वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शनिवार, 1 जून 2013

लघुकथा



कलेजे का दर्द /सुधा भार्गव 









इकलौता बेटा आस्ट्रेलिया से वापस आ रहा है ,बुढ़ापे में उनको सहारा मिलेगा --माँ -बाप की खुशी का ठिकाना नहीं । बाप ने ऊपर की मंजिल के कमरे बाथरूम आधुनिक उपकरणों से सजा दिये  ताकि बहू बेटे शान से रहें । पोती करीब चार माह की थी ,उसकी परवरिश के लिए एक आया का भी इंतजाम हो गया । बेटा आया ,माँ बाप ने उसे कलेजे से लगा लिया । दूसरे दिन चाय -नाश्ते के समय  बहू तो  नीचे उतर कर आई पर  बेटा नही । माँ -बाप ने संतोष कर लिया थकान अभी दूर नहीं हुई है  इसीलिए नीचे नहीं आ पाया । शाम को भोजन  के समय सब इकट्ठे हुये । 
-बेटा ,अब तुम बिना किसी चिंता के काम पर जा सकते हो । मैं तो सुबह बजे ही चला जाता हूँ । कहो तो तुम्हें तुम्हारे आफिस छोडता जाऊं। तुम्हारी कार आने में तो समय लगेगा ।
 -पापा ,आफिस तो मैं  चार -पाँच दिनों बाद जाऊंगा । 

एक हफ्ता निकल गया पर बेटा सारे दिन बीबी के पास बैठा रहता । ऐसा लगता माँ -बाप से आँखें चुरा रहा है । बाप की अनुभवी आँखें ताड़ गईं और टोक दिया -बेटे तुम अपने  काम पर नहीं गए ?
-पापा ,काम ढूँढना पड़ेगा ,आस्ट्रेलिया में मेरी  नौकरी छूट गई थी । 
-तो जल्दी ढूंढो । 
-जल्दी किस बात की है ?अभी -अभी तो आया हूँ ,साँस तो लेने दो .... । काम करने के लिए आस्ट्रेलिया क्या कम था !
-जल्दी है । जानते हो !बाप के कलेजे में सबसे तीखा दर्द कब उठता है ?
बेटा कुछ समझ न सका और उत्तर की आशा में उसकी आँखें ठहर सी गईं । 
-जब उसका जवान  बेटा बाप की रोटी तोड़ता है । 


(प्रवासी दुनिया  अंतर जाल पत्रिका में प्रकाशित  )

14 टिप्‍पणियां:

  1. सुधा जी अच्‍छी लघुकथा है। पर इसमें अंतिम पंक्ति की जरूरत नहीं है,वह लघुकथा की धार को भौंथरा कर देती है।

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    1. राजेश जी ,सुझाव के लिए धन्यवाद ।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज रविवार (02-06-2013) मुकद्दर आजमाना चाहता है : चर्चा मंच १२६३ में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. aapki yeh laghu katha aane wali pidiyon ke liye sandesh ke saath ek sachchai ko bhii byaan kar gaee,badhai.

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  4. एक उत्कृष्ट लघुकथा ! सुधा जी बधाई हो !

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  5. बहुत कडवी मगर सच्ची बात कही है।

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  6. सुधा दी, इस लघुकथा में बेटा नालायक नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय गिरावट का मारा है। बहू भी नालायक नहीं है, चाय-नाश्ते के समय वह बिस्तर को छोड़कर नीचे सास-ससुर के पास आ जाने की नैतिक औपचारिकता निभा रही है। बेटा बाप से नज़रें नहीं मिला पा रहा, यह उसकी नकारात्मक सोच का परिणाम है; वस्तुत: यह भी हो सकता है कि अपने बेरोज़ग़ार हो जाने की सूचना देकर वह माँ-बाप को परेशान न करना चाहता हो। आप तो जानती ही हैं कि नयी पीढ़ी को काम तलाशने के लिए पुरानी पीढ़ी की तरह सर्टिफिकेट्स की फाइल बगल में दबाकर ऑफिस-ऑफिस भटकने की आवश्यकता नहीं है, सारा काम इंटरनेट पर सम्पन्न होता है। इस लघुकथा में, मुझे लगता है कि अंतिम वाक्य के रूप में उपदेश देने की जल्दी बरती गई है। इस दृष्टि से बाप का चरित्र काफी कमज़ोर हो गया है।

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  7. भाई जी ,आज देश हो या विदेश ,प्रतियोगिता की रफ्तार इतनी तेज है कि जरा सा भी पिछड़ने पर नौकरी से हाथ धोने का डर रहता है । मुश्किलें बढ़ जाती हैं जब करोड़ का पैकेज पाने वाले को केवल हजारों का ही मिल पाता है और वह ऐसी नौकरी अस्वीकार करता चला जाता है। इकलौते लड़के आर्थिक रूप से माँ - बाप का शोषण करने में पीछे नहीं रहते । विदेश में अकेले रहते -रहते उनके संकीर्ण विचारों में माँ-बाप की कोमल भावनाओं व उनके सुख का स्थान गौण ही रहता है यहाँ तक कि विचारों का आदान -प्रदान भी थम सा जाता है क्योंकि वे अपने को अधिक योग्य समझते हैं । इसी दृष्टि से लघुकथा लिखी गई है ।
    इस कहानी में बेटा अपनी पत्नी के पास बैठा रहता था --सुधि पाठक अपने अनुसार इसका कारण समझने में स्वतंत्र हैं । बाप -बेटे का वार्तालाप संक्षिप्त रखा है क्योंकि जब रिश्तों में मौन पसर जाता है तो गलत फहमियाँ होनी स्वाभाविक हैं। बेटे के प्रति कटुता इसी का परिणाम हैं । जवान बेटे की मजबूरी हो या न हो बाप पर आर्थिक रूप से निर्भर रहना दुखदायी ही होता है । हाँ,इतना अवश्य है कि इस लघुकथा की बुनावट के पीछे ज्यादा मंजे हाथ नहीं हैं ।
    स्वस्थ सुझावों व सृजनात्मक और प्रेरक विचारोंके लिए आभार । आशा है भविष्य में भी इसी प्रकार सहयोग मिलता रहेगा ।

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  8. दीदी लघुकथा की बुनावट में कमी नही उसके कथ्य में है । मैं भी बलराम जी की बात से सहमत हूँ क्योंकि आमतौर पर रिश्तों में दर्द का आधार पैसा नही दूसरी बातें होतीं हैं । बेटा इस तरह सोच सकता है किन्तु एक पिता का सोचना गले नही उतरता । बाकी कथा की बुनावट तो एकदम बढिया है ।

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  9. मित्रवर
    समस्त टिप्पणियों व विचारों के लिए पुन:धन्यवाद । सुझावों के अनुसार कदम जरूर उठाया जाएगा ।

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  10. बलराम जी से सहमत , पिता बेटे के परेशानी में होने पर उसे सांत्वना देता है , कटाक्ष कम ही करता है .

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