वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

रविवार, 31 मार्च 2013

लघुकथा संग्रह चर्चा


विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ 

पंजाबी  लघुकथाकारों की  कुछ रचनाएं

प्रथम बार मुझे  पंजाबी मिन्नी कहानियों (लघुकथा )का हिन्दी में अनुवाद किया हुआ तीसरा संग्रह-विगत दशक  की पंजाबी लघुकथाएं को पढ़ने का अवसर मिला ।इसे मुझे रामेश्वर काम्बोज 
'हिमांशु 'ने भेंट किया था ।
  
इसके सम्पादक श्याम सुन्दरअग्रवाल तथा डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति हैं ।

प्रकाशक है -

अयन प्रकाशन

1/20 महरौली ,नई दिल्ली - 1100030

मूल्य -260.00 रुपये 

दूरभाष :26645812/9818988613

e.mail:ayanprakashan@rediffmail.com 




इस संग्रह में जनजीवन से जुड़ी विविध विषयों  पर लिखी  लघुकथाएं   
जिज्ञासा के पुल पर रुचिता लाते हुए संवेदना से सारोवार, दिल में घर कर लेती हैं । अधिकांशत मिन्नी कथाओं के  पात्र रोने झींकने व् सिसकने में विशवास नहीं  करते   बल्कि समस्या का समाधान ढूँढ़ते हुए जीने की इच्छा रखते हैं --वे निराशावादी न होकर उनमें  कुछ कर गुजरने की कशिश  है ।

सकारात्मक दृष्टिकोण से  इनमें चेतना के स्वर सुनाई देते है चाहे वह नारीमंच हो या निम्न वर्ग
रिश्तों का अटूट बंधन हो या उनकी टूटन -- अनेक लघुकथाओं में एक बेहतर समाज के दर्शन  होते हैं और भविष्य के प्रति हम आशान्वित हो उठते हैं ।  

संग्रह से यहाँ  तीन लघुकथाएँ उद्घृत की जा रही हैं जो अपने में विशेष हैं ।  


1--भूकंप/कर्मजीत सिंह नडाला(डॉ)

बेटा सोलह वर्ष का हुआ तो वह उसे भी साथ ले जाने लगा ।
“कैसे हाथ –पाँव टेढ़े –मेढ़े करके चौक के कोने में  बैठना है ,आदमी देख कैसे ढीला सा मुंह बनाना है । लोगों  को बुद्धू बनाने के लिए द्या का पात्र बनकर कैसे अपनी ओर आकर्षित करना है । ऐसे बन जाओ कि सामने से गुजर रहे आदमी का दिल पिघल जाये और सिक्का उछलकर तुम्हारे कटोरे में  आ गिरे। “
वह सीखता रहा और जैसा पिता कहता ,वैसा बनने की कोशिश भी करता  फिर एक दिन पिता ने पुत्र से कहा –जा अब तू खुद ही भीख मांगा कर ।
पुत्र शाम को घर लौटा । आते ही उसने अपनी जेब से रुपए निकालकर पिता की ओर बढ़ाए –ले बापू ,मेरी पहली कमाई ---।
-हैं !कंजर !पहले दिन ही सौ रुपये !इतने तो कभी मैं आज तक कमाकर नहीं ला सका ,तुझे कहाँ से मिल गए ?
-बस ऐसे ही बापू ,मैं तुझसे आगे निकल गया ।
-अरे कहीं किसी की जेब तो नहीं काट ली। 
-नहीं,बिलकुल नहीं।
-अरे आजकल तो लोग बड़ी फटकार लगाकर भी आठ आने –रुपया बड़ी मुश्किल से देते हैं—तुझ पर किस देवता की मेहर हो गई ?
-बापू ,अगर ढंग से मांगो तो लोग आप ही खुश होकर पैसे दे देते हैं ।
-तू कौन से नए ढंग की बात करता है ,कंजर ?पहेलियाँ न बुझा । पुलिस की मार खुद भी खाएगा और हमें भी मरवाएगा । बेटा अगर भीख मांग कर गुजारा हो जाए तो चोरी चकारी की क्या जरूरत है ?पल भर की आँखों की शर्म है –हमारे पुरखे भी  यही कुछ करते रहे हैं ,हमें भी यही करना है । हमारी नसों में  भिखारियों वाला खानदानी खून है ---हमारा भी यही रोजगार है ,यही कारोबार है । ये खानदानी रिवायतें कभी बदली हैं?तू आदमी बन जा ---।
-बापू आदमी बन गया हूँ ,तभी कह रहा हूँ । मैंने पुरानी रिवायतें  तोड़ दी हैं । मैं आज राज मिस्त्री के साथ दिहाड़ी करके आया हूँ । एक कॉलोनी में किसी का मकान बन रहा है । उन्होंने  शाम को सौ रुपये  दिये । सरदार कह रहा था ,रोज आ जा या कर ,सौ रुपए मिल जाया करेंगे ---।
-पिता हैरान हुआ । कभी बेटे की ओर देखता ,कभी रुपयों की ओर । यह लड़का कैसी बातें कर रहा है । आज उसकी खानदानी रियासत में भूकंप  आ गया था ,जिसने सब कुछ उलट पुलट दिया था ।

2-- बदला हुआ स्वर/सतिपाल खुल्लर

हू उसके आगे रोटी की थाली और पानी का गिलास रख गई थी । वह चुपचाप रोटी खाने लगा ।
-यह भी कोई जिंदगी है !पिछले कई वर्षों से ऐसा ही चल रहा है । घर में कोई समारोह हो ,उससे पूछा तक नहीं जाता । सभी को चाय –पानी पिलाने के बाद उसकी बारी आती है । रोटी खाते हुये वह सोच रहा था । 
उसे लगा ,वह तो जैसे घर का सदस्य ही नहीं । फिर उसे अपने पिता की याद आई जो सौ वर्ष की उम्र भोग कर मरा था । कितना दबदबा था उसका घर में । वह अपने पिता का ध्यान भी तो बहुत रखता था । लेकिन उसकी पत्नी और बच्चे  उसकी सेवा से बहुत दुखी थे ।कभी –कभी उसे लगता कि अपनी इस अवस्था के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है ।
-मैंने इस सब्जी से रोटी नहीं खानी । मेरे लिए कोई और सब्जी बनाओ । गाजर की सब्जी से उसके पिता को जैसे चिढ़ थी ।
-बापू ,ऐसे न किया कर । उस दिन उसने जैसे अपनी बेबसी जाहिर की थी   ।
-ये मेरा पाठ करने वाला मोढ़ा और गुटका है ,उन्हें यहाँ से कोई  न हिलाये । मैंने सौ बार कहा है पर किसी पर कोई असर ही नहीं होता ।
-बापू ,धीरे बोल ---।
-मुझे किसी का डर है ?यह मेरा घर है ,मैंने इसे अपने इन हाथों से बनाया है । बापू क्रोध में और भी ऊंचे स्वर में बोलता ।
-यह बात तो ठीक है । पर उसे लगता कि बापू  व्यर्थ ही क्लेश किए रखता है ।
इस तरह की बातें घर में नित्य  ही होती रहती थीं । तब वह  सोचता –मैं यह सब नहीं करूंगा । जो पकाया ,बनाया हुआ होगा ,वही खा लिया करूंगा । चारपाई पर बैठा राम –राम करता रहूँगा । जिंदगी का क्या है ,आदमी को जीने का ढंग आना चाहिए ।
पर अब उसे लागने लगा कि वह तो बस रोटी खाने का ही साझेदार है । घर में उसका कोई अस्तित्व ही नहीं । आज रोटी खाते हुये वह बापू को याद कर रहा था । बापू ठीक ही तो कहता था –आदमी को घर में अपना अस्तित्व तो बनाकर रखना ही चाहिए । कोई काम तो हो । भोजन करने के बाद आम दिनों के विपरीत वह ज़ोर से खांसा और अपने पोते को आवाज दी ,जैसे बापू उसके बेटे को बुलाया करता था । आवाज सुनकर घर वालों के कान खड़े हो गए ।
-हैं ---दादा जी !यह तो दादाजी की आवाज है । उसका अपना बेटा ही अपनी माँ की ओर देखकर बोला ।
 इससे पहले वह कभी ऊंची आवाज में नहीं बोला था । उसकी पत्नी भागकर आई । फलभर के लिए उसे लगा ,जैसे उसका पति नहीं ,उसका ससुर उसके सामने बैठा हो ।
--सुनो ,आगे से सब्जी मुझ से पूछकर बनाया करो । वह अपनी बहू को सुनाता हुआ बोला । 


3--मंदिर /जसबीर बेदर्द लंगेरी

सुरिंदर ने कोठी बनवाने से पहले अपने आर्कीटेक्ट दोस्त को घर बुलाया और कहा -यार विजय  !कोठी बनानी है ,एक अच्छा सा नक्शा बनादे और मुझे समझा भी दे । 
-सुरिंदर ,मेरे पास कई नक़्शे बने पड़े  हैं …यह देख ,यह अभी बनाया है । इसमें सब कुछ अपनी जगह पर पूरी तरह फिट है ।।पर एक चीज फालतू है , काम की नहीं ---यह छोटा सा पूजा वाला कमरा ,क्योंकि आप हुए तर्क शील । 
-नहीं यार ,यह कमरा तो बहुत जरूरी है । यह तो एक साइड पर  है और छोटा भी । हमें तो यह कमरा बड़ा चाहिए ,साथ में हवादार भी । इसमें हमने भी मूर्ति रखनी है ,वह भी जीती जगती ,जिसके हर समय दर्शन होते रहें । सुरिंदर बोला । 
-जीती जागती मूर्ति !वह कौन सी ?विजय ने हैरान होते हुए कहा  । 
-यह देख हमारे भगवान् की मूर्ति । सुरिंदर ने सोफे पर साफ- सुथरी वस्त्रों में बैठी अपनी माँ के गले में पीछे से बांह डालते हुए कहा । 
-बेटा विजय ,समय चाहे बदल गया ,फिर भी माओं ने सरवन बेटों को पैदा करना बंद नहीं किया है . माँ ने भावुक होते हुए कहा . 
-वाह कमाल है भई !जिस घर में बिजुर्गों का इतना सम्मान हो ,वहां मंदिर बनाने की क्या जरूरत है । वह तो घर ही मंदिर है ---ठीक है ,मैं सब समझ  गया । अच्छा मैं कल आऊंगा । 
इतना कह विजय उठने लगा तो सुरिंदर की पत्नी चाय और बिस्कुट मेज पर  रखते हुए बोली --भाई  सा --ब !मंदिर से खाली हाथ नहीं जाते । यह लो प्रसाद ।  

समाप्त 




शुक्रवार, 22 मार्च 2013

हिन्दी चेतना में प्रकाशित


पुरस्कार /सुधा भार्गव 

 यह उन दिनों की बात है जब मैं कलकत्ते में जय इंजीनियरिंग वर्क्स के अंतर्गत उषा फैक्ट्री में इंजीनियर था । जितना ऊँचा ओहदा उतनी  भारी भरकम जिम्मेदारियां !खैर --मैं चुस्ती से अपने कर्तव्य पथ पर अडिग था । 

अचानक उषा फैक्ट्री में लौक आउट हो गया । छह माह बंद रही । हम सीनियर्स को वेतन  तो मिलता रहा पर रोज जाना पड़ता था । आये दिन मजदूर अफसरों का घिराव कर लेते थे क्योंकि लौक आउट होने का कारण ,वे उन्हें  ही समझते थे । 

;माह के बाद नींद हराम हो गई।  तरह -तरह की अफवाहें जड़ ज़माने लगीं --बंद हो जायेगा वेतन मिलना ,छंटनी होगी कर्मचारियों की ,इस्तीफा देने को मजबूर किया जायेगा --फैकट्री बंद हो जायेगी । 
दिन -रात मैं सोचता -भगवान् नौकरी छूट गई तो क्या होगा --|तीन बच्चों सहित कहीं एक दिन भी गुजारा नहीं । 

एक अन्तरंग मित्र जो देहली   में रहते थे सलाह दी -एक माह की छुट्टी लेकर तुम यहाँ आ जाओ । मशीने मैं  खरीदूंगा तुम कार के पार्ट्स बनाना । 
वहाँ जाकर मैंने कार के पार्ट्स की ड्राइंग की फिर उसके अनुसार  पार्ट्स बनवाये । मैंने अपनी सफलता की सूचना मित्र को  बड़े उत्साह से दी । 

वे बोले- ---पार्ट्स तो बनवा लिए पर इनके  विज्ञापन का कार्य भी आपको करना पड़ेगा । प्रारंभ  में तो दरवाजे -दरवाजे आपको ही जाना पड़ेगा । इनके इस्तेमाल करने से होने वाले फायदे आपसे ज्यादा अच्छी तरह दुकानदारों को कौन समझा सकेगा । उनकी मांग  पर निर्भर करेगा कितना माल बने । व्यापार में शुरू -शुरू में अकेले ही करना पड़ते है । मेरा  मतलब माल बनाना ,बेचना ,पैसा उगाहना । 

व्यापार के मामले में  मैं नौ सीखिया--बाप दादों में कोई व्यापारी नहीं --इतनी भागदौड़ वह भी अकेले।  फैक्ट्री में तो अलग -अलग विभाग के अलग दक्ष अफसर व कर्मचारी । यहाँ मैं समस्त विभागों की खूबियां  अपने में कैसे पैदा करूँ !
इस डावांडोल परिस्थिति में मैंने निश्चय किया -पार्ट्स लुधियाना में छोटे छोटे कारखानों से बनवाकर उन्हें बेचूँगा । लुधियाने मैं मेरी जान पहचान भी थी । 

कार का एक विशेष पार्ट ५रुपये का बना । मैंने उसकी कीमत १०रुपये रखी । इस बारे में दोस्त की सलाह लेनी भी आवश्यक समझी । 
 बोले- -१०रुपये तो बहुत कम है ,१५ रखिये । 
-इतनी ज्यादा ! पार्ट बिकेगा नहीं । 
-सब बिकेगा |जो ज्यादा से ज्यादा झूठ बोलने वाला होता है वही बड़ा व्यापारी बनता है । यहाँ ईमानदारी से काम नहीं चलता । 

कई  दिन गुजर गये पर उनकी बात पचा न पाया। मेरी स्थिति बड़ी अजीब थी !पैसा मेरा दोस्त लगा रहा था  इस कारण उसकी बात माननी जरूरी थी मगर मानूँ कैसे !मेरी आत्मा कुलबुलाने लगती ,बार -बार धिक्कारने आ जाती । आखिर   हिम्मत करके एक सुबह बोल ही  दिया -
-यार ,मुझसे यहाँ काम धंधा  नहीं होगा । कलकत्ते ही वापस जा रहा हूँ । 
-जानता था --जानता था ,तुमसे कोई काम नहीं होगा |ये इंजीनियर सब बेकार होते हैं |
उस पल मैं हजार बार मरा होऊंगा ----। 

कलकत्ते पहुँचते ही फैक्टरी गया । मेरी मेज पर एक लिफाफा रखा हुआ था । काँपते हाथों से उसे खोला । लग रहा था सैकड़ों  बिच्छू  एक साथ उँगलियों में डंक मार रहे हों । 
मेरे नाम पत्र था -- 
आपकी ईमानदारी व मेहनत से प्रशासक वर्ग बहुत प्रभावित है । अत :खुश होकर आपको हैदराबाद भेज रहे हैं ताकि फैन  फैक्टरी में भी विकास विभाग संभालकर नये -नये डिजायन के पंखों का निर्माण करें । 
 हमारी शुभ कामनाएं आपके साथ हैं । 


गूगल से साभार 


 प्रकाशित -हिन्दी प्रचारिणी सभा (कैनेडा )की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका  हिन्दी चेतना लघुकथा विशेषांक  अक्तूबर 2012 में. 

हिन्दी चेतना की लिंक है  - http://hindi-chetna.blogspot.in/

रविवार, 17 मार्च 2013

मेरी लघुकथा



हस्ताक्षर /सुधा भार्गव

संसद में यह अधिनियम पास हो चुका था कि बाप –दादा की संपत्ति में बेटियों का भी हक है । यदि वे चाहें तो अपने कानूनी हक की लड़ाई लड़ सकती हैं । भाई बेचारों के बुरे दिन आ गए । यह हिस्सा बांटा नियम कहाँ से आन टपका ! कुछ सहम गए ,कुछ रहम खा गए ,कुछ घपलेबाजी कर गए ,कुछ चाल चल गए । माँ –बाप मुसीबत में फंस गए । बेटी को दें तो ---बेटे से दुश्मनी ,न दें तो उसके प्रति अन्याय ! जिनके माँ –बाप ऊपर चले गए ,उनके लड़कों ने संपत्ति  की कमान सँभाली । निशाना ऐसा लगाया कि माल अपना ही अपना ।

सोबती की शादी को दस वर्ष हो गए थे । वह हर समय अपने भाइयों के नाम की माला जपती रहती –मेरे भाई महान हैं । उनके खिलाफ कुछ नहीं सुन सकती । लाखों में एक हैं वे । राखी के अवसर पर  दोनों भाइयों की कलाई पर सोबती  स्नेह के धागे बांधती । वे भी भागे चले आते । उत्सव की परिणति महोत्सव  में हो जाती ।

इस साल भी तीनों भाई –बहन एकत्र हुये । छोटा भाई कुछ विचलित सा था । ठीक राखी बांधने से पूर्व उसने एक प्रपत्र बहन के सामने बढ़ा दिया –दीदी ,इसपर हस्ताक्षर कर दो ।
हस्ताक्षर करने से पूर्व उसने पढ़ना उचित समझा । लिखा था –मैं इच्छा से पिता की संपत्ति में से अपना हक छोड़ रही हूँ ।

सोबती एक हाथ में प्रपत्र अवश्य पकड़े हुये थी परंतु हृदय में उठती अनुराग की अनगिनत फुआरों में भीगी सोच रही थी -----
–बचपन से ही मैं अपने हिस्से की मिठाई इन भाइयों के लिए रख देती थी और ये शैतान अपनी मिठाई भी खा जाते और मेरी  भी । उनको खुश होता देख मेरा खून तो दुगुना हो जाता था । आज ये बड़े हो गए तो क्या हुआ ,रहेंगे तो मुझसे छोटे ही !यदि ये मेरा संपत्ति का अधिकार लेना चाहते हैं ,तो इनकी मुस्कुराहटों की खातिर प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दूँगी । मुझे तो इनको खुश देखने की आदत है ---।

सोबती ने बारी –बारी से दोनों भाइयों की ओर देखा और मुस्कराकर प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिये ।

प्रकाशित -संकलन  लघुकथाएं जीवन मूल्यों की (फरवरी 2013 में प्रकाशित)
सम्पादन -सुकेश साहनी ,रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

                                                                             

मंगलवार, 12 मार्च 2013


संकलन चर्चा -मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ 
  तथा           
मलयालम कथाकार एन.उन्नी की तीन लघुकथाएं

मैं करीब एक वर्ष पहले बलराम अग्रवाल जी के निवास स्थान दिल्ली गई थी । वहाँ मुझे यह संकलन " मलयालम की चर्चित  लघुकथाएं " प्राप्त हुआ जिसके संपादक वे स्वयं हैं ।



प्रकाशक-शुभम प्रकाशन,एन-10,उलधनपुर,नवीन शाहदरा,दिल्ली-110032
,मूल्य 150 रूपये
.
 इसमें 56 मलयालम कथाकारों की 81चुनिन्दा लघुकथाएं हैं । विभिन्न विषयों पर आधारित कुछ लघुकथाएं दिल को छूती हुईं कुछ देर को वहीं ठहर जाती हैं तो कुछ ताजिंदगी के लिए मानस पटल पर छा जाती हैं ।

 इस प्रकार की अनुवादित रचनाओं को पढ़ने से अन्य भारतीय भाषाओं से जुड़ने-जुड़ाने का  सुनहरा मौका मिला है ।

मलयालम के वरिष्ठ कथाकार एन.उन्नी की प्रभावपूर्ण  तीन लघुकथाएं इसी संकलन से प्रस्तुत की जा रही हैं । 

|1| कबूतरों से भी खतरा है

मेरे पिता जी ने भी कबूतर पाले थे । कबूतर पालना उनके लिए टाइम पास करने का साधन नहीं था । वे सचमुच कबूतरों से प्यार करते थे । उनका नहलाना –धुलाना ,समय-समय पर दाना चुगाना ,उनसे बातें करना आदि कार्यों में  पिता जी समर्पित थे । पिता जी के चारों तरफ कबूतर नृत्य करते थे । धीरे –धीरे उड़कर पिता जी को हवा देते थे ।

एक दिन ऊपर उड़ा  एक कबूतर घर के ऊपर चक्कर लगा कर कहीं उड़ गया । पिता जी ने कबूतर की बोली बोलकर घर के चारों तरफ चक्कर काटे ,लेकिन कबूतर नहीं मिला । पिता जी पागल से हो गए । खाना नहीं खाया  और रात भर सोये भी नहीं । दूसरे दिन सुबह बेचैनी से पिता जी फिर मोहल्ले के चक्कर काटने लगे । थके –भूखे कबूतर जी वापस घर को लौटे । पिता जी खुश तो थे ,लेकिन इस खुशी में  एक असपष्ट क्रूरता भी निहित थी । पिता जी ने उस कबूतर  के पंख काट दिये । उसके लिए एक जीवन साथी को भी लेकर आए थे ।लेकिन फिर पिता जी औए कबूतरों का इतना मधुर संबंध नहीं रहा ।

कबूतरी अंडे देने लगी । उनसे बच्चे निकले ,बड़े होने लगे । बच्चे धीरे –धीरे उड़ने लगे तो बड़े कबूतर ने उन्हें क्रोध से देखा ,मगर वह कुछ बोला नहीं,क्योंकि कबूतर को मालूम था कि उसकी भाषा पिता जी समझने लगे हैं । पिता जी भी कबूतर के व्यवहार से सावधान हो गए । शाम को कबूतरों को पिंजरे में बंद करके पिताजी बेचैन हो रहे थे । वे पिंजरे के बाहर कुशल जासूस की तरह निश्चल खड़े अंदर की बातचीत ध्यान से सुन रहे थे । पिता जी के चेहरे के हाव –भावों से मुझे लगा कि कोई गंभीर बात हो रही है ।

बड़ा कबूतर बच्चों को सावधान कर रहा था –
-बेटे,तुम उस आदमी के सामने कभी भी उड़ने का प्रयास नहीं करना । वह तुम्हारे पंख काट देगा । तुम्हें मालूम है ,बाहर की दुनिया कितनी सुंदर और असीम है । एक बार मैंने भी देखी थी । अनंत विशाल ,रंग –बिरंगे आकाश में मैं खो गया था  ।लौटने की इच्छा मुझे कतई नहीं थी ,लेकिन भूख-प्यास के कारण मुझे लौटना पड़ा । बाहर से दाना –पानी जुटाने की जानकारी मुझे उस समय नहीं थी लेकिन बाद में मालूम पड़ा कि बाहर की आजाद दुनिया में  हम जातों का झुंड है । उनके साथ मिलकर मैं भी भूख –प्यास से जूझ सकता था ।
-पिता कबूतर की व्यथा को देख सुनकर बच्चों  ने कहा –अब तो आपके पंख बड़े हैं ,आप उड़ते क्यों नहीं ?
-अब मेरा क्या ?तुम्हारे बड़े होने का इंतजार कर रहा था मैं ---। अब हम साथ उड़ेंगे । अपनी जैसी कमजोरियों से  तुम्हें बचाना भी तो है--- ।

मुझे लगा कि पिता जी भयभीत हो उठे हैं । दूसरे दिन सुबह होते ही पिताजी ने पिंजरा खोला और सभी कबूतरों को आकाश में  उड़ा दिया तो मैंने पिता जी से पूछा –
-आपने यह क्या किया पिताजी ?सारे कबूतरों को उड़ा दिया --।
पिता जी ने बोझिल स्वर में कहा –बेटे जब प्रजा आजादी की तीव्र इच्छा से जाग उठती है तो बड़े से बड़ा तानाशाह भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाता है । फिर तुम्हारा पिता तो.... |


|2|सर्कस

पड़वा का पर्व था । सभी जानवरों को अच्छी तरह रंगा देखकर संतुष्ट ठाकुर गुरुदयाल को लगा बंधुआ मजदूरों को भी आज कुछ रियायत देनी चाहिए । ठाकुर के अधीन तीस चालीस मजदूर बंधक थे । ठाकुर ने मजदूरों के मुखिया को बुलाकर  कुछ रुपए दिये और कहा –आज तुम लोगों की छुट्टी । घूम –फिर आओ । एक –एक धोती भी सबको दिला देना ।

पहले तो ठाकुर की बातें मुखिया को अविश्वसनीय लगीं । बाद में याद आया कि आज  जानवरों का त्यौहार है । मुखिया ने मजदूरों को एकत्रित किया और सुखद समाचार सुनाया ।,लेकिन छुट्टी कैसे मनाएँ ?यह किसी को भी नहीं सूझा । आखिर मुखिया ने सुझाया –चलो ,बाहर चलते हैं ,वहाँ  सर्कस चल रहा है ।

वे सर्कस देखने चले गए । सर्कस सबको अच्छा लगा ,लेकिन  मनोरंजक होंने के बावजूद लौटते समय वे बहुत गम्भीर  थे । हाथियों का क्रिकेट ,गणपति की मुद्रा में स्टूल पर बैठे हाथी ,रस्सी पर एक पहिये वाली साइकिलों पर लड़कियों की सवारी आदि मनमोहक नृत्यों के बारे में वे कतई न सोच सके । सबके मन में उस शेर का चित्र था  ,जिसने पिंजरे से बाहर लाया जाते ही गुर्राना शुरू कर दिया था ।हंटर लिए सामने खड़े आदमी की परवाह वह कतई नहीं कर रहा था । उल्टे हंटर वाला खुद काँप रहा था ।

दोबारा जब शेर ने पिंजरे  में जाने से इंकार कर दिया ,तब उसको पिंजरे  में डालने के लिए सर्कस की पूरी टुकड़ी को आपातकाल की घंटी से इकट्ठा करना पड़ा था ।
एक पल के लिए बंधक मजदूरों को लगा कि गुर्राने वाला शेर वे स्वयं हैं और सामने हंटर लिए वहाँ ठाकुर गुरूदयाल खड़ा है । पिंजरे में हो या बाहर ,गुलामी आखिर गुलामी होती है । वे आत्मालोचन करते हुये सोचने लगे कि जानवर अकेला है । उसमें सोचने की शक्ति नहीं है । अपनी ताकत का अंदाजा भी उसे नहीं है । फिर भी ,गुलामी से कितनी नफरत करता है । आजादी को कितना चाहता है । और हम !एकाएक वे आत्मग्लानि से भर उठे ।

न जाने क्यों ,मुखिया को उनकी यह चुप्पी कुछ खतरनाक लगी । उद्वेग पूर्वक उसने पूछा –क्यों ?तुम लोग चुप क्यों हो ?
-तब अचानक सबके सब बोल उठे –मुखिया जी ,हमें यह  सर्कस फिर से देखना है ,आज ही !
हंटर वाले पर गुर्राने वाले बब्बर शेर की कल्पना तब तक उन लोगों के मन में घर कर गई थी। 


|3|कुत्ता

हमेशा की तरह अत्यधिक मदिरापान की खुमारी से सोकर उठे पिता ने पुत्री से कहा-- –
-अरी  ओ !पेट जल रहा है ,दो एक रुपए तो  निकाल ,जरा चाय –पानी हो जाय ।
-एक बेनाम लेकिन गहरी ईर्ष्या से पुत्री ने कहा –
-मेरे पास कहाँ है रुपया ---–कल मुझे कुछ दिया था क्या ?
पिता को गुस्सा आया । वह ज़ोर –ज़ोर से चिल्लाया :
-तेरे पास रुपया नहीं है ! तो फिर रात भर कुत्ता क्यों भौंका ?


* * *