वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

सोमवार, 20 अगस्त 2018

लघुकथा


चुंबन
     *सुधा भार्गव 

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स्कूल से आते ही राधिका ने अपना बैग कोने में पटका और कुर्सी पर धम्म से बैठती बोली-    
    “माँ माँ --आज मैं बहुत थक गई हूँ।”
    “मैं अभी रानी बिटिया की थकान मिटाती हूँ।ठंडी -ठंडी ठंडाई लाती हूँ।’’
    “ओह माँ ,मुझे कुछ नहीं खाना –पीना।’’
    बच्ची को व्याकुल देख माँ बेचैन हो उठी। उसने उसका  मुखड़ा अपने हाथ में लिया और गाल पर अपने प्यार की मोहर लगा दी।
    “अरे ऐसे नहीं। तुम्हें तो माँ  प्यार  करना भी नहीं आता। रौनक की तरह गालों को नहीं मेरे होंठों पर प्यार करो। ”
    “क्या--?वह चौंक पड़ी। लगा जैसे गरम तवे पर हाथ दिया। “यह रौनक कौन है?”उसने राधिका को पकड़कर बुरी तरह झिंझोड़ डाला।
    “माँ का यह रूप देख राधिका सहम गई। वह समझ न सकी लाड़-दुलार करते -करते  माँ को एक पल में क्या हो गया!
    पत्नी की ऊंची आवाज सुन उसके पापा भी कमरे से बाहर निकल आए। राधिका  उनके पीछे जा छिपी।
    “पापा मुझे बचा लो। मैंने कुछ नहीं किया।’’ वह कातर स्वर में बोली।  
माँ को उसका यह रक्षा कवच जरा भी न सुहाया और पीछे से बुरी तरह खींचती फुफकार उठी-
    इतना तो बता दे---- यह रौनक है कौन ?”
    भयभीत निगाहों से उसने पापा की ओर ताका मानो जाल में फंसी चिड़िया अपने बचाव की भीख मांग रही हो।
   “बेटा, बता दो सब कुछ  अपनी माँ को ,डरने की कोई बात नहीं ।’’ उन्होंने ढाढ़स बँधाया।
   “रौनक—---रौनक -- वह—वह तो मेरी  कक्षा में ही पढ़ता है। कठिन सवाल एक मिनट  में ही हल कर देता है। परसों  अगर मेरी  सहायता नहीं करता तो टीचर जी की बड़ी डांट पड़ती।’’ राधिका रुआंसी सी हो गई।
    “अब उससे बात करने की भी जरूरत नहीं। समझीं तुम । माँ ने उंगली दिखाकर राधिका को डपटा।’’
    ‘पर क्यों?” राधिका ने जानना चाहा।
    “वह अच्छा लड़का नहीं है।’’ माँ ने कहा।
    “पर आप तो उससे कभी मिली भी नहीं ,आपको कैसे पता ?सब उसकी तारीफ करते हैं। फिर वह बुरा कैसे हो गया!?”राधिका ने जानना चाहा।
    “मैंने कह दिया न उससे दूर रह बस।”माँ ने जैसे फतवा जारी कर दिया।  “फिर मेरी मदद कौन करेगा पढ़ाई में—रोज मैडम सजा देगी।’’ वह रोने लगी ।
    “देखो जी इतनी जल्दी किसी निर्णय पर न पहुँचो। पहले स्कूल जाकर ठंडे दिमाग से बात कर लो। अपनी बेटी पर थोड़ा तो विश्वास करो।’’ राधिका के पापा बोले।
    राधिका की माँ को पति की बात फूटी आँख न सुहाई । वह रात भर शक के पिजरे में कैद करवटें ही बदलती रही। उधर राधिका भी सुबकते- सुबकते न जाने कब-कब में  सो गई। इसका अंदाजा माँ को तनिक भी न हुआ पर भीगा तकिया उसके दुख की कहानी बता रहा था।
   अगले दिन माँ प्रिंसपिल के कमरे में बेटी को खींचते हुए ले गई और दहाड़ी –“आप तुरंत रौनक  को बुलवाइए। उसकी कैसे हिम्मत हुई कि वह मेरी बेटी के होंठों को चूमें। आपने कैसे-कैसे बच्चों को इस स्कूल में रख छोड़ा है। ”
   प्रिन्सिपल हैरान से बोले –“बहन जी आपको जरूर कोई हलतफहमी हो गई है। वह नादान तो निहायत मासूम और पढ़ाकू बच्चा है।”
    “मासूमियत की बात छोड़िए –आजकल के बच्चे तो हमारे भी बाप हैं। उम्र से पहले ही बहुत कुछ सीख जाते हैं।”
    “मेरी  बात का विश्वास नहीं तो मैं अभी उसे बुलाता हूँ। आप शांति से तो बैठिए।”प्रिंसीपल ने राधिका की माँ से कहा।
    कुछ ही देर में रौनक ने  आते ही प्रिंसपल और राधिका की माँ से हाथ जोड़कर नमस्ते की।  
    “बेटा, राधिका तुम्हारी ही क्लास मैं है न?”  
    “जी ,मैं उसी के पास बैठता हूँ। वह मेरी दोस्त है। रौनक ने सहजता से कहा।”
    ‘कल क्या तुमने उसके होंठों को चूमा था?”
    “मैंने तो प्यार किया था।’’रौनक ने बिना किसी झिझक के कहा।
    “प्यार ऐसे करते हैं,यह किसने बताया?”प्रिंसिपल ने पूछा। “मेरे  मम्मी-पापा तो ऐसे ही प्यार करते हैं ।”   
    “ठीक है रौनक। अब तुम जाओ।” प्रिन्सिपल ने कहा।     
    रौनक के जाते ही राधिका की माँ अपना सिर पकड़कर बैठ गई।
    एकाएक उसकी आँखों के सामने चलचित्र की भांति एक के बाद एक दृश्य आने जाने लगे-- ऑफिस से आते ही पति का उसे बाहों के घेरे में लेना,चेहरे और होंठों पर चुंबनों की बारिश। सोफे पर सटकर बैठना,बेटी का टुकुर टुकुर देखना।
    राधिका की माँ अंदर ही अंदर शर्म से गड़ी जा रही थी । उसे लग रहा था ,जैसे बेटी के साथ-साथ रौनक भी उन्हें यह सब करता हुआ देखता रहा है।
    चश्में से झाँकती प्रिन्सिपल की दो आँखें उसके चेहरे पर निरंतर आते जाते रंगों को घूर रही थीं। 
( #लघुकथाचौपाल-32(भाग-एक) को इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है : https://www.facebook.com/utsahi/posts/10212327842448236 )



बुधवार, 14 मार्च 2018

प्रकाशित लघुकथा


बाल सुदामाघर 
          *सुधा भार्गव 

      छह मास का नन्हा-मुन्ना बालक ! पेट के बल सरकना उसने शुरू कर दिया था। किसी भी समय करवट ले सकता था। कोई और माँ होती तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगता पर वह तो सिर पकड़ कर बैठ गई –हाय री दइया ,इस अपनी जान को किसके भरोसे छोडकर जाऊँ। यह तो कहीं का कहीं सरक जावे। कल तो मजदूरी करने न जा पाई--- आज भी न गई तो हो जावेगी छुट्टी और ये मुआ –मुझ भूखी-प्यासी की सूखी छातियों को चुचुड़-चुचुड़- ---दम ही निकाल देगा।
      अचानक उसके दिमाग में बिजली सी चमकी।  बच्चे को गोदी में ले  झोपड़पट्टी से निकल पड़ी। एक हाथ से बच्चे को सँभाले हुए थी और दूसरे हाथ में एक झोला। जिसमें से रस्सी के टूटे-कुचले टुकड़े झाँकते नजर आ रहे थे। कुछ दूरी पर जाकर उसने बच्चे को सड़क के किनारे पेट के बल लेटा दिया। रस्सी का एक छोर बच्चे के पैर में बांध दिया और दूसरा छोर वही पड़े बड़े से पत्थर से ताकि वह अपनी जगह से हिल न सके। कलेजे पर पत्थर रखकर वह उसे छोड़ पास ही बनने वाले मकान की ईंटें ढोने चली गई।
      ऑफिस जाते समय संयोग से मैं उधर से गुजरी। उस दूधमुंहे बच्चे को देख मेरी तो साँसे ही रुक गईं जो लगातार रोए जा रहा था । हैरानी और खौफ की मिली जुली भावनाओं से बहुत देर तक जख्मी होती रही।बच्चे के आसपास कई लोग कौतूहलवश खड़े थे जिनकी आँखों में एक ही प्रश्न उभर रहा था –यह किस बेरहम का बच्चा है। इतने में सामने से मैली कुचैली धोती पहने एक औरत बदहवास सी दौड़ी आई और बच्चे को उठाकर बेतहाशा चूमने लगी।अंग -अंग टटोलती और कहती जाती –मेरे मनुआ—मेरी जान –तुझे कछु हुआ तो नहीं। फिर बच्चे को सीने से लगा बबककर रो पड़ी।
      मैं तो उसे देख क्रोध की आग में जल उठी और जी चाहा उसका मुंह नोच लूँ। आँखें तरेरते बोली-"तू कैसी माँ है।,इतने छोटे से बच्चे को बेसहारा सड़क पर छोड़ चली गई। एक मिनट को भी तेरा कलेजा न काँपा।"
      "माई क्या करूँ मजदूरी करने जाऊँ तो अपने लाल को कहाँ छोड़ू। लगे तो तू भी काम वाली है। माई तू कहाँ छोड़े है अपने बच्चों को।"   
      "मैं बालघर में छोड़कर जाती हूँ।"
     "भागवाली, मुझे भी ऐसा कोई घर बता दे न,जहां मेरी सी अभागिनें माँ  अपने बच्चों को छोड़ दें और बेफिक्री से मजदूरी कर सकें।"
      उसने मेरे दिमाग में हलचल पैदा कर दी पर अपना मुंह न खोल सकी। कोई बाल सुदामा घर होता तो बताती।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

लघुकथा

देश की माटी
                *सुधा भार्गव  

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"यार तेरी सारी ज़िंदगी विदेश में बीत गई। एक बार भारत छोड़ा तो पीछे मुड़कर यह भी न देखा कि तेरे माँ-बाप कितने अकेले पड़ गए। तू तो उनके क्रियाकर्म में भी न गया। अब अचानक इतना देश -प्रेम कहाँ से  जाग पड़ा कि घड़ी-घड़ी इंडिया भाग रहा है। "
'कैसे जाता ?मेरे पास उस समय इतना पैसा कहाँ था कि आ-जा सकूँ। एक-एक पाई अपने दोनों बच्चों के लिए जमा कर रहा था। "
"कहाँ रहे तेरे बच्चे भी  अपने । वे भी तो तुझे ठेंगा दिखाकर चले गए । अब समझ रहा होगा अकेलेपन का दर्द।" 
"तू ठीक कहा रहा है। मैंने जैसा बोया वैसा काट भी रहा हूँ। माँ-बाप की ज़िंदगी में तो रस न घोल सका,पर अपनी ज़िंदगी का रस निचुड़ने से तो बचा सकता हूँ।"
:समझ नहीं आता ,अब तेरे लिए भारत में क्या बचा  है। दोस्त,नाते-रिश्तेदार,पास-पड़ोसियों का बसेरा न जाने कहाँ होगा?"
"गाँव में अब भी बहुत कुछ बचा है मेरे दोस्त !हरे-भरे खलिहान,रँभाती गायों का झुंड,गुड़ के साथ मक्की-बाजरे की मीठी रोटी ...। "
"सपने देख रहा है क्या?पिछले 40 वर्षों में वहाँ भी बहुत कुछ बदल गया है। शहरी सभ्यता हरे-भरे मैदान और खेतों को निगलने में लगी है।"
"बदल जाने दे सब कुछ...... । उनकी यादों से तो मैं जुड़ा हूँ और जुड़ा हुआ हूँ अपने देशवासियों से । इस जुड़न की अनुभूति क्या कम सुखद है। "
"लेकिन तेरे बच्चे?उनसे तो तू बहुत दूर हो  जाएगा। यहाँ रहते उम्मीद तो रहती है कि शायद आज आ जाएँ। वहाँ जाने से तो आशा का यह चिराग भी बुझ जाएगा।" 
"लेकिन यह संतोष तो रहेगा  कि मेरे जीवन का सूर्यास्त अपने देश में ही हो रहा है और उसकी सौंधी-सौंधी माटी में मेरा शरीर मिल जाएगा। " 

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

अपने -अपने क्षितिज में प्रकाशित

मेरी चार लघुकथाएँ 


1-एक छुअन

उसे बुखार ने जकड़ लिया था और एक बार जकड़ा तो ऐसा जकड़ा कि वह उसकी गिरफ्त से छूट ही नहीं पाया। दूसरों के  चार काम करने वाला अब अपना एक काम भी नहीं कर पा रहा था। पहले उसे एक सँभालता था ,अब उसे चार-चार संभालते हैं । एकांत क्षणों में वह उदास आँखों से शून्य में निहारा करता।
उस दिन पत्नी उसका सिर सहला रही थी,साथ-साथ वर्षों बिताए दाम्पत्य जीवन के अनगिनत  आत्मीय –अनुराग भरे स्वरों की खनखनाहट दोनों ही सुन रहे थे। उसने आँखें खोलीं और नजरें पत्नी पर जमा दी जो हटने का नाम ही नहीं लेती थी। पत्नी कुछ देर तो देखती रही पर जल्दी हड़बड़ा गई –इतनी देर से मुझे देखे जा रहे हैं ,कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी याददाश्त खो बैठे हों और मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हों।
बेचैनी से उसे झँझोड़ बैठी-क्यों जी क्या बात है?
-तुमको बहुत—काम---।घुटन भरी आवाज। 
-अरे तो क्या हुआ। पहले आप भाग -भाग कर कितना काम करते थे। मुझे तो कुछ करने ही नहीं देते थे। अपनी सारी परेशानियाँ आपसे कहकर बादल की तरह हल्की हो जाती थी  और आप मुसकरा कर कहते-ओह!चिंता न करो। खुश रहो। अब आपको खुश रखने की मेरी बारी है।    उसकी आँखों से मजबूरी के दो आँसू ढुलक पड़े।
-अरे यह क्या!पत्नी ने अपने आँचल से ढेर सा प्यार उड़ेलते हुए आँसू पोंछ डाले।
उसने अपना अशक्त हाथ धीरे से आगे बढ़ाया। लपककर पत्नी ने उसे थाम लिया। उसे लगा  - इस एक छुअन से उसके अंग अंग में अनगिनत शक्ति पुंजों का स्फुटन होने लगा है जिनसे सशक्त होकर वह यमराज से भी टकरा सकता है।

2-कटौती

अजी सुन रहे हो ,आज मेरे तबीयत ठीक नहीं ।ककलू को स्कूल लेने न जा पाऊँगी। आप दोपहर दो बजे लेने पहुँच जाना। घर आकर गरम गरम खाना भी खा लेना।
–जो हुकुम मेरी सरकार। गंगाधर हँसते हुए अपनी कपड़े की दुकान की ओर चल दिए। उन्हें ज़्यादातर मसनद  के सहारे आलती पालती मारकर बैठना पड़ता था इसलिए धोती कुर्ता पहनने में उन्हें सुविधा रहती थी। सारे समय ग्राहकों की भीड़ में डूबे रहे मगर दो का घंटा सुनाई पड़ते ही उठ बैठे और जल्दी जल्दी पैरों में चप्पल फंसा स्कूल चल दिए। सूर्य  अपने पूरे ताप पर था। वहाँ पहुँचते पहुँचते पसीने से नहा गए । बेटे को देखते ही उनके चेहरे पर एक विजयी सी मुस्कान फैल गई –आह मेरा बेटा इंगलिश स्कूल में पढ़कर मुझ से चार कदम आगे निकलेगा। मगर बाप को देख बेटे ने नाक भौं सकोड़ ली और कुछ कदमों की दूरी बनाए चुपचाप  चल दिया। 
घर पहुँचकर बस्ता एक ओर पटका और भुनभुना उठा-माँ मुझे लेने तुम क्यों नहीं आई।
-क्यों,क्या हुआ?
-पापा  धोती कुर्ता पहनकर वहाँ भी आ गए और चप्पल,एक चप्पल का तो तला ही गायब है।कदम भी ठीक नहीं पड़ रहे थे। मुझे तो पापा को पापा कहते हुए भी शर्म आ रही थी। सबके पापा-बाबा तो पेंट कमीज और चिकने चिकने जूते पहनकर आते हैं और मेरे पापा ---ऊ ! 
-मैंने तो कितनी बार कहा है कि जगह देखकर कपड़े पहनकर जाया करो। पर सुने तब ना।
-भागवान। तुम लोगों को तो किसी बात की कमी नहीं होने देता । अच्छा खाना,अच्छा पहनना,बेटे को नंबर-1 शिक्षा, सभी कुछ तो मिल रहा है। तुम  अपने अनुसार जीयो और मुझे अपने अनुसार जीने दो। 
-आपकी बात एक तरह से ठीक ही है पर हम जब बनठन कर घर से  बाहर निकलते हैं तो हमारी भी तो इच्छा होती है आप भी फैशन के अनुसार कपड़े जूते पहन कर निकलो। जब आप हमारे ऊपर इतना खर्च कर सकते हो तो अपने ऊपर क्यों नहीं।
-तुम को खुश देखकर मुझे खुशी मिलती है। तुम्हारे चेहरों की मुस्कान  बरकरार रखने के लिए ही तो दिन रात मेहनत करता हूँ। लेकिन अपने ऊपर भी उतना खर्चा करने से तो बैंक बैलेंस ही गड़बड़ा जाएगा। अब कहीं -न -कहीं तो कटौती करनी ही पड़ेगी। 

3-दुनियादारी

पिछले माह से ही मैंने एक खाना बनाने वाली रक्खी है । मुश्किल से होगी 22-23 साल की । सुबह साढ़े पाँच बजे  उठ कर 6 बजे काम को निकल पड़ती है और रात मेँ 9 बजे घर मेँ  घुसती है। करीब सात घरों में भोजन ही बनाती है। उसकी आँखें देखने से मुझे लगता है  मानों वे अशक्त व सूनी सूनी है।एक दिन मैंने पूछ लिया-आँखों से तू बड़ी कमजोर लगती है।बीमार है क्या?
 -हाँ दीदी मेरे नींद नहीं पूरी होती।सोते- सोते 12 बज जाते हैं। मुझे अकसर लो ब्लडप्रेशर हो जाता है।
-जल्दी सोया कर । नींद पूरी न होने पर बहुत गड़बड़ी हो जाती है। तेरी तो शादी भी नहीं हुई है। फिर घर में काम, ऐसा क्या काम!
-मेरी विधवा बीमार दीदी मेरे साथ है। हम सात भाई बहन हैं । मैं सबसे छोटी पर बड़े होने की ज़िम्मेदारी मैं ही निभाती हूँ।
-यह तो बड़ी अच्छी बात है पर अपने लिए भी कुछ पैसा बचाकर रखती हैं या नहीं।
-मेरी  सारी  कमाई मेरे परिवार के नाम!भाई को पढ़ाया, बहनों की शादी मेँ मदद की और आजकल अपना सपना पूरा करने मेँ लगी हुई हूँ।
-चल अपने लिए तूने कुछ तो सोचा । मैं तो इसी उधेद्बुन मेँ थी कि बुरे समय के लिए तूने कुछ नहीं बचाया तो न जाने कोई तेरी मदद भी करेगा। जरा मैं भी तो सुनूं तेरा सपना।
- मेरा एक सपना था कि माँ और बापू को घर  बनवाकर दूँगी।वह करीब करीब पूरा होने को आ रहा है। पिछले साल उसके लिए बैंक से कर्ज लिया। वह मैं ही चुकाऊंगी। कुछ साल की ही तो बात है। हठात उसकी बुझी -बुझी आँखें चमक उठीं जो उसकी अंतरंग खुशी का बयान कर रही थीं।
-पर उस मकान मेँ तूने अपना नाम पड़वाया है या नहीं!
- पड़वाया है पर मुझे इससे कोई लेना देना नहीं। वह पूरी तरह बापू का है। वे जो चाहे इसका करें। मेरे लिए मेरी  ज़िंदगी पड़ी है और घना कमा लूँगी। मेरे चारों तरफ उज्जवल सी रोशनी बिखेर मुस्कुराने लगी।
मैं पढ़ी लिखी उसे दुनियादारी ही सिखाती रही पर उस अनपढ़ ने तो मुझे वह दुनियादारी बताई जो बड़ी बड़ी पोथियों मेँ नहीं मिलती।
समाप्त 
सुधा भार्गव 
9731552847 

रविवार, 25 दिसंबर 2016

लघुकथा -मजबूत कंधे


साहित्य अमृत लघुकथा विशेषांक  जनवरी 2017 में 
प्रकाशित मेरी  एक लघुकथा 





मजबूत कंधे 

ससुर के परलोक सिधारने के बाद कमली की सास उसके ही पास आकर रहने लगी थी। पति की कमाई ज्यादा तो न थी मगर कमली के सुघढ़ गृहिणी होने के कारण गृहस्थी की गाड़ी ठीक से चल रही थी। सास के आने से खर्चा बढ़ गया। इसकी भरपाई करने के लिए उसने चौका –बर्तन करने वाली को हटा दिया और यह काम सास के जिम्मे  कर दिया। सास इस कार्यभार से खुश ही हुई –चलो मेरा मन भी लगा रहेगा और दो पैसे की बचत भी हो जाएगी।
धीरे –धीरे खाना बनाने का भार भी सास के कंधों पर डाल दिया। घर में कैद रहने वाली कमली के अब पर निकल आए। वह घड़ी घड़ी चंचल चिड़िया की तरह एक घर से दूसरे घर मेलमिलाप करने निकल जाती।
सास को आँखों से कम ही दिखाई देता था इसलिए खाना बनाते समय वह हड़बड़ा जाती। कभी नमक ज्यादा पड़ जाता तो कभी सब्जी जल जाती।बेटा तो चुप रहता पर कमली मीन मेख निकालने में कोई कसर न छोडती।  
इस किरकिरी से तंग आकर सास दुखी हो उठी और एक सुबह उदासी में डूबी  वह बेटे-बहू  के पास आन बैठी । बेटा उस समय अखबार पर नजर गड़ाए चाय की चुसकियाँ ले रहा था।
माँ का उतरा चेहरा देख इतना तो वह समझ गया कि माँ कुछ कहना चाहती है पर क्या कहना चाहती है न समझ पाया। प्रश्न भरी निगाहों से उसने उसकी ओर ताका।
-बेटा, अब बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत नहीं कि हर काम को ठीक से सम्हाल सकूं।
-मेरी हड्डियों में भी इतनी ताकत नहीं कि पूरा घर सँभाल सकूँ। मेरी जान को तो हजार काम हैं। कमली चाय पीते पीते उबल पड़ी।
-बहू,तेरी हड्डियों में ताकत नहीं –मेरी हड्डियों में ताकत नहीं--- पर मेरे बेटे के कंधे तो मजबूत हैं।
-इन्हें इतना समय कहाँ कि बाहर भी काम करें और घर में भी।
-मैं कई दिनों से देख रही हूँ अखबार पढ़ने और चाय की चुसकियाँ लेने में तुम लोगों को आधा घंटा तो लग ही जाता है। यह सब जल्दी निबटाकर थोड़ा समय तो घर के काम के लिए  निकाला ही जा सकता है। क्यों बेटा –कुछ गलत कह रही हूँ?
बेटे का मन अखबार से उचाट हो गया। उसने उचककर रसोई में झाँका। कंपकँपाती ठंड में नल के नीचे झूठे बर्तनों का पहाड़ उसकी माँ का इंतजार कर रहा था।
उसने माँ पर भरपूर निगाह डालते हुए गहरी सांस ली और रसोई की तरफ बढ़ गया।

 सुधा भार्गव 

शनिवार, 12 मार्च 2016

लघुकथा अनवरत (फेसबुक मित्रों की लघुकथाएँ )में प्रकाशित


कमाऊ पूत/ सुधा भार्गव 

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गर्मी के दिन थे! बाँके को सब्जियाँ बेचने शहर की मंडी जाना था। ताप से बचने के लिए उसने सवेरे ही चल देना ठीक समझा। माँ चार रोटियों  के साथ -साथ  5-6 पानी की बोतलें भी झोले में डालने लगी-
—अरे –रे यह क्या कर रही है ?आज क्या पानी ही पानी पीऊँगा।
बेटा,घड़ी-घड़ी तो गला तर करना पड़े है। जरूरत पड़ने पर कुएं का ठंडा पानी दूसरे को भी पिला दीजो। प्यासे को पानी पिलाने से पुण्य ही मिलेगा। 
बाँके को माँ की बात जांच गई और बिना चूँ चपड़ किए सब्जी की टोकरियों के साथ बैलगाड़ी में सारी बोतलें रख लीं। मंडी पहुँचते -पहुँचते सूर्य देवता तमतमाए हुए पूरे ज़ोर से निकल आए।वह  पसीने से तर और गला सूखा –सूखा। पानी पीकर चैन की सांस ली  बोला –आह ,कितना मीठा पानी! अपनी तो सारी थकान मिट गई।
पास खड़े ग्राहक ने उसकी बात सुन ली।  बोला -भइए,मुझे भी तो पिला जरा पानी। गर्मी ने कहर ढा रखा है। तेरे पास तो बहुत बोतलें है। एक मुझे भी दे दे। कितने दाम की है।
एक मिनट बाँके सोच में पड़ गया—पानी का भी दाम!न कभी देखा न सुना।फिर भी मुफ्ती में क्यों दूँ ?
कुशल विक्रेता की तरह बोला—बाबू, ईमान का पानी है,एकदम ताजी,शुद्ध और मीठा। एक बोतल का दाम दस रुपए।
ईमान के पानी की बात दूसरे ग्राहकों के कान में भी पड़ गई और सब्जी से पहले पानी की बोतलें बिक गईं।

ईमान का पानी बाँके के लिए कमाऊ पूत था और इसके सामने वह पाप –पुण्य की बात भूल गया। 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

दिल्ली न्यूज ट्रैक (www.delhinewstrack.com)
पाक्षिक समाचार पत्रिका  15 दिसंबर,2015(सयुक्तांक-साहित्य विशेषांक  )में मेरी चार लघुकथाएँ प्रकाशित हुई है। उनमें से एक इस ब्लॉग में पोस्ट कर रही हूँ। इसके  संपादक अरविंद गुप्ता हैं और अशोक आन्द्रे जी ने इस अंक के लिए विशेष सहयोग प्रदान किया है। इस अंक के द्वारा साहित्य की विभिन्न विधाओं से संबन्धित रचनाएँ सुधि पाठकों तक पहुंची है जो स्वयं में परिपूर्ण हैं। 

सुहागन/सुधा भार्गव 


वृद्ध पति पत्नी जल्दी ही रात का भोजन कर लेते, अतीत की यादों को ताजी करते हुए टी. वी. देखा करते। एक दिन वृदधा जल्दी सो गई पर आधी रात को हड़बड़ाकर उठ बैठी अरे तुमने मुझे जगाया नहीं !मेरी सीरीयल छूट गई।
-बहुत खास सीरियल थी क्या?
-हाँ ! तुमने भी तो देखी थी सास भी कभी बहू थी। उसमें सास बहू और पोता बहू एक सी साड़ी पहने  हुई थी। आजकल उम्र का तो कोई लिहाज ही नहीं। पर दादी सास लाल पाड़ की साड़ी पहने और कपाल पर सिंदूर की चौड़ी बिंदी लगाए लग बड़ी सुंदर रही थी।
-तुम भी वैसी एक साड़ी खरीद लो।
-सोच तो रही हूँ पर मैं बूढ़ी न ठीक से पहन सकती हूँ न चल सकती हूँ।
-कोई औरत बूढ़ी नहीं होती जब तक उसका पति जिंदा होता है।
झुर्री भरा चेहरा लाजभरी ललाई से ढक गया और प्यार से बतियाती पति का हाथ थामे सो गई।  
सुबह पत्नी को गहरी नींद में डूबा जान पति ने उसे चादर अच्छे से ओढ़ाई और आहिस्ता से कमरे से निकल गया।
सूरज सिर पर चढ़ आया ,बेटे का ऑफिस जाने का समय हो गया। आदत के मुताबिक वह माँ  को प्रणाम करने उसके कमरे में आया माँ माँ मैं ऑफिस जा रहा हूँ । उठो न ,अभी तक सोई हो ।
अपनी बात का कोई असर होते न देख उसने माँ को हिलाया डुलाया। जागती कैसे! वह तो चीर निद्रा में लीन थी।
बेटा दहाड़ मारकर रो पड़ा माँ बिना कुछ  कहे मुझे छोडकर ऐसे क्यों चली गईं।
-सोने दे सोने दे !उसे जो कहना था वह कहकर गई है।वृद्ध पिता थकी आवाज में बोला।
अर्थी सजाई गई। लोगों ने देखा लाल पाड़ की साड़ी मे लिपटी माथे पर सिंदूरी बिंदी जड़ी सुहागन मुस्कुरा रही है। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

लघुकथा



नई पौध /सुधा भार्गव 

तैल चित्र 
वह एक ऐसा मदरसा था जिसमें हिन्दू –मुसलमान दोनों के  बच्चे पढ़ने आते थे। एक बार मौलवी साहब उधर से गुजरे। अहाते मेँ बच्चे प्रार्थना कर रहे थे। एक बच्चे को पहचानते हुए उनका तो खून खौल उठा  -अरे सलीम ने अपने बेटे को  मेरे पास भेजने की बजाय इस मदरसे मेँ दुश्मनों के चूजों के साथ पढ़ने भेज दिया। लगता है उसकी मति मारी गई है।

दूसरे दिन पंडित जी अपना जनेऊ संभालते हुए मदरसे के सामने से निकले। टिफिन के समय बच्चे मदरसे के बाहर खेल रहे थे। ।उनकी निगाह अपने यजमान के बेटे पर पड़ गई । उन्हें तो साँप सूंघ गया--- काफिरों के साथ हिन्दू के बेटे! हे भगवान अब तो इसके घर का पानी भी पी लिया तो नरक मेँ भी जगह नहीं मिलेगी। राम –राम –राम कहते आगे बढ़ गए।

दोनों को रात भर नींद नहीं आई । सुबह ही कुछ कर गुजरने की धुन मेँ मदरसे की ओर चल दिए। पंडित सोच रहा था –आज हिन्दू के बच्चे को मदरसे मेँ घुसने ही नहीं दूंगा। उधर मौलवी इस उधेड़बुन मेँ था –किसी भी तरह सलीम के बच्चे का कान खींचते हुए उसके बाप के घर न पहुंचा दिया तो मैं मौलवी नहीं। दोनों एक ही रास्ते पर जा रहे थे,एक ही स्थान पर पहुँचना था पर सांप्रदायिक भावना की मजबूत जकड़ ने उन्हें एक दूसरे से बहुत दूर ला पटका था। भूल से आँखें चार हो जातीं तो घृणा से मुंह फेर लेते।

इनके पहुँचने के समय तक  मदरसा बंद था मगर बहुत से बच्चे उसके बाहर खड़े  खुलने का इंतजार कर रहे थे। उनमें सलीम का बेटा भी था ।
मौलवी जी ने उसे धर दबोचा -–बरखुरदार ,तुम इस मदरसे मेँ पढ़ने क्यों चले आए?हमने तो तुम्हारे वालिद साहब को पढ़ाया है। तुमको भी हमारे पास आना चाहिए।   
-मौलवी साहब मेरे वालिद साहब को रामायण की सीरियल देखना बहुत अच्छा लगता है । वे तो इसे पढ़ना भी चाहते है पर हिन्दी नहीं जानते । मैं यहाँ हिन्दी सीखकर उन्हें रामायण पढ़कर सुनाऊंगा।
मौलवी का मुंह लटक गया।

उधर पंडित ने अपने यजमान के बेटे को जा घेरा- बेटे,मुसलमानों के इस मदरसे मेँ तुम क्या कर रहे हो। तुम्हारे लिए इससे भी अच्छे स्कूल है पढ़ने के लिए।
-पंडित जी,पिताजी गजल शायरी के बहुत शौकीन है, वे खुद मिर्जा गालिब की गजलें पढ़ना चाहते है। मैं उर्दू सीखकर उनको गजलें सुनाऊँगा और सोच रहा हूँ-उन्हें उर्दू भी सिखा दूँ।
धर्मसंकट में पड़े पंडित का हाथ अपने जनेऊ पर जा पड़ा।

मदरसा खुलने पर बच्चे हाथ मेँ हाथ डाले उछलते कूदते अंदर भाग गए और मौलवी व पंडित एक दूसरे को ठगे से देखने लगे। चुप्पी तोड़ते हुए पंडितजी बोले –चलो मौलवी –लौट चलें। एक नई पौध जन्म ले रही है। 

 अंतर्जाल पत्रिका साहित्य शिल्पी में प्रकाशित। उसकी लिंक है-
http://www.sahityashilpi.com/2015/04/nayepaudh-shortstory-sudhabargava.html