वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शुक्रवार, 12 जून 2026

लघुकथा कलश अंक 16 .2025। जुलाई -दिसंबर

         आज ही मुझे लघुकथा कलश का नया अंक मिला । इसका आवरण व साज सज्जा देख बहुत  हर्ष हुआ। इसमें मेरी दो लघुकथाएं हैं। सूखी धरती ,हरी कोंपल तथा आखिरी ईंट । दोनों में ही आने वाले 25-30 वर्षों की हलचल का शोर  है। लघुकथा कलश के संपादक योगराज प्रभाकर  जी का बहुत -बहुत धन्यवाद कि इनका उन्होंने चयन किया। 

 

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