वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

लघुकथा-सार्थकता

सार्थकता  / सुधा  भार्गव






साहित्यिक  विधा ' लघुकथा ' पर  सेमिनार  हुई I दूर -दूर से  बुद्धिजीवी  पधारे I वक्तव्य  देने  के  लिए  भी और सुनने  के  लिए  भी I भाषणों  का  सिलसिला  शुरू  हुआ जो  रुकने  का  नाम  ही   न  लेता  था  | शब्दों  को  तोड़मरोड़ कर एक  ही  बात  कई बार  दोहराई  गयी |
                                                                                                   सुनने  वाले  जम्हाइयां  लेने   लगे  Iअध्यक्ष  महोदय  अपना  सिर  खुजलाने  लगे I   सब्र  का बाँध  टूटा  तो  उठ  खड़े  हुए  i बोले --
सत्य  ही ,लघुकथा कम  शब्दों  में  गंभीरता  से  चोट  करते  हुए  यथार्थ  को  मुखरित  करती  है I
उन्होंने  दूसरों  की  कही   बात  एक  बार  और  दोहरा दी  I

एक  श्रोता  खीजकर  बोला --
''काश  वक्तव्य  का  कलेवर  भी  लघु  होता  और  कलेजे  में  होता गहन -गंभीर  स्पंदन  - - - तभी  सेमिनार  सार्थक  होती  I  
  

3 टिप्‍पणियां:

  1. अज के तथाकथित सेमीनारों पर सटीक कटाक्ष। आभार।

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  2. अच्छा लिखा है. कटाक्ष अच्छा है. बधाई.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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