वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

बुधवार, 25 सितंबर 2013

अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित


लघुकथा डॉट कॉम पर भी मेरी  लघुकथा छोटी बहू पढ़ सकते हैं ।
http://laghukatha.com/565-1.html

छोटी बहू








बेटी की विदाइगी के समय आकाश की रुलाई फूट पड़ी और सुबकते हुए अपने समधी जी से बोला --भाई साहब ,मेरी बेटी  को सब आता है पर खाना बनाना नहीं आता है । 
समधी बने मनोहर लाल ने सहजता से कहा -कोई बात नहीं --आपने सब सिखा दिया ,खाना बनाना हम सिखा देंगे । 
सरस्वती के पुजारी समधी जी आज फूले नहीं समा रहे थे घर में पढी -लिखी बहू जो आ गई थी ।  जो भी मिलता कहते -भई ,पाँच -पाँच बेटियाँ विदा करने के बाद घर में एक सुघड़ बेटी आई है ।

 शाम का समय था कमरे मेँ बिछे कालीन पर एक चौकी रखी थी जिस पर चाय -नाश्ता सलीके से सजा था । नन्द -देवर अपनी भाभी  को घेरे बैठे थे और इंतजार मेँ थे कि कब घर की बड़ी बहू आए औए चाय पीना शुरू हो । 
कुछ मिनट बीते कि  जिठानी जी  धम्म से कालीन पर आकर बैठ गईं और बोली -हे राम ,मैं तो बूरी तरह थक गई ,मुझसे कोई  उठने को न कहना । और हाँ छोटी बहू  !मुझे एक कप चाय बना दो और तुम लोग भी शुरू करो । 
चाय केआर घूँटभरने शुरू भी नहीं हुये थे कि छोटे बेटे को ढूंढते हुये ससुर जी उस कमरे मेँ आ गए और बोले -रामकृष्ण तो यहाँ नहीं आया ?
 बड़ी बहू  ने जल्दी से सिर पर पल्ला डाल घूँघट काढ़ लिया । छोटी  बहू तुरंत खड़ी हो गई और एक कुर्सी खींचते हुये बोली -बाबू जी आप जरा बैठिए  मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ । भैया जी तो यहाँ नहीं आए । 
-न बहू ,मैं जरा जल्दी मेँ हूँ । चाय रहने दे । 
फिर बड़ी बहू से बोले -इंदा ,मैं चाहता हूँ अब से तुम भी पर्दा न करो ,नई बहू आजकल के जमाने की है । अब कोई पर्दा -सर्दा नहीं करता । 
-पहले जब मैं पर्दा नहीं करना चाहती थी तब मुझसे पर्दा कराया गया ,अब आदत पड गई तो कहा जा रहा है कि पर्दा न करो । अब तो मैं पर्दा करूंगी । 
नई नवेली बहू आश्चर्य से जिठानी जी की तरफ देख रही थी --यह कैसा पर्दा !बड़ों के प्रति जरा भी शिष्टता या आदर भावना नहीं !
मनोहर लाल जी बड़ी बहू के रवैये से खिन्न हो उठे । उसने नई दुल्हन का भी लिहाज न किया । अपना सा मुँह लेकर चले गए । 

उनके जाते ही एक वृद्धाने कमरे मेँ प्रवेश किया । 
--यहाँ कोई आया था ?जासूस की तरह पूछा । 
-हाँ !बाबू जी आए थे । जिठानी जी ने कहा । 
-बात कर रहे थे ?
-हाँ --बाबा जी मम्मी से कुछ कह रहे थे और चाची जी से भी बातें की थीं । चाची जी से तो बात करना सबको अच्छा लगता है । हमको भी अच्छा लगता है । वे हैं ही बहुत प्यारी  -प्यारी। ऐसा कहकर  बच्चे ने छोटी बहू का हाथ चूम लिया । 
-छोटी बहू ,अभी तुम नई -नई हो । ससुर से बात करना ठीक नहीं ।भौं टेढ़ी करते हुये वृद्धा बोली । 
- यदि  मुझसे कोई बात पूछे ,उसका भी जबाव न दूँ ?-----यह तो बड़ी अशिष्टता होगी !
दूसरे ही क्षण मेहमानों से भरे घर मेँ हर जुबान पर एक ही बात थी ---
छोटी बहू बड़ी तेज और जबानदराज है । 

* * * * *


सोमवार, 2 सितंबर 2013

अविराम साहित्यिकी त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित लघुकथा


माँ /सुधा भार्गव 














-बेटा ,एक ही बिल्डिंग में आमने- सामने के फ्लैट में हम लोग रहते हैं मगर मिले मुद्दत हो गई ।
-मुद्दत --!कमाल करती हो माँ !तीन दिन पहले ही तो आया था ।
-तीन दिन ही सही ,हमारे लिए तो तीन युगों के बराबर हैं ।
-क्या बताऊँ --!दफ्तर में बहुत काम था । देर से घर आया । आते ही बच्चे चिपट गए । दो घंटे खाना- खिलाना ,हंसी -ठट्ठा चलता रहा ।
-यह तो अच्छी बात है , तुम बच्चों को इतना प्यार करते हो ,आफिस में भी याद करते होगे । पर एक बात भूल जाते हो --हम भी अपने बच्चे के आने की राह तकते हैं । तुम्हारी शक्ल अपने सामने चाहते हैं ,उसे छू कर बात करना चाहते हैं । लेकिन तुम ---तुम्हारी तो नजरे ही नहीं उठतीं हमारी ओर --बात करना तो दूर । फोन से ही एक बार पूछ लेते --पापा कैसे हो ?
उनकी तरफ मुड़ते हुए उसने पूछा --- आप कैसे हो ?
पापा देख नहीं सकते थे पर कानों में बेटे की आवाज पड़ते ही लगा जैसे निर्जन वन में ठंडी फुआरें पड़ रही हों |
-पापा ,माँ मेरी बात नहीं समझ पातीं पर आप तो समझ सकते हैं --
मैं अकेली जान कहाँ -कहाँ जाऊं--। बच्चों को देखूँ कि बीबी को देखूँ --यहाँ आऊँ या आफिस जाऊं।
बेटे के मुख पर परेशानी की लकीरें देख माँ हिल उठी मानो उसके अंग अंग की धज्जियाँ उड़ रही हों ।
--मेरा तो बुढ़ापा है ,शायद बेटा ,-- सठिया गई हूँ । न जाने क्या -क्या कह गई । कहे सुने को यहीं दफन कर दे ।

एक हाथ से उसने कलेजा थाम रखा था और दूसरा हाथ था वृद्ध के कंधे पर ।
* * * * *    

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

यह लघुकथा दलित समाज पर आधारित है जो उम्मीद की किरणों के सहारे जिंदा हैं। क्या ये किरणें प्रकाश पुंज बन पाएँगी ?



सूरज निकला तो/सुधा भार्गव 


वह दलित थी ,उस पर भी बेचारी औरत जात !फिर तो दुगुन दलित । आदमी घर बैठे उसकी छाती पर मूंग दलता और बाहर -----रात के सन्नाटे मेँ उसकी चीखें हवा मेँ  घुल जातीं । सुनने वालों को सुकून ही मिलता ,दलित जो ठ्हरी!
पर माँ भी तो थी वह ,बस रख दिया तन -मन  गिरवी । एक ही आस , बड़ा बेटा पढ़ जाए तो दूसरों को संभाल लेगा।   शायद बुढ़ापा भी  सुधर जाए । धन के नाम पर एक झोंपड़ी जिसे गिराने की धमकियों ने नींद हराम कर दी थी । वर्षों पहले पूर्वजों के लगाए पेड़ों को ठेकेदार ने काट गिराए और बाकी पतिदेव के नशे की लत ने बेच खाये ।

आठवी पास  बेटा उस दिन चहकते हुये आया । बोला -माँ माँ देख तो इस अखबार मेँ  --। सरकार हमारा कितना ध्यान रख रही है । अब से हमारी जमीन ,हमारे पेड़ कोई नहीं छीनेगा । हम जंगल के राजा  थे और रहेंगे ।
-चुप भी रह । ये बातें पढ़ने मेँ ,सुनने मेँ  ही अच्छी लगती हैं । गुमराह करने की अच्छी साजिश है।  हवाई बातों को कागज पर उतारने मेँ भी काफी समय लगता है ।
-ठीक है ,कड़वे घूँट पीने की तो आदत है । अब सब्र के घूँट पीकर पेट भर लेंगे ।
-इतने बरस हो गए आजादी को ,किसी ने हमारी सुध ली ?
-लेकिन माँ 65 वर्षों के बाद हमारा सूरज तो  निकला । इसकी रोशनी फैलने मेँ समय तो लगेगा ।

अपने बेटे के चेहरे पर खिली उम्मीदों की पंखुड़ियों को वह मुरझाता हुआ नहीं देखना चाहती थी इसलिए  एक माँ जबर्दस्ती अपने होठों पर बरखा लाने की कोशिश करने लगी । 
* * * * * * *
प्रवासी दुनिया में प्रकाशित 



सोमवार, 26 अगस्त 2013

प्रवासी दुनिया में 26 अगस्त 2013 को प्रकाशित http://www.pravasiduniya.com/short-story-testament-sudha-bhargava


वसीयतनामा /सुधा भार्गव 













-बेटा ,तू हमेशा नाराज सा क्यों रहता है ?
-तुमने मेरे तकदीर जो खराब कर दी । न पढ़ाया न लिखाया न पेट भर किसी दिन खाना नसीब हुआ ।

-कहाँ से देता ----7-7 बच्चों का बाप--।
-देने को तो अब भी तुम्हारे पास बहुत कुछ है । बेटे की तीखी दृष्टि ने जर्जर काया को छेक दिया ।
-मेरे पास-- !मैं ही मज़ाक करने को मिला । टूटी डाली का पका-सड़ा फल ,कब्र में लटके पैर !किस काम का मैं !
-कहा न ---मेरा जीवन सँवारने के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ है ।बस अपनी वसीयत बना दो और साफ –साफ लिख दो –मरने के बाद मेरा एक –एक अंग दूसरों के काम आए पर उसकी कीमत मेरे बेटे श्रवण कुमार को सौप दी जाय ।
-खूब कहा बेटा !क्या सोच है तुम्हारी ! मान गया तुम्हें--- पर वसीयत क्यों लिखूँ ?

 -न –न  प्यारे बापू !ऐसा कभी न करना वरना बहुत से वारिस पैदा हो जाएँगे । फिर तो तुम्हारे शरीर की जो दुर्गति होगी--- –हे भगवान ! क्या तुम्हें मंजूर है ?
बाप ने याचना भरी नजरें उठाईं । बिगड़ैल घोड़े सा बेटा हिनहिना उठा-
 –रहम की भीख !क्यों ! अपने सुख की खातिर तूने हमेशा के लिए मुझे भूखे –नंगों के फ्रेम  में जड़ दिया । तब नहीं सोचा ,अब तो परमार्थ  की सोच ले । 
* * * * *

शनिवार, 1 जून 2013

लघुकथा



कलेजे का दर्द /सुधा भार्गव 









इकलौता बेटा आस्ट्रेलिया से वापस आ रहा है ,बुढ़ापे में उनको सहारा मिलेगा --माँ -बाप की खुशी का ठिकाना नहीं । बाप ने ऊपर की मंजिल के कमरे बाथरूम आधुनिक उपकरणों से सजा दिये  ताकि बहू बेटे शान से रहें । पोती करीब चार माह की थी ,उसकी परवरिश के लिए एक आया का भी इंतजाम हो गया । बेटा आया ,माँ बाप ने उसे कलेजे से लगा लिया । दूसरे दिन चाय -नाश्ते के समय  बहू तो  नीचे उतर कर आई पर  बेटा नही । माँ -बाप ने संतोष कर लिया थकान अभी दूर नहीं हुई है  इसीलिए नीचे नहीं आ पाया । शाम को भोजन  के समय सब इकट्ठे हुये । 
-बेटा ,अब तुम बिना किसी चिंता के काम पर जा सकते हो । मैं तो सुबह बजे ही चला जाता हूँ । कहो तो तुम्हें तुम्हारे आफिस छोडता जाऊं। तुम्हारी कार आने में तो समय लगेगा ।
 -पापा ,आफिस तो मैं  चार -पाँच दिनों बाद जाऊंगा । 

एक हफ्ता निकल गया पर बेटा सारे दिन बीबी के पास बैठा रहता । ऐसा लगता माँ -बाप से आँखें चुरा रहा है । बाप की अनुभवी आँखें ताड़ गईं और टोक दिया -बेटे तुम अपने  काम पर नहीं गए ?
-पापा ,काम ढूँढना पड़ेगा ,आस्ट्रेलिया में मेरी  नौकरी छूट गई थी । 
-तो जल्दी ढूंढो । 
-जल्दी किस बात की है ?अभी -अभी तो आया हूँ ,साँस तो लेने दो .... । काम करने के लिए आस्ट्रेलिया क्या कम था !
-जल्दी है । जानते हो !बाप के कलेजे में सबसे तीखा दर्द कब उठता है ?
बेटा कुछ समझ न सका और उत्तर की आशा में उसकी आँखें ठहर सी गईं । 
-जब उसका जवान  बेटा बाप की रोटी तोड़ता है । 


(प्रवासी दुनिया  अंतर जाल पत्रिका में प्रकाशित  )

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

काली माटी लघुकथा संकलन


 काली माटी पर चर्चा 
तथा
उससे  उद्घृत कुछ लघुकथाएं




काली माटी में मालवा -अंचल के कुल 57 कथाकारों की करीब 140 से ऊपर रचनाएँ संकलित हैं जिनमें उनकी विशिष्ट आभा परिलक्षित होती है । ये भाषा -शैली ,कथा -कथोकथन की दृष्टि से भी मँजी हुई हैं ।

इसके संपादक हैं -सुरेश शर्मा
संपर्क -दूरभाष 0731-2553260/ 09926080810
 इसके प्रकाशन में वरिष्ठ कथाकार ,आलोचक श्री बलराम अग्रवाल का विशेष सहयोग रहा ।

प्रकाशक
मनु प्रकाशन
1/6678,गली नम्बर 3
पूर्वी रोहतास नगर
शाहदरा ,दिल्ली -110032
मूल्य-150.00 रुपए

काली माटी में पनपी तीन लघुकथाएं पढ़िये ------

1 --बनैले सुअर / विक्रम सोनी

दिशा -मैदान से फारिग होकर पंडित रामदयाल मिश्र और रघुनाथ चौबे लौट रहे थे कि  रास्ते में पोस्टमैन चिट्ठी पकड़ाकर चला गया । हाथ में पत्र लिए दोनों एक -दूसरे का मुंह ताकने लगे । चौबे बोले -पंडित जी ,चलो ,चुल्लू भर पानी में डूब मरें । अरे हम कहलाते पंडित हैं ,मगर कागज का चेहरा तक नहीं बांच सकते हैं । धिक्कार है हमारी पंडिताई पर ।

-पता नहीं बेटे की चिट्ठी है ,बहू की है ,समधी  की है या किसी रिश्तेदार की । पोस्ट मैन  भी सुसरा कार्ड पकड़ाकर सट्ट से भाग गया । अब किससे पढ़वायें !
 रामदयाल पर घड़ों पानी पड़  चुका था ।
तभी शहर की तरफ से बिसुआ चमार का बेटा झोला टाँगे आते देखा । पंडित रामदयाल ने उसे करीब बुलाकर कहा -बेटा ,तू शहर में पढता है न ?ले कार्ड तो बांच दे ।

बिसुआ के बेटे ने पत्र पढ़कर हाल सुना दिया । पंडित रामदयाल खुशी से उछल पड़े । उनकी बहू को बेटा हुआ है । कल वह गाँव आ रही है । अब उनके घर पर भी एक पढ़ता बेटा होगा । उनका सीना गज भर का हो गया । पत्र लौटाकर बिसुआ चमार का बेटा अभी बीस कदम ही आगे बढ़ा होगा कि  चौबे अपना लोटा हथेली पर ठोंकते हुए बोले -पंडितजी  ,धिक्कार है हमारी कौम पर । अरे पंडित जाति  की चिट्ठी चमार पढ़े ?इसकी इतनी हिम्मत ----?
और दोनों ने बिसुआ के बेटे को लोटों से ही  मार -मारकर वहीं ख़त्म कर दिया ।

2 --तिरस्कार बनाम स्वीकार / मीरा जैन

अधेड़ दम्पति सांध्य भ्रमण के लिये पैदल निकले । कुछ दूरी तय करने के पश्चात टू व्हीलर चलाती हुई एक आधुनिक कट मार उनके करीब से गुजर गई । उसकी इस हरकत से खफा कुछ उखड़ा  मिजाज लिए पति ने पत्नी से कहा --
आजकल की लड़कियां ,लड़कियां तो बची ही नहीं ,आचरण से पूरी की पूरी आदमी हो गई हैं ,न इनमें मर्यादा ,सहनशीलता ,न बोलने का ढंग ,न पहनने का तरीका ,न सामंजस्य की आदत ,गुस्सा तो नाक पर ही बैठा रहता है --पूरी तरह वाहियात हो गई हैं ।
पति के विचारों को सुन हरदम शांत रहने वाली पत्नी ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ यूँ व्यक्त की --
-चलिए देर से ही सही ,आखिरकार आपको आदमी की परिभाषा तो समझ में आई ,आपने कबूल तो किया आदमी कैसा होता है ।

3 --महामानव /डॉ तेजपाल सोढ़ी

वे चार संभ्रान्त धनी व्यक्ति कार में एक घायल लावारिस व्यक्ति को गाँव के छोटे से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लाये । घायल को चिकित्सक के सुपुर्द करते  हुए बोले-
-सड़क पर पड़ा  था । शायद कोई ट्रक वाला  टक्कर मार गया । हम उधर से गुजर रहे थे ,मानवता के नाते ले आये ।
चिकित्सक ने घायल की जांच की ,तो पाया वह बेहोश था । सर पर गहरी चोट लगी थी । चिकित्सक ने   उन संभ्रान्त मानवों से कहा -
इसे तत्काल शहर के लिए बड़े अस्पताल में भेजना पड़ेगा ,यहाँ पर्याप्त साधन नहीं हैं । एम्बुलेंस का शुल्क तो मैं माफ कर दूंगा ,किन्तु  एम्बुलेंस के डीजल के लिए  डेढ़ सौ रूपये चाहिए । पचास रूपये मैं दे रहा हूँ ,शेष  सौ रुपयों की सहायता आप कर दें ।

पैसों की बात सुनकर वे चारों धीरे-धीरे खिसकने लगे। भीड़ में एक महिला यह दृश्य देख रही थी ।,वह तत्काल चिकित्सक के समक्ष  आई और सौ रुपए का नोट निकालकर बोली -
-डॉ साहब ,इसे तत्काल बड़े अस्पताल ,इंदौर भेज दें ,बेचारा बच जाएगा ।
डॉक्टर  ने जैसे ही महिला को देखा ,तो पहचान गया और आश्चर्य से बोला --
-अरे तुम !तुम सौ रुपए दे रही हो ,तुम्हें तो मैं पिछले चार दिनों से तुम्हारे दमा के लिए बाजार से दवा लाने के लिए कह रहा था ,तुम रोज मना कर देतीं कि डाक्टर साहब पैसे नहीं हैं । शायद तुम झूठ बोल रही थीं ।

-नहीं डाक्टर साहब !मैं झूठ नहीं बोल रही थी ,कल मेरा भाई देवास से आया था ,वही इलाज के लिए ये सौ रुपए दे गया था ,किन्तु अभी ये पैसे इस लावारिस का जीवन बचा सकते हैं । मैं  दो -चार दिन बाद दवा खरीद लूँगी । कहकर उस महिला ने सौ रुपए का नोट चिकित्सक के हाथ पर रख दिया ।
चिकित्सक ने हिकारत से उन जाते हुये मानवों को देखा और फिर श्रद्धा से हाथ जोड़कर उस महमानव का अभिवादन किया ।

समाप्त





मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

संग्रह चर्चा-- लघुकथाएं जीवन मूल्यों की


  


 इस संग्रह का प्रथम संस्करण फरवरी 2013 में प्रकाशित हुआ है ।
सम्पादन सुकेश साहनी रामेश्वर काम्बोजहिमांशु ने किया है ।
प्रकाशक –हिन्दी साहित्य निकेतन
16साहित्य विहार
बिजनौर (उ प्र )246701
मूल्य-पचास रुपए मात्र 


यह निर्विवाद सत्य है कि  मनुष्य अपने में खोता जा रहा है और  स्वयंकेन्द्रित होने के कारण मानव मूल्य कगार पर खड़े सिसक रहे हैं । नैतिकता विहीन भटकन को  राह पर लाने के लिए इस संग्रह की लघुकथाएं उपयोगी ही नहीं अपितु बेहतर व स्वस्थ  समाज के सृजन की पृष्ठ भूमि तैयार करती हैं ।  इस पुस्तक में पृष्ठ 4-अपनी बात में ठीक ही कहा गया है –ये लघु कथाएँ सामाजिक प्रदूषण में प्राण वायु का काम करेंगी ।

96 पृष्ठों के इस संग्रह में अनेक धुरंधर लघुकथाकारों की रचनाएं हैं जो सूक्ष्म होते हुये भी अपनी  सूक्षमता के कणों से संवेदना  जगाकर हृदय को बेचैन  कर देती हैं ।

कथा संग्रह से चुनी तीन लघुकथाएं पढ़िये । 

1--पहुँचा हुआ फकीर /भूपिंदर सिंह

एक कमरा कह लो ,या छोटा घर ।
वहीं सास ससुर ,वहीं पर बड़ी नन्द ,वहाँ ही छोटा देवर और एक तरफ पति –पत्नी की दो चारपाइयाँ ।
बहू को दौरा पड़ने लगा । पलों में ही हाथ –पैर ढीले हो जाते । हाथों की उंगलियां मुड़ जातीं । ओठों का रंग नीला पड़ जाता । हकीमों की जड़ी –बूटियाँ देखीं ,डाक्टरों के टीके भी कराये ,पर फायदा कुछ न हुआ ।
किसी ने एक फकीर के बारे में बताया । सात मील पर उसका डेरा था । पति ने उसे साइकिल पर बैठाया और चल दिया । रास्ते में एक बगीचा आया । हैंडल चुभने का बहाना लगाकर पत्नी उतर गई । दोनों बैठ गये , जी भरकर बातें  कीं । फिर उनकी आत्माएं एक हो गईं । दोनों को रोकने –टोकने वाला कोई न था ,जो मन में आया किया ।
-आज की यात्रा से फूल सा हल्का महसूस कर रही हूँ ,बाबा जी ,जैसे कि कोई रोग ही न हो । डेरे पर पहुँचकर उसने कहा ।
-तो हर बुधवार ,बीस चौकियाँ भरो बेटी । दावा –दारू की जरूरत नहीं । महाराज भली करेंगे ।

2--जेबकतरा /ज्ञान प्रकाश विवेक

बस से उतरकर जेब में हाथ डाला । मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी । जेब में था भी क्या ?कुल नौ रुपए और एक खत ,जो मैंने अपनी माँ को लिखा था कि मेरी नौकरी छूट गई है । अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा । तीन दिनों में वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था ।,पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था ।

नौ रुपए जा चुके थे । यूं नौ रुपये कोई बड़ी बात नहीं थी ,लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो । उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते । 
कूछ दिन गुजरे ,माँ का खत मिला ,पढ़ने से पूर्व मैं  सहम गया ,जरूर पैसे भेजने का लिखा होगा ,लेकिन खत पढ़कर मैं हैरान रह गया । माँ ने  लिखा था ,बेटा ,तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है । तू कितना अच्छा है रे !पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता ।

मैं इसी उधेड्बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा ?
कुछ देर बाद एक और पत्र मिला । चंद लाइनें थीं ,आड़ी –तिरछी । बड़ी मुश्किल से पत्र पढ़ पाया । लिखा था ,भाई नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर ,मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है । फिकर न करना । माँ तो सबकी एक –जैसी होती है न !वह क्यों भूखी रहे ?तुम्हारा जेबकतरा ।

3--रिश्ते का नामकरण/दलीपसिंह वासन 

उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है । रात को स्टेशन पर ही रहेगी । प्रात;वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी । मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था ।पहले घट चुकी एक –दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी ।

-आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है । आप मेरे साथ चलें ,मैं किसी के घर में आपके ठहर  ने का प्रबंध कर देता हूँ ।जब हम गाँव से गुजर रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया –मैं इस  चौबारे में रहता हूँ ।
-अटैची जमीन पर रख वह बोली –थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं । मैं हाथ –मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी ।

बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों  कमरे में आ गए ।
-आपके साथ और कौन रहता है ?
-मैं अकेला ही रहता हूँ ।
-बिस्तर तो दो लगे हुये हैं ।
-कभी –कभी मेरी  माँ आ जाती हैं ।
गुसलखाने में जाकर उसने मुंह –हाथ धोये । वस्त्र बदले । इस दौरान मैं दो कप चाय बना लाया । 
-आपने रसोई भी रखी हुई है ।
-यहाँ कौन सा होटल है !
-फिर तो खाना भी यहीं खाऊँगी ।
बातों –बातों में रात बहुत गुजर गई थी और वह माँ वाले बिस्तर पर  लेट भी गई थी ।

मैं सोने का बहुत प्रयास कर रहा था ,लेकिन नींद नहीं आ रही थी । मैं कई बार उठकर उसकी चारपाई तक गया था । उस पर हैरान था । मुझ में मर्द जाग रहा था ,परंतु उसमें बसी औरत गहरी नींद सोई थी ।
मैं सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर जाकर टहलने लग गया । कुछ देर बाद वह भी छत पर आ गई और चुपचाप टहलने लगी ।
-जाओ सो जाओ ,सुबह आपने ड्यूटी  पर हाजिरी देनी  है । मैंने कहा ।
-आप सोये नहीं ?
-मैं  बहुत देर तक सोया रहा हूँ ।
-झूठ ।
वह बिलकुल मेरे सामने आ खड़ी हुई ,’अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपको उनींदे नहीं रहना था । 
-नहीं –नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं । और मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया
समाप्त 

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

सृजयमान ( सृजनात्मक साहित्य वार्षिकी पत्रिका २०१२ लुधियाना ) में प्रकाशित

मेरी दो लघुकथाएं

1--बंद ताले /सुधा भार्गव 


छोटे भाई की शादी थी । दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड ,हाथ पैर ठिठुरे जाते थे पर बराती बनने की उमंग में करीब १२० बराती लड़कीवालों के दरवाजे पर एक दिन पहले ही जा पहुंचे । 

पिताजी सुबह की गुनगुनी धूप का आनंद लेने के लिए  जनमासे में  चहल कदमी करने लगे । कुछ दूरी पर उन्होंने देखा ५ --६ युवकों की एक टोली बड़े जोश में बातें कर रही है । 
-क्या बात है,तुम लोग नहाये नहीं !। पिताजी ने पूछा
-
कैसे नहायें अंकल ,बाथरूम में बाल्टी ही नहीं हैं ।
-
अभी बाल्टियाँ मंगवाए देता हूं और क्या चाहिए वह भी देख लो ।
-
मेरे बाथरूम में तौलिया भी नहीं है दूसरा युवक बोला ।
-
ठीक है चुटकी बजाते ही सब हाजिर हो जायेगा । 

पिताजी तो चले गये पर लड़कों का लाउडस्पीकर चालू था ।
-
जब इंतजाम नहीं कर सकते तो ये लड़कीवाले बारातियों को बुला  क्यों लेते  हैं ।
-
अरे दोस्त लगता है  ये सस्ते में टालने वाले हैं । हम ऐसे सस्ते में टलने वाले नहीं ।
उनकी बातें विराम पर आना ही नहीं चाहती थीं लेकिन सामने से एक सेवक को  बाल्टियों और तौलियों से लदा -फदा देख उनके मध्य मौन पसर गया -
                                                                           
एक बुजुर्ग महाशय को जब यह पता चला कि बारातियों की  मांगे खुद पिताजी पूरा कर रहे हैं तो उनसे यह भलमानसता  सही न गई ।
बोले- --त्रिवेदीजी  लड़के के पिता होकर समधी  के सामने इतना  झुकना ठीक नहीं । आखिर हम सब हैं तो बराती बराती तो बराती ही होते हैं ।

-लड़के -लडकी का रिश्ता हो जाने के बाद दो परिवार एक हो जाते हैं।  मेरी तो यही कोशिश रहेगी कि दोनों 
के सुख -दुःख ,मान -अपमान  की कड़ियाँ इस  प्रकार बिंधी रहें कि भोगे एक तो अनुभूति हो दूसरे को।  पिताजी  शांत स्वर में बोले । 
सुनने वालों के दिमाग के ताले खुल चुके थे ।
 


2---तुम महान थे /सुधा भार्गव 





अनाथालय के अध्यक्ष महोदय ने भाषण दिया --
-पछले वर्ष 50 अनाथ बच्चों को सनाथ बनाया गया  ।गोद  लेने से पहले उनके होने वाले माता -पिता  की अच्छी तरह से जाँच -पड़ताल की गई ।जब पूरी तरह तसल्ली हो गई कि असीमित प्यार लुटाते हुए वे असीम गहराई के साथ उनका भविष्य निर्माण करेंगे तभी  गोद देने की कार्यवाही पूरी हुई ।सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा ।

भाषण फिर चालू हुआ -पांच वर्ष पूर्व दिए  बच्चों के अभिभावकों को हमने इस समारोह में विशेष रूप से आमंत्रित किया है ताकि बच्चों से सम्बंधित उपलब्धियों को जान कर गर्व का अनुभव किया जा सके ।
भाषण समाप्ति के बाद एक विशिष्ट देश का नागरिक खड़ा हुआ ।
-मैं गोद लिए बच्चे  के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ ।
सब की नजरें उस पर केन्द्रित हो गईं ।
विलियम मेरा दत्तक पुत्र ---तुम महान थे |मेरा पुत्र 11वर्ष का हो गया था ।  
 उसने न जाने  कितनों का जीवन सँवार दिया ।अपनी एक जिन्दगी के बदले 10 को नई जिंदगियाँ दे गया ।लेकिन मुँह से उफ तक न की ।
सुनने वाले  सकपका  गए ।
--आप कहना क्या चाहते हैं ।अध्यक्ष के धैर्य की दीवार ढह गयी ।

विदेशी ने फिर कहना शुरू किया --पिछले माह बम विस्फोट के कारण  स्कूल बच्चों की लाशों से पट गया ।अस्पताल  बच्चों की दर्दनाक चीखों से हिल गया ।विलियम ने जीतेजी अपनी दोनों खूबसूरत आँखें और गुर्दे दूसरों के लिए दान कर दिए ।अफसोस ! उसके दिल का उपयोग न हो सका ।कमजोरी के कारण अचानक उसके ह्रदय की गति रुक गई ।लेकिन उसका बहुत बड़ा दिल था।मेरे प्यारे विलियम --तुम महान  थे । 
सुनने वाले समझ  नहीं पा रहे थे कि वे हँसें या  रोयें , दाद दें अध्यक्ष महोदय की या उस विदूषक की जो अपने को विलियम का पिता कहता था ।
* * * * *

रविवार, 31 मार्च 2013

लघुकथा संग्रह चर्चा


विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ 

पंजाबी  लघुकथाकारों की  कुछ रचनाएं

प्रथम बार मुझे  पंजाबी मिन्नी कहानियों (लघुकथा )का हिन्दी में अनुवाद किया हुआ तीसरा संग्रह-विगत दशक  की पंजाबी लघुकथाएं को पढ़ने का अवसर मिला ।इसे मुझे रामेश्वर काम्बोज 
'हिमांशु 'ने भेंट किया था ।
  
इसके सम्पादक श्याम सुन्दरअग्रवाल तथा डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति हैं ।

प्रकाशक है -

अयन प्रकाशन

1/20 महरौली ,नई दिल्ली - 1100030

मूल्य -260.00 रुपये 

दूरभाष :26645812/9818988613

e.mail:ayanprakashan@rediffmail.com 




इस संग्रह में जनजीवन से जुड़ी विविध विषयों  पर लिखी  लघुकथाएं   
जिज्ञासा के पुल पर रुचिता लाते हुए संवेदना से सारोवार, दिल में घर कर लेती हैं । अधिकांशत मिन्नी कथाओं के  पात्र रोने झींकने व् सिसकने में विशवास नहीं  करते   बल्कि समस्या का समाधान ढूँढ़ते हुए जीने की इच्छा रखते हैं --वे निराशावादी न होकर उनमें  कुछ कर गुजरने की कशिश  है ।

सकारात्मक दृष्टिकोण से  इनमें चेतना के स्वर सुनाई देते है चाहे वह नारीमंच हो या निम्न वर्ग
रिश्तों का अटूट बंधन हो या उनकी टूटन -- अनेक लघुकथाओं में एक बेहतर समाज के दर्शन  होते हैं और भविष्य के प्रति हम आशान्वित हो उठते हैं ।  

संग्रह से यहाँ  तीन लघुकथाएँ उद्घृत की जा रही हैं जो अपने में विशेष हैं ।  


1--भूकंप/कर्मजीत सिंह नडाला(डॉ)

बेटा सोलह वर्ष का हुआ तो वह उसे भी साथ ले जाने लगा ।
“कैसे हाथ –पाँव टेढ़े –मेढ़े करके चौक के कोने में  बैठना है ,आदमी देख कैसे ढीला सा मुंह बनाना है । लोगों  को बुद्धू बनाने के लिए द्या का पात्र बनकर कैसे अपनी ओर आकर्षित करना है । ऐसे बन जाओ कि सामने से गुजर रहे आदमी का दिल पिघल जाये और सिक्का उछलकर तुम्हारे कटोरे में  आ गिरे। “
वह सीखता रहा और जैसा पिता कहता ,वैसा बनने की कोशिश भी करता  फिर एक दिन पिता ने पुत्र से कहा –जा अब तू खुद ही भीख मांगा कर ।
पुत्र शाम को घर लौटा । आते ही उसने अपनी जेब से रुपए निकालकर पिता की ओर बढ़ाए –ले बापू ,मेरी पहली कमाई ---।
-हैं !कंजर !पहले दिन ही सौ रुपये !इतने तो कभी मैं आज तक कमाकर नहीं ला सका ,तुझे कहाँ से मिल गए ?
-बस ऐसे ही बापू ,मैं तुझसे आगे निकल गया ।
-अरे कहीं किसी की जेब तो नहीं काट ली। 
-नहीं,बिलकुल नहीं।
-अरे आजकल तो लोग बड़ी फटकार लगाकर भी आठ आने –रुपया बड़ी मुश्किल से देते हैं—तुझ पर किस देवता की मेहर हो गई ?
-बापू ,अगर ढंग से मांगो तो लोग आप ही खुश होकर पैसे दे देते हैं ।
-तू कौन से नए ढंग की बात करता है ,कंजर ?पहेलियाँ न बुझा । पुलिस की मार खुद भी खाएगा और हमें भी मरवाएगा । बेटा अगर भीख मांग कर गुजारा हो जाए तो चोरी चकारी की क्या जरूरत है ?पल भर की आँखों की शर्म है –हमारे पुरखे भी  यही कुछ करते रहे हैं ,हमें भी यही करना है । हमारी नसों में  भिखारियों वाला खानदानी खून है ---हमारा भी यही रोजगार है ,यही कारोबार है । ये खानदानी रिवायतें कभी बदली हैं?तू आदमी बन जा ---।
-बापू आदमी बन गया हूँ ,तभी कह रहा हूँ । मैंने पुरानी रिवायतें  तोड़ दी हैं । मैं आज राज मिस्त्री के साथ दिहाड़ी करके आया हूँ । एक कॉलोनी में किसी का मकान बन रहा है । उन्होंने  शाम को सौ रुपये  दिये । सरदार कह रहा था ,रोज आ जा या कर ,सौ रुपए मिल जाया करेंगे ---।
-पिता हैरान हुआ । कभी बेटे की ओर देखता ,कभी रुपयों की ओर । यह लड़का कैसी बातें कर रहा है । आज उसकी खानदानी रियासत में भूकंप  आ गया था ,जिसने सब कुछ उलट पुलट दिया था ।

2-- बदला हुआ स्वर/सतिपाल खुल्लर

हू उसके आगे रोटी की थाली और पानी का गिलास रख गई थी । वह चुपचाप रोटी खाने लगा ।
-यह भी कोई जिंदगी है !पिछले कई वर्षों से ऐसा ही चल रहा है । घर में कोई समारोह हो ,उससे पूछा तक नहीं जाता । सभी को चाय –पानी पिलाने के बाद उसकी बारी आती है । रोटी खाते हुये वह सोच रहा था । 
उसे लगा ,वह तो जैसे घर का सदस्य ही नहीं । फिर उसे अपने पिता की याद आई जो सौ वर्ष की उम्र भोग कर मरा था । कितना दबदबा था उसका घर में । वह अपने पिता का ध्यान भी तो बहुत रखता था । लेकिन उसकी पत्नी और बच्चे  उसकी सेवा से बहुत दुखी थे ।कभी –कभी उसे लगता कि अपनी इस अवस्था के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है ।
-मैंने इस सब्जी से रोटी नहीं खानी । मेरे लिए कोई और सब्जी बनाओ । गाजर की सब्जी से उसके पिता को जैसे चिढ़ थी ।
-बापू ,ऐसे न किया कर । उस दिन उसने जैसे अपनी बेबसी जाहिर की थी   ।
-ये मेरा पाठ करने वाला मोढ़ा और गुटका है ,उन्हें यहाँ से कोई  न हिलाये । मैंने सौ बार कहा है पर किसी पर कोई असर ही नहीं होता ।
-बापू ,धीरे बोल ---।
-मुझे किसी का डर है ?यह मेरा घर है ,मैंने इसे अपने इन हाथों से बनाया है । बापू क्रोध में और भी ऊंचे स्वर में बोलता ।
-यह बात तो ठीक है । पर उसे लगता कि बापू  व्यर्थ ही क्लेश किए रखता है ।
इस तरह की बातें घर में नित्य  ही होती रहती थीं । तब वह  सोचता –मैं यह सब नहीं करूंगा । जो पकाया ,बनाया हुआ होगा ,वही खा लिया करूंगा । चारपाई पर बैठा राम –राम करता रहूँगा । जिंदगी का क्या है ,आदमी को जीने का ढंग आना चाहिए ।
पर अब उसे लागने लगा कि वह तो बस रोटी खाने का ही साझेदार है । घर में उसका कोई अस्तित्व ही नहीं । आज रोटी खाते हुये वह बापू को याद कर रहा था । बापू ठीक ही तो कहता था –आदमी को घर में अपना अस्तित्व तो बनाकर रखना ही चाहिए । कोई काम तो हो । भोजन करने के बाद आम दिनों के विपरीत वह ज़ोर से खांसा और अपने पोते को आवाज दी ,जैसे बापू उसके बेटे को बुलाया करता था । आवाज सुनकर घर वालों के कान खड़े हो गए ।
-हैं ---दादा जी !यह तो दादाजी की आवाज है । उसका अपना बेटा ही अपनी माँ की ओर देखकर बोला ।
 इससे पहले वह कभी ऊंची आवाज में नहीं बोला था । उसकी पत्नी भागकर आई । फलभर के लिए उसे लगा ,जैसे उसका पति नहीं ,उसका ससुर उसके सामने बैठा हो ।
--सुनो ,आगे से सब्जी मुझ से पूछकर बनाया करो । वह अपनी बहू को सुनाता हुआ बोला । 


3--मंदिर /जसबीर बेदर्द लंगेरी

सुरिंदर ने कोठी बनवाने से पहले अपने आर्कीटेक्ट दोस्त को घर बुलाया और कहा -यार विजय  !कोठी बनानी है ,एक अच्छा सा नक्शा बनादे और मुझे समझा भी दे । 
-सुरिंदर ,मेरे पास कई नक़्शे बने पड़े  हैं …यह देख ,यह अभी बनाया है । इसमें सब कुछ अपनी जगह पर पूरी तरह फिट है ।।पर एक चीज फालतू है , काम की नहीं ---यह छोटा सा पूजा वाला कमरा ,क्योंकि आप हुए तर्क शील । 
-नहीं यार ,यह कमरा तो बहुत जरूरी है । यह तो एक साइड पर  है और छोटा भी । हमें तो यह कमरा बड़ा चाहिए ,साथ में हवादार भी । इसमें हमने भी मूर्ति रखनी है ,वह भी जीती जगती ,जिसके हर समय दर्शन होते रहें । सुरिंदर बोला । 
-जीती जागती मूर्ति !वह कौन सी ?विजय ने हैरान होते हुए कहा  । 
-यह देख हमारे भगवान् की मूर्ति । सुरिंदर ने सोफे पर साफ- सुथरी वस्त्रों में बैठी अपनी माँ के गले में पीछे से बांह डालते हुए कहा । 
-बेटा विजय ,समय चाहे बदल गया ,फिर भी माओं ने सरवन बेटों को पैदा करना बंद नहीं किया है . माँ ने भावुक होते हुए कहा . 
-वाह कमाल है भई !जिस घर में बिजुर्गों का इतना सम्मान हो ,वहां मंदिर बनाने की क्या जरूरत है । वह तो घर ही मंदिर है ---ठीक है ,मैं सब समझ  गया । अच्छा मैं कल आऊंगा । 
इतना कह विजय उठने लगा तो सुरिंदर की पत्नी चाय और बिस्कुट मेज पर  रखते हुए बोली --भाई  सा --ब !मंदिर से खाली हाथ नहीं जाते । यह लो प्रसाद ।  

समाप्त