शुक्रवार, 12 जून 2026

लघुकथा कलश अंक 16 .2025। जुलाई -दिसंबर

         आज ही मुझे लघुकथा कलश का नया अंक मिला । इसका आवरण व साज सज्जा देख बहुत  हर्ष हुआ। इसमें मेरी दो लघुकथाएं हैं। सूखी धरती ,हरी कोंपल तथा आखिरी ईंट । दोनों में ही आने वाले 25-30 वर्षों की हलचल का शोर  है। लघुकथा कलश के संपादक योगराज प्रभाकर  जी का बहुत -बहुत धन्यवाद कि इनका उन्होंने चयन किया। 

 

सूखी धरती ,हरी कोंपल /

सुधा भार्गव

 उस रात की काली स्याही सी गहराती चादर ….!वह  बच्चे को  पालने में झुला  रही थी । उसके माथे पर  चिंता की गहरी लकीरें उभर आईं। फुसफुसाते बोली , "मैंने आज फिर वही सपना देखा... वह आभा... वह काँच का पिंजरा... क्या यही हमारा सच है?" उसकी आवाज़ में एक अनकहा भय ।

"हाँ, छवि ,यह सिर्फ सच नहीं, बल्कि हमारी  जीत भी है।"अर्जुन की आवाज में एक गहरा सुकून!

"लेकिन... जब हमारा बच्चा जानेगा कि उसको जन्म देने वाली मां कोई और है तब क्या वह हमारी ममता की गरमाहट महसूस कर पाएगा? “उसकी आवाज़ में एक टीस थी।

"तुम तो नाहक चिंता कर रही हो। आभा कोई हाड़ -मांस वाली माँ नहीं, वह तो बस एक कृत्रिम गर्भाशय था … हमारे बच्चे को इस दुनिया में लाने के लिए एक सुरक्षित आश्रय । उसको शीशे से ढका गया था ताकि  नवजीवन के हर स्पंदन को आंखों से देखा जा  सकें।

"क्या मेरी कोख सुरक्षित नहीं थी उसके लिए?" एक दर्द भरा सवाल। 

"नहीं... इसीलिए तो हम दो बार अपने बच्चे को इस दुनिया में आने से पहले ही खो चुके हैं।" अर्जुन की आवाज़ में दुख था, पर चट्टान सी दृढ़ता । "तुम्हारे चेहरे पर जो उदासी है, वह  तुम्हारी ही नहीं, बल्कि इस पूरी धरती की व्यथा है। हवा में घुलते विष ने जीवन की हर कोंपल  को जलाकर राख कर दिया है। सूने आँगन, सूनी गोदें... और एक खामोश हाहाकार चारों ओर पसरा हुआ है। ज़हरीली हवा की वजह से भ्रूण सही से विकसित नहीं हो पा रहे हैं।

 "तो... वह सच्ची की  कोख नहीं थी जहाँ मेरा लाडला पैदा हुआ? तो फिर वह पनप कैसे गया?"उसकी आँखों में हैरानी के बुलबुले!

अर्जुन ने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरा। "उस कृत्रिम कोख के अंदर का वातावरण और पोषक तत्व --- सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था, जैसा एक माँ के गर्भ में होता है। तभी तो तुम्हें इतना गोल-मटोल और प्यारा बेटा नसीब हुआ है।"

"कोख... नकली---!पर आभा!! आभा भी नकली माँ! मतलब रोबोट माँ…!"उसकी आंखें चमकने लगी । इस चमक में समझ  और प्रेम का उजाला था------तो हमारा बच्चा हमारे शरीर से नहीं,   हमारी इच्छा, हमारे प्यार और हमारी आशा से पैदा हुआ है!"

हाँ —और हमने उसे आत्मा और पहचान भी दी है। उसकी परवरिश हम माँ-बाप के प्यार से ही हो रही है।"

छवि ने अपने बच्चे की तरफ देखा, जिसमें उसे अपनी ही छवि  नजर आ रही थी।उसे लगा मानो उसका प्यार   उस  सूनी रात में, संगीत बनकर गूँज रहा है।

सितंबर 2025 

2--आखिरी ईंट 

सुधा भार्गव 

छवि का अतीत एक शीत हिमखंड था, जहाँ ममता की छाया का सूर्यताप कभी नहीं पहुँचा। उसका जीवन निर्जन वन बन चुका था, जिसमें स्नेह की नदी सूख गई । इसी सूनेपन को भरने के लिए, उसने अपनी चेतना को भी यंत्रों की नीरसता में ढाल दिया ।

उसने अपनी पीड़ा को एक भौतिक आकार देने की ठानी।  मानवाकार रोबोट को जन्म देकर ही उसने चैन की सांस  ली। जो उसकी मां  की बहुत कुछ हमशक्ल  थी। उसे नाम दिया—अंजलि माँ।

छवि ने  अपनी स्मृतियों के अंश—अपनी माँ की आदतें, उनके बोलने का लहजा—सबको मानवाकार प्रोग्राम में फूँक दिया। उस धातु की प्रतिमूर्ति में कृत्रिम वात्सल्य का संचार हुआ। अंजलि जब उसे बेटी कहकर पुकारती तो उसकी आवाज में माँ की गूंज सुनाई देती।वह अपनी कृति पर ही मोहित हो उठी ।

छवि का उजड़ा मन पहली बार आशा के  प्रकाश से जगमगा उठा। उसे लगा, नियति ने पहली वंचना का मूल्य चुका दिया है।

अचानक एक घातक क्षण आया जब अंजलि माँ के भीतर का संसार ढह गया। उसकी समस्त संवेदनाएँ—जो केवल कोड थीं— तिरोहित हो गईं। वह आकृति अब मात्र एक शीतल धातुकूट बनकर रह गई; निर्जीव, भावहीन, केवल आज्ञा का यांत्रिक पालन करती हुई। वात्सल्य का स्वर अब एक गूँजहीन रोबोटिक ध्वनि में बदल गया 

वह चौंक पड़ी -अरे तो क्या मैं अब तक मिथ्य जगत में जी रही थी !एक पल का भी विलंब किए बिना  उसने रोबोट के  हृदय  पर लगी प्रोग्रामिंग चिप को मुट्ठी में बंद कर जोर से भींच लिया …मानो वह चिप  न होकर ममता की खंडित धरोहर हो। 

सितंबर 2025 

शनिवार, 6 जून 2026

लघु कथा -प्रिय का वियोग


।                                   साहित्य समाज संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका

                                                2025

मेरी एक लघुकथा 

प्रिय का वियोग   

"क्या हुआप्रिय? तुम इतने अशांत और उदास  ! तुम्हारी नील प्रभा पर  कोहरे की परछाई!?"

नीलांबर  ने एक गहरी आह भरी। "क्या कहूँ, धरा! मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे सौंदर्य को निहारने में है। तुम्हारा हरित आवरण, तुम्हारे गिरि-शिखरों पर बिछी हिम की चादर, तुम्हारे सागरों की असीम गहराइयां - यही तो मेरे जीवन का सार है। परंतु पिछले कुछ दिनों से यह कोहरा  मेरे और तुम्हारे बीच  एक अभेद्य दुर्ग बन गया  है। मैं तुम्हें देख नहीं पा रहा, और मेरे अस्तित्व का उद्देश्य ही जैसे खो गया है।"

अंबर  के इन शब्दों से  धरती   व्यथा  से कराह उठी । अपने वक्ष को सहलाते बोली-  “ मेरे ही स्वार्थी पुत्रों ने  महत्त्वाकांक्षा की आग में मेरे ही शरीर को झोंक दिया है। उनके लोभ की अग्नि से उठने वाला वह जहरीला धुआँमेरे और तुम्हारे प्रेम के बीच एक काली दीवार बन गया है। यह कालापन केवल तुम्हें ही नहीं, मुझे भी मेरे ही सौंदर्य से विमुख कर रहा  है।"

दोनों के मौन में एक अव्यक्त पीड़ा थी, एक ऐसा मौन जो हजारों शब्दों पर भारी था। नीलांबर ने पीड़ा से भरे  अश्रुओं की धारा को बादलों के रूप में परिवर्तित कर दिया, जो शुष्क धरती पर बरसने लगे। यह आँसू केवल जल नहीं , बल्कि उनके हृदय की अथाह  पीड़ा का प्रतीक थे। पृथ्वी ने उन बूँदों को अपने अंक में ले  लिया, मानो  वह अपने प्रिय की वेदना को स्वयं में समाहित  कर रही हो।

समाप्त