंसा की और सास ने सुना भी दिया –बहू ,परसों जेठ जी के लड़के की शादी है उसमें भी तुम्हें डांस करना है ।

विवाह की भीड़ छंट जाने पर रुनझुन ने चैन की साँस ली। डाक्टर होने के नाते जो दूसरों की साँस बनाए रखती थी आज उसी का दम घुट रहा था। बचपन में कभी कत्थक सीखा था। शौक –शौक में स्कूल में भी डांस कार्यक्रमों में भाग लेती थी परन्तु जीवन के रंगमंच पर उसको इस कदर नाचना पड़ेगा उसने सोचा भी न था। डर था दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति न बन जाए। इस डर से छुटकारा पाने के लिए उसने सरकारी अस्पताल में नौकरी की अर्जी दे दी । तकदीर से इंटरव्यू देने भी उसे जल्दी जाना पड़ा। जिस दिन उसे इंटरव्यू देने जाना था उसी दिन डाक्टर पति का जन्मदिन था। पिछले वर्ष से कुछ ज्यादा ही लोगों को निमंत्रित किया गया था जिसका उद्देश्य जन्मदिवस मनाना नहीं अपितु यह दिखाना था कि हमारे घर की बहू ,डॉक्टर होने के साथ –साथ घर के कार्यों और आतिथ्य सत्कार में कितनी प्रवीण है।
बेटे ने दबे स्वर में कहा –मम्मी ,जन्मदिन एक दिन बाद भी मनाया जा सकता है कल तो रुनझुन का इंटरव्यू है।
-अरे इंटरव्यू है तो क्या हुआ ,एक नहीं तो दूसरा। मेरी बहू के लिए तो हजार इंटरव्यू इंतजार करेंगे। जन्मदिन तो वर्ष में एक दिन ही आता है,उसे कैसे टाला जा सकता है!
-घर में इतने नौकर-चाकर हैं काम में कोई फर्क नहीं पड़ेगा ,परंतु रुनझुन इंटरव्यू देने नहीं गई तो उसको बहुत फर्क पड़ेगा। बेटे ने समझाने की कोशिश की।
-ना बाबा ना! बहू के बिना एक मिनट नहीं चलेगा,बहुत कर लिया मैंने काम। ले बहू, घर की चाबियाँ और सँभाल इस घर को।
रुनझुन से कुछ कहते न बना। एक तरफ सास उसके गुण गाते नहीं अघाती थी दूसरी ओर उसे अपनी बीन पर नचाना चाहती थी । क्या वह नाच पाएगी। संदेहों ,सवालों के बीच वह घिरी हुई थी।
समाप्त    

बुधवार, 25 सितंबर 2013

अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित


लघुकथा डॉट कॉम पर भी मेरी  लघुकथा छोटी बहू पढ़ सकते हैं ।
http://laghukatha.com/565-1.html

छोटी बहू








बेटी की विदाइगी के समय आकाश की रुलाई फूट पड़ी और सुबकते हुए अपने समधी जी से बोला --भाई साहब ,मेरी बेटी  को सब आता है पर खाना बनाना नहीं आता है । 
समधी बने मनोहर लाल ने सहजता से कहा -कोई बात नहीं --आपने सब सिखा दिया ,खाना बनाना हम सिखा देंगे । 
सरस्वती के पुजारी समधी जी आज फूले नहीं समा रहे थे घर में पढी -लिखी बहू जो आ गई थी ।  जो भी मिलता कहते -भई ,पाँच -पाँच बेटियाँ विदा करने के बाद घर में एक सुघड़ बेटी आई है ।

 शाम का समय था कमरे मेँ बिछे कालीन पर एक चौकी रखी थी जिस पर चाय -नाश्ता सलीके से सजा था । नन्द -देवर अपनी भाभी  को घेरे बैठे थे और इंतजार मेँ थे कि कब घर की बड़ी बहू आए औए चाय पीना शुरू हो । 
कुछ मिनट बीते कि  जिठानी जी  धम्म से कालीन पर आकर बैठ गईं और बोली -हे राम ,मैं तो बूरी तरह थक गई ,मुझसे कोई  उठने को न कहना । और हाँ छोटी बहू  !मुझे एक कप चाय बना दो और तुम लोग भी शुरू करो । 
चाय केआर घूँटभरने शुरू भी नहीं हुये थे कि छोटे बेटे को ढूंढते हुये ससुर जी उस कमरे मेँ आ गए और बोले -रामकृष्ण तो यहाँ नहीं आया ?
 बड़ी बहू  ने जल्दी से सिर पर पल्ला डाल घूँघट काढ़ लिया । छोटी  बहू तुरंत खड़ी हो गई और एक कुर्सी खींचते हुये बोली -बाबू जी आप जरा बैठिए  मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ । भैया जी तो यहाँ नहीं आए । 
-न बहू ,मैं जरा जल्दी मेँ हूँ । चाय रहने दे । 
फिर बड़ी बहू से बोले -इंदा ,मैं चाहता हूँ अब से तुम भी पर्दा न करो ,नई बहू आजकल के जमाने की है । अब कोई पर्दा -सर्दा नहीं करता । 
-पहले जब मैं पर्दा नहीं करना चाहती थी तब मुझसे पर्दा कराया गया ,अब आदत पड गई तो कहा जा रहा है कि पर्दा न करो । अब तो मैं पर्दा करूंगी । 
नई नवेली बहू आश्चर्य से जिठानी जी की तरफ देख रही थी --यह कैसा पर्दा !बड़ों के प्रति जरा भी शिष्टता या आदर भावना नहीं !
मनोहर लाल जी बड़ी बहू के रवैये से खिन्न हो उठे । उसने नई दुल्हन का भी लिहाज न किया । अपना सा मुँह लेकर चले गए । 

उनके जाते ही एक वृद्धाने कमरे मेँ प्रवेश किया । 
--यहाँ कोई आया था ?जासूस की तरह पूछा । 
-हाँ !बाबू जी आए थे । जिठानी जी ने कहा । 
-बात कर रहे थे ?
-हाँ --बाबा जी मम्मी से कुछ कह रहे थे और चाची जी से भी बातें की थीं । चाची जी से तो बात करना सबको अच्छा लगता है । हमको भी अच्छा लगता है । वे हैं ही बहुत प्यारी  -प्यारी। ऐसा कहकर  बच्चे ने छोटी बहू का हाथ चूम लिया । 
-छोटी बहू ,अभी तुम नई -नई हो । ससुर से बात करना ठीक नहीं ।भौं टेढ़ी करते हुये वृद्धा बोली । 
- यदि  मुझसे कोई बात पूछे ,उसका भी जबाव न दूँ ?-----यह तो बड़ी अशिष्टता होगी !
दूसरे ही क्षण मेहमानों से भरे घर मेँ हर जुबान पर एक ही बात थी ---
छोटी बहू बड़ी तेज और जबानदराज है । 

* * * * *


सोमवार, 2 सितंबर 2013

अविराम साहित्यिकी त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित लघुकथा


माँ /सुधा भार्गव 














-बेटा ,एक ही बिल्डिंग में आमने- सामने के फ्लैट में हम लोग रहते हैं मगर मिले मुद्दत हो गई ।
-मुद्दत --!कमाल करती हो माँ !तीन दिन पहले ही तो आया था ।
-तीन दिन ही सही ,हमारे लिए तो तीन युगों के बराबर हैं ।
-क्या बताऊँ --!दफ्तर में बहुत काम था । देर से घर आया । आते ही बच्चे चिपट गए । दो घंटे खाना- खिलाना ,हंसी -ठट्ठा चलता रहा ।
-यह तो अच्छी बात है , तुम बच्चों को इतना प्यार करते हो ,आफिस में भी याद करते होगे । पर एक बात भूल जाते हो --हम भी अपने बच्चे के आने की राह तकते हैं । तुम्हारी शक्ल अपने सामने चाहते हैं ,उसे छू कर बात करना चाहते हैं । लेकिन तुम ---तुम्हारी तो नजरे ही नहीं उठतीं हमारी ओर --बात करना तो दूर । फोन से ही एक बार पूछ लेते --पापा कैसे हो ?
उनकी तरफ मुड़ते हुए उसने पूछा --- आप कैसे हो ?
पापा देख नहीं सकते थे पर कानों में बेटे की आवाज पड़ते ही लगा जैसे निर्जन वन में ठंडी फुआरें पड़ रही हों |
-पापा ,माँ मेरी बात नहीं समझ पातीं पर आप तो समझ सकते हैं --
मैं अकेली जान कहाँ -कहाँ जाऊं--। बच्चों को देखूँ कि बीबी को देखूँ --यहाँ आऊँ या आफिस जाऊं।
बेटे के मुख पर परेशानी की लकीरें देख माँ हिल उठी मानो उसके अंग अंग की धज्जियाँ उड़ रही हों ।
--मेरा तो बुढ़ापा है ,शायद बेटा ,-- सठिया गई हूँ । न जाने क्या -क्या कह गई । कहे सुने को यहीं दफन कर दे ।

एक हाथ से उसने कलेजा थाम रखा था और दूसरा हाथ था वृद्ध के कंधे पर ।
* * * * *    

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

यह लघुकथा दलित समाज पर आधारित है जो उम्मीद की किरणों के सहारे जिंदा हैं। क्या ये किरणें प्रकाश पुंज बन पाएँगी ?



सूरज निकला तो/सुधा भार्गव 


वह दलित थी ,उस पर भी बेचारी औरत जात !फिर तो दुगुन दलित । आदमी घर बैठे उसकी छाती पर मूंग दलता और बाहर -----रात के सन्नाटे मेँ उसकी चीखें हवा मेँ  घुल जातीं । सुनने वालों को सुकून ही मिलता ,दलित जो ठ्हरी!
पर माँ भी तो थी वह ,बस रख दिया तन -मन  गिरवी । एक ही आस , बड़ा बेटा पढ़ जाए तो दूसरों को संभाल लेगा।   शायद बुढ़ापा भी  सुधर जाए । धन के नाम पर एक झोंपड़ी जिसे गिराने की धमकियों ने नींद हराम कर दी थी । वर्षों पहले पूर्वजों के लगाए पेड़ों को ठेकेदार ने काट गिराए और बाकी पतिदेव के नशे की लत ने बेच खाये ।

आठवी पास  बेटा उस दिन चहकते हुये आया । बोला -माँ माँ देख तो इस अखबार मेँ  --। सरकार हमारा कितना ध्यान रख रही है । अब से हमारी जमीन ,हमारे पेड़ कोई नहीं छीनेगा । हम जंगल के राजा  थे और रहेंगे ।
-चुप भी रह । ये बातें पढ़ने मेँ ,सुनने मेँ  ही अच्छी लगती हैं । गुमराह करने की अच्छी साजिश है।  हवाई बातों को कागज पर उतारने मेँ भी काफी समय लगता है ।
-ठीक है ,कड़वे घूँट पीने की तो आदत है । अब सब्र के घूँट पीकर पेट भर लेंगे ।
-इतने बरस हो गए आजादी को ,किसी ने हमारी सुध ली ?
-लेकिन माँ 65 वर्षों के बाद हमारा सूरज तो  निकला । इसकी रोशनी फैलने मेँ समय तो लगेगा ।

अपने बेटे के चेहरे पर खिली उम्मीदों की पंखुड़ियों को वह मुरझाता हुआ नहीं देखना चाहती थी इसलिए  एक माँ जबर्दस्ती अपने होठों पर बरखा लाने की कोशिश करने लगी । 
* * * * * * *
प्रवासी दुनिया में प्रकाशित 



सोमवार, 26 अगस्त 2013

प्रवासी दुनिया में 26 अगस्त 2013 को प्रकाशित http://www.pravasiduniya.com/short-story-testament-sudha-bhargava


वसीयतनामा /सुधा भार्गव 













-बेटा ,तू हमेशा नाराज सा क्यों रहता है ?
-तुमने मेरे तकदीर जो खराब कर दी । न पढ़ाया न लिखाया न पेट भर किसी दिन खाना नसीब हुआ ।

-कहाँ से देता ----7-7 बच्चों का बाप--।
-देने को तो अब भी तुम्हारे पास बहुत कुछ है । बेटे की तीखी दृष्टि ने जर्जर काया को छेक दिया ।
-मेरे पास-- !मैं ही मज़ाक करने को मिला । टूटी डाली का पका-सड़ा फल ,कब्र में लटके पैर !किस काम का मैं !
-कहा न ---मेरा जीवन सँवारने के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ है ।बस अपनी वसीयत बना दो और साफ –साफ लिख दो –मरने के बाद मेरा एक –एक अंग दूसरों के काम आए पर उसकी कीमत मेरे बेटे श्रवण कुमार को सौप दी जाय ।
-खूब कहा बेटा !क्या सोच है तुम्हारी ! मान गया तुम्हें--- पर वसीयत क्यों लिखूँ ?

 -न –न  प्यारे बापू !ऐसा कभी न करना वरना बहुत से वारिस पैदा हो जाएँगे । फिर तो तुम्हारे शरीर की जो दुर्गति होगी--- –हे भगवान ! क्या तुम्हें मंजूर है ?
बाप ने याचना भरी नजरें उठाईं । बिगड़ैल घोड़े सा बेटा हिनहिना उठा-
 –रहम की भीख !क्यों ! अपने सुख की खातिर तूने हमेशा के लिए मुझे भूखे –नंगों के फ्रेम  में जड़ दिया । तब नहीं सोचा ,अब तो परमार्थ  की सोच ले । 
* * * * *