वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

अपने -अपने क्षितिज में प्रकाशित

मेरी चार लघुकथाएँ 



1-चाहत अनचाहत 

-बेटा , तुम्हें आए कई दिन हो गये .यहाँ तुम्हारे चचा -ताऊ का कुनबा भी है । उनसे भी मिल लो।
-पापा, सब तो अपने-अपने काम में लगे हैं। किसे फ़ुर्सत है मिलने की। फिर भी आप कह रहे है तो उनके यहाँ जाने से पहले फोन कर लेता हूँ। मुझे उनके फ़ोन नम्बर दे दीजिए ।
-ये हुई बात।लिख, मैं बोलता हूँ।
नम्बर देने के बाद पापा नहाने चले गए पर आते  ही पूछना न भूले - हो गई बातें?
-न पापा, लगता है आप नंबर ग़लत-सलत बोल गए हो। तीन में से एक नम्बर भी तो नहीं मिला.  
-
जरूर नेट की गड़बड़ होगी।थोड़े देर बाद एक बार और फोन कर लेना
शाम को डिनर करते समय फिर वही बात – मेरे भतीजे बिन्नी-शिन्नी क्या बोले? कब मिल रहे हो तुम लोग ?
-
मैं दो-दो बार फ़ोन कर चुका हूँ। किसी को बातें करनी होतीं तो ज़रूर मेरी मिस  कॉल का जबाव देते।
-
फ़ोन का चक्कर छोड़! बेकार समय खराब कर रहा है। सीधा मिलने क्यों नहीं चला जाता। अपने ही घर वाले तो हैं। तुझे अचानक देख तो बहुत ही ख़ुश होंगे। तुम्हारे बचपन के लड़ाई-झगड़े, हँसी-ठिठोली मुझे अभी तक याद है।
-
पापा बचपन की बातें छोड़ो, बचपन बीता तो उसकी यादें भी धुँधली पड़ने लगती हैं।बड़े होने पर लोग बदल भी जाते हैं।
तभी तो किसी ने फ़ोन करने का कष्ट न किया। चाहत के रिश्तों के लिए तो जान भी दी जा सकती है पर अनचाहत का बोझ लेकर नहीं चला जाता।

2-एक छुअन
उसे बुखार ने जकड़ लिया था और एक बार जकड़ा तो ऐसा जकड़ा कि वह उसकी गिरफ्त से छूट ही नहीं पाया। दूसरों के  चार काम करने वाला अब अपना एक काम भी नहीं कर पा रहा था। पहले उसे एक सँभालता था ,अब उसे चार-चार संभालते हैं । एकांत क्षणों में वह उदास आँखों से शून्य में निहारा करता।
उस दिन पत्नी उसका सिर सहला रही थी,साथ-साथ वर्षों बिताए दाम्पत्य जीवन के अनगिनत  आत्मीय –अनुराग भरे स्वरों की खनखनाहट दोनों ही सुन रहे थे। उसने आँखें खोलीं और नजरें पत्नी पर जमा दी जो हटने का नाम ही नहीं लेती थी। पत्नी कुछ देर तो देखती रही पर जल्दी हड़बड़ा गई –इतनी देर से मुझे देखे जा रहे हैं ,कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी याददाश्त खो बैठे हों और मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हों।
बेचैनी से उसे झँझोड़ बैठी-क्यों जी क्या बात है?
-तुमको बहुत—काम---।घुटन भरी आवाज। 
-अरे तो क्या हुआ। पहले आप भाग -भाग कर कितना काम करते थे। मुझे तो कुछ करने ही नहीं देते थे। अपनी सारी परेशानियाँ आपसे कहकर बादल की तरह हल्की हो जाती थी  और आप मुसकरा कर कहते-ओह!चिंता न करो। खुश रहो। अब आपको खुश रखने की मेरी बारी है।    उसकी आँखों से मजबूरी के दो आँसू ढुलक पड़े।
-अरे यह क्या!पत्नी ने अपने आँचल से ढेर सा प्यार उड़ेलते हुए आँसू पोंछ डाले।
उसने अपना अशक्त हाथ धीरे से आगे बढ़ाया। लपककर पत्नी ने उसे थाम लिया। उसे लगा  - इस एक छुअन से उसके अंग अंग में अनगिनत शक्ति पुंजों का स्फुटन होने लगा है जिनसे सशक्त होकर वह यमराज से भी टकरा सकता है।

3-कटौती
-अजी सुन रहे हो ,आज मेरे तबीयत ठीक नहीं ।ककलू को स्कूल लेने न जा पाऊँगी। आप दोपहर दो बजे लेने पहुँच जाना। घर आकर गरम गरम खाना भी खा लेना।
–जो हुकुम मेरी सरकार। गंगाधर हँसते हुए अपनी कपड़े की दुकान की ओर चल दिए। उन्हें ज़्यादातर मसनद  के सहारे आलती पालती मारकर बैठना पड़ता था इसलिए धोती कुर्ता पहनने में उन्हें सुविधा रहती थी। सारे समय ग्राहकों की भीड़ में डूबे रहे मगर दो का घंटा सुनाई पड़ते ही उठ बैठे और जल्दी जल्दी पैरों में चप्पल फंसा स्कूल चल दिए। सूर्य  अपने पूरे ताप पर था। वहाँ पहुँचते पहुँचते पसीने से नहा गए । बेटे को देखते ही उनके चेहरे पर एक विजयी सी मुस्कान फैल गई –आह मेरा बेटा इंगलिश स्कूल में पढ़कर मुझ से चार कदम आगे निकलेगा। मगर बाप को देख बेटे ने नाक भौं सकोड़ ली और कुछ कदमों की दूरी बनाए चुपचाप  चल दिया। 
घर पहुँचकर बस्ता एक ओर पटका और भुनभुना उठा-माँ मुझे लेने तुम क्यों नहीं आई।
-क्यों,क्या हुआ?
-पापा  धोती कुर्ता पहनकर वहाँ भी आ गए और चप्पल,एक चप्पल का तो तला ही गायब है।कदम भी ठीक नहीं पड़ रहे थे। मुझे तो पापा को पापा कहते हुए भी शर्म आ रही थी। सबके पापा-बाबा तो पेंट कमीज और चिकने चिकने जूते पहनकर आते हैं और मेरे पापा ---ऊ ! 
-मैंने तो कितनी बार कहा है कि जगह देखकर कपड़े पहनकर जाया करो। पर सुने तब ना।
-भागवान। तुम लोगों को तो किसी बात की कमी नहीं होने देता । अच्छा खाना,अच्छा पहनना,बेटे को नंबर-1 शिक्षा, सभी कुछ तो मिल रहा है। तुम  अपने अनुसार जीयो और मुझे अपने अनुसार जीने दो। 
-आपकी बात एक तरह से ठीक ही है पर हम जब बनठन कर घर से  बाहर निकलते हैं तो हमारी भी तो इच्छा होती है आप भी फैशन के अनुसार कपड़े जूते पहन कर निकलो। जब आप हमारे ऊपर इतना खर्च कर सकते हो तो अपने ऊपर क्यों नहीं।
-तुम को खुश देखकर मुझे खुशी मिलती है। तुम्हारे चेहरों की मुस्कान  बरकरार रखने के लिए ही तो दिन रात मेहनत करता हूँ। लेकिन अपने ऊपर भी उतना खर्चा करने से तो बैंक बैलेंस ही गड़बड़ा जाएगा। अब कहीं -न -कहीं तो कटौती करनी ही पड़ेगी। 

4-दुनियादारी
पिछले माह से ही मैंने एक खाना बनाने वाली रक्खी है । मुश्किल से होगी 22-23 साल की । सुबह साढ़े पाँच बजे  उठ कर 6 बजे काम को निकल पड़ती है और रात मेँ 9 बजे घर मेँ  घुसती है। करीब सात घरों में भोजन ही बनाती है। उसकी आँखें देखने से मुझे लगता है  मानों वे अशक्त व सूनी सूनी है।एक दिन मैंने पूछ लिया-आँखों से तू बड़ी कमजोर लगती है।बीमार है क्या?
 -हाँ दीदी मेरे नींद नहीं पूरी होती।सोते- सोते 12 बज जाते हैं। मुझे अकसर लो ब्लडप्रेशर हो जाता है।
-जल्दी सोया कर । नींद पूरी न होने पर बहुत गड़बड़ी हो जाती है। तेरी तो शादी भी नहीं हुई है। फिर घर में काम, ऐसा क्या काम!
-मेरी विधवा बीमार दीदी मेरे साथ है। हम सात भाई बहन हैं । मैं सबसे छोटी पर बड़े होने की ज़िम्मेदारी मैं ही निभाती हूँ।
-यह तो बड़ी अच्छी बात है पर अपने लिए भी कुछ पैसा बचाकर रखती हैं या नहीं।
-मेरी  सारी  कमाई मेरे परिवार के नाम!भाई को पढ़ाया, बहनों की शादी मेँ मदद की और आजकल अपना सपना पूरा करने मेँ लगी हुई हूँ।
-चल अपने लिए तूने कुछ तो सोचा । मैं तो इसी उधेद्बुन मेँ थी कि बुरे समय के लिए तूने कुछ नहीं बचाया तो न जाने कोई तेरी मदद भी करेगा। जरा मैं भी तो सुनूं तेरा सपना।
- मेरा एक सपना था कि माँ और बापू को घर  बनवाकर दूँगी।वह करीब करीब पूरा होने को आ रहा है। पिछले साल उसके लिए बैंक से कर्ज लिया। वह मैं ही चुकाऊंगी। कुछ साल की ही तो बात है। हठात उसकी बुझी -बुझी आँखें चमक उठीं जो उसकी अंतरंग खुशी का बयान कर रही थीं।
-पर उस मकान मेँ तूने अपना नाम पड़वाया है या नहीं!
- पड़वाया है पर मुझे इससे कोई लेना देना नहीं। वह पूरी तरह बापू का है। वे जो चाहे इसका करें। मेरे लिए मेरी  ज़िंदगी पड़ी है और घना कमा लूँगी। मेरे चारों तरफ उज्जवल सी रोशनी बिखेर मुस्कुराने लगी।
मैं पढ़ी लिखी उसे दुनियादारी ही सिखाती रही पर उस अनपढ़ ने तो मुझे वह दुनियादारी बताई जो बड़ी बड़ी पोथियों मेँ नहीं मिलती।
समाप्त 
सुधा भार्गव 
9731552847 


रविवार, 25 दिसंबर 2016

लघुकथा -मजबूत कंधे


साहित्य अमृत लघुकथा विशेषांक  जनवरी 2017 में 
प्रकाशित मेरी  एक लघुकथा 





मजबूत कंधे 

ससुर के परलोक सिधारने के बाद कमली की सास उसके ही पास आकर रहने लगी थी। पति की कमाई ज्यादा तो न थी मगर कमली के सुघढ़ गृहिणी होने के कारण गृहस्थी की गाड़ी ठीक से चल रही थी। सास के आने से खर्चा बढ़ गया। इसकी भरपाई करने के लिए उसने चौका –बर्तन करने वाली को हटा दिया और यह काम सास के जिम्मे  कर दिया। सास इस कार्यभार से खुश ही हुई –चलो मेरा मन भी लगा रहेगा और दो पैसे की बचत भी हो जाएगी।
धीरे –धीरे खाना बनाने का भार भी सास के कंधों पर डाल दिया। घर में कैद रहने वाली कमली के अब पर निकल आए। वह घड़ी घड़ी चंचल चिड़िया की तरह एक घर से दूसरे घर मेलमिलाप करने निकल जाती।
सास को आँखों से कम ही दिखाई देता था इसलिए खाना बनाते समय वह हड़बड़ा जाती। कभी नमक ज्यादा पड़ जाता तो कभी सब्जी जल जाती।बेटा तो चुप रहता पर कमली मीन मेख निकालने में कोई कसर न छोडती।  
इस किरकिरी से तंग आकर सास दुखी हो उठी और एक सुबह उदासी में डूबी  वह बेटे-बहू  के पास आन बैठी । बेटा उस समय अखबार पर नजर गड़ाए चाय की चुसकियाँ ले रहा था।
माँ का उतरा चेहरा देख इतना तो वह समझ गया कि माँ कुछ कहना चाहती है पर क्या कहना चाहती है न समझ पाया। प्रश्न भरी निगाहों से उसने उसकी ओर ताका।
-बेटा, अब बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत नहीं कि हर काम को ठीक से सम्हाल सकूं।
-मेरी हड्डियों में भी इतनी ताकत नहीं कि पूरा घर सँभाल सकूँ। मेरी जान को तो हजार काम हैं। कमली चाय पीते पीते उबल पड़ी।
-बहू,तेरी हड्डियों में ताकत नहीं –मेरी हड्डियों में ताकत नहीं--- पर मेरे बेटे के कंधे तो मजबूत हैं।
-इन्हें इतना समय कहाँ कि बाहर भी काम करें और घर में भी।
-मैं कई दिनों से देख रही हूँ अखबार पढ़ने और चाय की चुसकियाँ लेने में तुम लोगों को आधा घंटा तो लग ही जाता है। यह सब जल्दी निबटाकर थोड़ा समय तो घर के काम के लिए  निकाला ही जा सकता है। क्यों बेटा –कुछ गलत कह रही हूँ?
बेटे का मन अखबार से उचाट हो गया। उसने उचककर रसोई में झाँका। कंपकँपाती ठंड में नल के नीचे झूठे बर्तनों का पहाड़ उसकी माँ का इंतजार कर रहा था।
उसने माँ पर भरपूर निगाह डालते हुए गहरी सांस ली और रसोई की तरफ बढ़ गया।

 सुधा भार्गव 

शनिवार, 12 मार्च 2016

लघुकथा अनवरत (फेसबुक मित्रों की लघुकथाएँ )में प्रकाशित


कमाऊ पूत/ सुधा भार्गव 

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गर्मी के दिन थे! बाँके को सब्जियाँ बेचने शहर की मंडी जाना था। ताप से बचने के लिए उसने सवेरे ही चल देना ठीक समझा। माँ चार रोटियों  के साथ -साथ  5-6 पानी की बोतलें भी झोले में डालने लगी-
—अरे –रे यह क्या कर रही है ?आज क्या पानी ही पानी पीऊँगा।
बेटा,घड़ी-घड़ी तो गला तर करना पड़े है। जरूरत पड़ने पर कुएं का ठंडा पानी दूसरे को भी पिला दीजो। प्यासे को पानी पिलाने से पुण्य ही मिलेगा। 
बाँके को माँ की बात जांच गई और बिना चूँ चपड़ किए सब्जी की टोकरियों के साथ बैलगाड़ी में सारी बोतलें रख लीं। मंडी पहुँचते -पहुँचते सूर्य देवता तमतमाए हुए पूरे ज़ोर से निकल आए।वह  पसीने से तर और गला सूखा –सूखा। पानी पीकर चैन की सांस ली  बोला –आह ,कितना मीठा पानी! अपनी तो सारी थकान मिट गई।
पास खड़े ग्राहक ने उसकी बात सुन ली।  बोला -भइए,मुझे भी तो पिला जरा पानी। गर्मी ने कहर ढा रखा है। तेरे पास तो बहुत बोतलें है। एक मुझे भी दे दे। कितने दाम की है।
एक मिनट बाँके सोच में पड़ गया—पानी का भी दाम!न कभी देखा न सुना।फिर भी मुफ्ती में क्यों दूँ ?
कुशल विक्रेता की तरह बोला—बाबू, ईमान का पानी है,एकदम ताजी,शुद्ध और मीठा। एक बोतल का दाम दस रुपए।
ईमान के पानी की बात दूसरे ग्राहकों के कान में भी पड़ गई और सब्जी से पहले पानी की बोतलें बिक गईं।

ईमान का पानी बाँके के लिए कमाऊ पूत था और इसके सामने वह पाप –पुण्य की बात भूल गया। 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

दिल्ली न्यूज ट्रैक (www.delhinewstrack.com)
पाक्षिक समाचार पत्रिका  15 दिसंबर,2015(सयुक्तांक-साहित्य विशेषांक  )में मेरी चार लघुकथाएँ प्रकाशित हुई है। उनमें से एक इस ब्लॉग में पोस्ट कर रही हूँ। इसके  संपादक अरविंद गुप्ता हैं और अशोक आन्द्रे जी ने इस अंक के लिए विशेष सहयोग प्रदान किया है। इस अंक के द्वारा साहित्य की विभिन्न विधाओं से संबन्धित रचनाएँ सुधि पाठकों तक पहुंची है जो स्वयं में परिपूर्ण हैं। 

सुहागन/सुधा भार्गव 


वृद्ध पति पत्नी जल्दी ही रात का भोजन कर लेते, अतीत की यादों को ताजी करते हुए टी. वी. देखा करते। एक दिन वृदधा जल्दी सो गई पर आधी रात को हड़बड़ाकर उठ बैठी अरे तुमने मुझे जगाया नहीं !मेरी सीरीयल छूट गई।
-बहुत खास सीरियल थी क्या?
-हाँ ! तुमने भी तो देखी थी सास भी कभी बहू थी। उसमें सास बहू और पोता बहू एक सी साड़ी पहने  हुई थी। आजकल उम्र का तो कोई लिहाज ही नहीं। पर दादी सास लाल पाड़ की साड़ी पहने और कपाल पर सिंदूर की चौड़ी बिंदी लगाए लग बड़ी सुंदर रही थी।
-तुम भी वैसी एक साड़ी खरीद लो।
-सोच तो रही हूँ पर मैं बूढ़ी न ठीक से पहन सकती हूँ न चल सकती हूँ।
-कोई औरत बूढ़ी नहीं होती जब तक उसका पति जिंदा होता है।
झुर्री भरा चेहरा लाजभरी ललाई से ढक गया और प्यार से बतियाती पति का हाथ थामे सो गई।  
सुबह पत्नी को गहरी नींद में डूबा जान पति ने उसे चादर अच्छे से ओढ़ाई और आहिस्ता से कमरे से निकल गया।
सूरज सिर पर चढ़ आया ,बेटे का ऑफिस जाने का समय हो गया। आदत के मुताबिक वह माँ  को प्रणाम करने उसके कमरे में आया माँ माँ मैं ऑफिस जा रहा हूँ । उठो न ,अभी तक सोई हो ।
अपनी बात का कोई असर होते न देख उसने माँ को हिलाया डुलाया। जागती कैसे! वह तो चीर निद्रा में लीन थी।
बेटा दहाड़ मारकर रो पड़ा माँ बिना कुछ  कहे मुझे छोडकर ऐसे क्यों चली गईं।
-सोने दे सोने दे !उसे जो कहना था वह कहकर गई है।वृद्ध पिता थकी आवाज में बोला।
अर्थी सजाई गई। लोगों ने देखा लाल पाड़ की साड़ी मे लिपटी माथे पर सिंदूरी बिंदी जड़ी सुहागन मुस्कुरा रही है। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

लघुकथा



नई पौध /सुधा भार्गव 

तैल चित्र 
वह एक ऐसा मदरसा था जिसमें हिन्दू –मुसलमान दोनों के  बच्चे पढ़ने आते थे। एक बार मौलवी साहब उधर से गुजरे। अहाते मेँ बच्चे प्रार्थना कर रहे थे। एक बच्चे को पहचानते हुए उनका तो खून खौल उठा  -अरे सलीम ने अपने बेटे को  मेरे पास भेजने की बजाय इस मदरसे मेँ दुश्मनों के चूजों के साथ पढ़ने भेज दिया। लगता है उसकी मति मारी गई है।

दूसरे दिन पंडित जी अपना जनेऊ संभालते हुए मदरसे के सामने से निकले। टिफिन के समय बच्चे मदरसे के बाहर खेल रहे थे। ।उनकी निगाह अपने यजमान के बेटे पर पड़ गई । उन्हें तो साँप सूंघ गया--- काफिरों के साथ हिन्दू के बेटे! हे भगवान अब तो इसके घर का पानी भी पी लिया तो नरक मेँ भी जगह नहीं मिलेगी। राम –राम –राम कहते आगे बढ़ गए।

दोनों को रात भर नींद नहीं आई । सुबह ही कुछ कर गुजरने की धुन मेँ मदरसे की ओर चल दिए। पंडित सोच रहा था –आज हिन्दू के बच्चे को मदरसे मेँ घुसने ही नहीं दूंगा। उधर मौलवी इस उधेड़बुन मेँ था –किसी भी तरह सलीम के बच्चे का कान खींचते हुए उसके बाप के घर न पहुंचा दिया तो मैं मौलवी नहीं। दोनों एक ही रास्ते पर जा रहे थे,एक ही स्थान पर पहुँचना था पर सांप्रदायिक भावना की मजबूत जकड़ ने उन्हें एक दूसरे से बहुत दूर ला पटका था। भूल से आँखें चार हो जातीं तो घृणा से मुंह फेर लेते।

इनके पहुँचने के समय तक  मदरसा बंद था मगर बहुत से बच्चे उसके बाहर खड़े  खुलने का इंतजार कर रहे थे। उनमें सलीम का बेटा भी था ।
मौलवी जी ने उसे धर दबोचा -–बरखुरदार ,तुम इस मदरसे मेँ पढ़ने क्यों चले आए?हमने तो तुम्हारे वालिद साहब को पढ़ाया है। तुमको भी हमारे पास आना चाहिए।   
-मौलवी साहब मेरे वालिद साहब को रामायण की सीरियल देखना बहुत अच्छा लगता है । वे तो इसे पढ़ना भी चाहते है पर हिन्दी नहीं जानते । मैं यहाँ हिन्दी सीखकर उन्हें रामायण पढ़कर सुनाऊंगा।
मौलवी का मुंह लटक गया।

उधर पंडित ने अपने यजमान के बेटे को जा घेरा- बेटे,मुसलमानों के इस मदरसे मेँ तुम क्या कर रहे हो। तुम्हारे लिए इससे भी अच्छे स्कूल है पढ़ने के लिए।
-पंडित जी,पिताजी गजल शायरी के बहुत शौकीन है, वे खुद मिर्जा गालिब की गजलें पढ़ना चाहते है। मैं उर्दू सीखकर उनको गजलें सुनाऊँगा और सोच रहा हूँ-उन्हें उर्दू भी सिखा दूँ।
धर्मसंकट में पड़े पंडित का हाथ अपने जनेऊ पर जा पड़ा।

मदरसा खुलने पर बच्चे हाथ मेँ हाथ डाले उछलते कूदते अंदर भाग गए और मौलवी व पंडित एक दूसरे को ठगे से देखने लगे। चुप्पी तोड़ते हुए पंडितजी बोले –चलो मौलवी –लौट चलें। एक नई पौध जन्म ले रही है। 

 अंतर्जाल पत्रिका साहित्य शिल्पी में प्रकाशित। उसकी लिंक है-
http://www.sahityashilpi.com/2015/04/nayepaudh-shortstory-sudhabargava.html

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

लघुकथा


मुफ्त की सेवाएँ/सुधा भार्गव 

इस बार मैं लंदन गई तो पड़ोसी विलियम परिवार से अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई। विलियम के जुड़वां बेटे हुए थे। उसकी माँ नवजात शिशुओं की देखभाल में काफी समय बिताती। अपने पोतों के प्रति प्यार व उसकी कर्तव्यभावना को देख मैं हैरान थी क्योंकि अब तक तो मैंने यही सुना व देखा था कि यहाँ माँ –बाप और बच्चे सब अपने में व्यस्त और अलग –थलग रहते हैं।
उस दिन मैं विलियम की माँ से मिलने गई। वे मेरे लिए चाय बनाकर लाईं।
–अरे आपने इतना क्यों कष्ट किया । वैसे ही आपको बच्चों व घर का  बहुत काम है।
-मुझे सारे दिन काम करने की आदत है।आजकल तो बैंक से इन नन्हें –मुन्नों की खातिर दो माह की छुट्टी ले रखी है।
- दो माह की छुट्टी!सरलता से मिल गई?
-हाँ, बस अवैतनिक हैं।
-फिर तो काफी नुकसान हो गया।
-कैसा नुकसान !इन दो माह का वेतन मेरा बेटा देगा क्योंकि मैं उसके लिए काम कर रही हूँ।
-बेटे –पोते तो अपने ही हैं ,अपनों से पैसा क्या लेना।
-ऐसा करने से युवा बच्चे माँ बाप की कदर नहीं जान पाते। मुफ्त की सेवाओं का कोई मूल्य नहीं।
उसकी बातें मुझे ठीक लगीं पर क्या कभी मैं ऐसा कर पाऊँगी? 
दो संस्कृतियों की टकराहट ने मेरा चैन छीन लिया

प्रकाशित -अप्रैल अंक 'देश' के अंतर्गत 
http://laghukatha.com/

शनिवार, 31 जनवरी 2015

लघुकथा

दूध का कर्ज /सुधा भार्गव

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रामकली को पड़ोस में ही कीर्तन में जाना था। देर हो रही थी,इसलिए बच्चों के दूध के गिलास मेज पर रख दिए और बेटी को  खास हिदायत दी –भाई को शीशे के गिलास वाला दूध पिला देना और तुम स्टील के गिलास वाला दूध पी लेना। भाई-बहन खेल में लग गए और फिर जिसके जो हाथ लगा दूध पी गया।


रामकली के आते ही लाड़ला बोला –माँ—माँ आज दूध की मलाई कौन मार गया । न जाने दूध कैसा था?
-मैं तो तेरे लिए शीशे के गिलास में मलाईदार दूध रख गई थी।कौन पी गया..... लगता है यह कमबख्त पी गई ।क्यों री तूने अपना दूध क्यों नहीं पीया?
-माँ,मुझे भी तो मलाई अच्छी लगती है।
-अरी तू मलाई खाकर क्या करेगी!चिकनाई खाकर मोटी और हो जाएगी। मोटी लड़की से कौन शादी करेगा? बेटे का तो  स्वस्थ और  ताकतवर होना जरूरी है, बड़ा होकर परिवार देखेगा अपने माँ-बाप की देखरेख करेगा,क्यों मेरे छ्बीले ! बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फिराती है।

कुछ देर पहले ही दोनों बच्चों के पिताजी ऑफिस से लौटे थे । एक पल तो अवाक से पत्नी की बातें सुनते रहे पर ज्यादा देर खामोश न रह सके-
-क्यों बेटी को कोस रही हो!जरूरी नहीं कि बेटा दूध का कर्ज चुका ही दे।   हमारे साले साहब को ही देख लो! बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम भेजकर ही दम लिया । अगर बेटे माँ-बाप का सहारा बनते तो ये वृद्धाश्रम न बनते। 


रविवार, 14 दिसंबर 2014

मेरी दो लघुकथाएँ



1-भिखारी /सुधा भार्गव 


उस दिन मिसेज देसाई के घर किटी पार्टी का आयोजन था। इस पार्टी की मिसेज भल्ला भी सदस्य थीं पर वे किसी कारणवश न आ सकी। अन्य महिला सदस्यों में गपशप का बाजार गर्म होने लगा।
-भई ,मिसेज भल्ला ने तो अपनी लड़की की शादी में कमाल कर दिया।  बरातियों की खातिरदारी में कोई कसर न छोड़ी । दावत में एक से एक बढ़कर मद्रासी खाना ,पंजाबी खाना, गुजराती खाना।  चाट- पकौड़ी की तो भरमार थी। मिठाइयों का क्या कहना –संदेश –रसगुल्ले, गुलाबजामुन मिठाइयाँ,कुल्फी- आइसक्रीम क्या नहीं था। बराती तो अंगुली चाटते रह गए। कह रहे थे हमने तो इससे पहले ऐसा स्वादिष्ट भोजन कभी किया ही नहीं।
-हर बराती को ऊनी सूट का कपड़ा दिया ताकि सर्दियों में कोट-पेंट सिलवा सकें और महिला बरातियों को बड़े सुंदर कश्मीरी शॉल दिये।प्रसन्नता से उनके चेहरे कैसे खिले पड़ रहे थे। उन्होंने तो ऐसे कीमती कपड़े देखे भी न होंगे ।दूसरी महिला बोली। 
- लड़के की तो किस्मत चमक गई। दहेज में तो सुना है कार भी दी है। -अरे कार के साथ- साथ इतना सामान दिया है कि घर ही भर गया होगा। बर्तन-भांडे,फर्नीचर ,पलंग से लेकर शादी -जेवर में कोई कमी न छोड़ी। तीसरी से भी चुप न रहा गया।
-तुम ठीक कह रही हो। उनके दामाद को सालों कुछ खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा ससुराल वाले जब भी मिलेंगे उसकी झोली में कुछ न कुछ तो डालेंगे ही। चीकू की मम्मी हाथ मटकाते हुए बोली। 
पास ही बैठा चीकू उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहा था।अंतिम वाक्य सुनते ही उसके सामने फटी पुरानी झोली वाले भिक्कू भिखारी का चेहरा घूम गया, वह बड़ी बड़ी आँखें झपकाते हुए बेचैनी से बोला -माँ --माँ --दामाद क्या भिखारी है! 


2-वह वृद्ध और वह वृद्धा/सुधा भार्गव

alarm, clock, clockoclock, office, time, timer, wait, watch icon

वह वृद्ध और वह वृद्धा-एक रिटायर्ड जज तो दूसरा रिटायर्ड प्रिंसपिल । भरापूरा परिवार पर नियति के कठोर थपेड़ों के कारण अकेले रहने पर मजबूर हो गए। इस अकेलेपन को बांटने के लिए जमाने के डर से दोनों सांझ को पार्क मे मिलते,बातें करते और घर की ओर लौट पड़ते। 
रात को नींद उछटने पर मोबाइल लेकर बैठ जाते।मोबाइल के कारण इनकी नज़दीकियाँ बढ़ती गईं। उस पर घर बाहर की बातें शुरू हो जाती। अतीत को कुरेदते और सुखद पलों को चूमते। रातें सुहानी हो गई। लोग दिन का इंतजार करते हैं पर वे रात का इंतजार करते थे।