वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

काली माटी लघुकथा संकलन


 काली माटी पर चर्चा 
तथा
उससे  उद्घृत कुछ लघुकथाएं




काली माटी में मालवा -अंचल के कुल 57 कथाकारों की करीब 140 से ऊपर रचनाएँ संकलित हैं जिनमें उनकी विशिष्ट आभा परिलक्षित होती है । ये भाषा -शैली ,कथा -कथोकथन की दृष्टि से भी मँजी हुई हैं ।

इसके संपादक हैं -सुरेश शर्मा
संपर्क -दूरभाष 0731-2553260/ 09926080810
 इसके प्रकाशन में वरिष्ठ कथाकार ,आलोचक श्री बलराम अग्रवाल का विशेष सहयोग रहा ।

प्रकाशक
मनु प्रकाशन
1/6678,गली नम्बर 3
पूर्वी रोहतास नगर
शाहदरा ,दिल्ली -110032
मूल्य-150.00 रुपए

काली माटी में पनपी तीन लघुकथाएं पढ़िये ------

1 --बनैले सुअर / विक्रम सोनी

दिशा -मैदान से फारिग होकर पंडित रामदयाल मिश्र और रघुनाथ चौबे लौट रहे थे कि  रास्ते में पोस्टमैन चिट्ठी पकड़ाकर चला गया । हाथ में पत्र लिए दोनों एक -दूसरे का मुंह ताकने लगे । चौबे बोले -पंडित जी ,चलो ,चुल्लू भर पानी में डूब मरें । अरे हम कहलाते पंडित हैं ,मगर कागज का चेहरा तक नहीं बांच सकते हैं । धिक्कार है हमारी पंडिताई पर ।

-पता नहीं बेटे की चिट्ठी है ,बहू की है ,समधी  की है या किसी रिश्तेदार की । पोस्ट मैन  भी सुसरा कार्ड पकड़ाकर सट्ट से भाग गया । अब किससे पढ़वायें !
 रामदयाल पर घड़ों पानी पड़  चुका था ।
तभी शहर की तरफ से बिसुआ चमार का बेटा झोला टाँगे आते देखा । पंडित रामदयाल ने उसे करीब बुलाकर कहा -बेटा ,तू शहर में पढता है न ?ले कार्ड तो बांच दे ।

बिसुआ के बेटे ने पत्र पढ़कर हाल सुना दिया । पंडित रामदयाल खुशी से उछल पड़े । उनकी बहू को बेटा हुआ है । कल वह गाँव आ रही है । अब उनके घर पर भी एक पढ़ता बेटा होगा । उनका सीना गज भर का हो गया । पत्र लौटाकर बिसुआ चमार का बेटा अभी बीस कदम ही आगे बढ़ा होगा कि  चौबे अपना लोटा हथेली पर ठोंकते हुए बोले -पंडितजी  ,धिक्कार है हमारी कौम पर । अरे पंडित जाति  की चिट्ठी चमार पढ़े ?इसकी इतनी हिम्मत ----?
और दोनों ने बिसुआ के बेटे को लोटों से ही  मार -मारकर वहीं ख़त्म कर दिया ।

2 --तिरस्कार बनाम स्वीकार / मीरा जैन

अधेड़ दम्पति सांध्य भ्रमण के लिये पैदल निकले । कुछ दूरी तय करने के पश्चात टू व्हीलर चलाती हुई एक आधुनिक कट मार उनके करीब से गुजर गई । उसकी इस हरकत से खफा कुछ उखड़ा  मिजाज लिए पति ने पत्नी से कहा --
आजकल की लड़कियां ,लड़कियां तो बची ही नहीं ,आचरण से पूरी की पूरी आदमी हो गई हैं ,न इनमें मर्यादा ,सहनशीलता ,न बोलने का ढंग ,न पहनने का तरीका ,न सामंजस्य की आदत ,गुस्सा तो नाक पर ही बैठा रहता है --पूरी तरह वाहियात हो गई हैं ।
पति के विचारों को सुन हरदम शांत रहने वाली पत्नी ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ यूँ व्यक्त की --
-चलिए देर से ही सही ,आखिरकार आपको आदमी की परिभाषा तो समझ में आई ,आपने कबूल तो किया आदमी कैसा होता है ।

3 --महामानव /डॉ तेजपाल सोढ़ी

वे चार संभ्रान्त धनी व्यक्ति कार में एक घायल लावारिस व्यक्ति को गाँव के छोटे से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लाये । घायल को चिकित्सक के सुपुर्द करते  हुए बोले-
-सड़क पर पड़ा  था । शायद कोई ट्रक वाला  टक्कर मार गया । हम उधर से गुजर रहे थे ,मानवता के नाते ले आये ।
चिकित्सक ने घायल की जांच की ,तो पाया वह बेहोश था । सर पर गहरी चोट लगी थी । चिकित्सक ने   उन संभ्रान्त मानवों से कहा -
इसे तत्काल शहर के लिए बड़े अस्पताल में भेजना पड़ेगा ,यहाँ पर्याप्त साधन नहीं हैं । एम्बुलेंस का शुल्क तो मैं माफ कर दूंगा ,किन्तु  एम्बुलेंस के डीजल के लिए  डेढ़ सौ रूपये चाहिए । पचास रूपये मैं दे रहा हूँ ,शेष  सौ रुपयों की सहायता आप कर दें ।

पैसों की बात सुनकर वे चारों धीरे-धीरे खिसकने लगे। भीड़ में एक महिला यह दृश्य देख रही थी ।,वह तत्काल चिकित्सक के समक्ष  आई और सौ रुपए का नोट निकालकर बोली -
-डॉ साहब ,इसे तत्काल बड़े अस्पताल ,इंदौर भेज दें ,बेचारा बच जाएगा ।
डॉक्टर  ने जैसे ही महिला को देखा ,तो पहचान गया और आश्चर्य से बोला --
-अरे तुम !तुम सौ रुपए दे रही हो ,तुम्हें तो मैं पिछले चार दिनों से तुम्हारे दमा के लिए बाजार से दवा लाने के लिए कह रहा था ,तुम रोज मना कर देतीं कि डाक्टर साहब पैसे नहीं हैं । शायद तुम झूठ बोल रही थीं ।

-नहीं डाक्टर साहब !मैं झूठ नहीं बोल रही थी ,कल मेरा भाई देवास से आया था ,वही इलाज के लिए ये सौ रुपए दे गया था ,किन्तु अभी ये पैसे इस लावारिस का जीवन बचा सकते हैं । मैं  दो -चार दिन बाद दवा खरीद लूँगी । कहकर उस महिला ने सौ रुपए का नोट चिकित्सक के हाथ पर रख दिया ।
चिकित्सक ने हिकारत से उन जाते हुये मानवों को देखा और फिर श्रद्धा से हाथ जोड़कर उस महमानव का अभिवादन किया ।

समाप्त





मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

संग्रह चर्चा-- लघुकथाएं जीवन मूल्यों की


  


 इस संग्रह का प्रथम संस्करण फरवरी 2013 में प्रकाशित हुआ है ।
सम्पादन सुकेश साहनी रामेश्वर काम्बोजहिमांशु ने किया है ।
प्रकाशक –हिन्दी साहित्य निकेतन
16साहित्य विहार
बिजनौर (उ प्र )246701
मूल्य-पचास रुपए मात्र 


यह निर्विवाद सत्य है कि  मनुष्य अपने में खोता जा रहा है और  स्वयंकेन्द्रित होने के कारण मानव मूल्य कगार पर खड़े सिसक रहे हैं । नैतिकता विहीन भटकन को  राह पर लाने के लिए इस संग्रह की लघुकथाएं उपयोगी ही नहीं अपितु बेहतर व स्वस्थ  समाज के सृजन की पृष्ठ भूमि तैयार करती हैं ।  इस पुस्तक में पृष्ठ 4-अपनी बात में ठीक ही कहा गया है –ये लघु कथाएँ सामाजिक प्रदूषण में प्राण वायु का काम करेंगी ।

96 पृष्ठों के इस संग्रह में अनेक धुरंधर लघुकथाकारों की रचनाएं हैं जो सूक्ष्म होते हुये भी अपनी  सूक्षमता के कणों से संवेदना  जगाकर हृदय को बेचैन  कर देती हैं ।

कथा संग्रह से चुनी तीन लघुकथाएं पढ़िये । 

1--पहुँचा हुआ फकीर /भूपिंदर सिंह

एक कमरा कह लो ,या छोटा घर ।
वहीं सास ससुर ,वहीं पर बड़ी नन्द ,वहाँ ही छोटा देवर और एक तरफ पति –पत्नी की दो चारपाइयाँ ।
बहू को दौरा पड़ने लगा । पलों में ही हाथ –पैर ढीले हो जाते । हाथों की उंगलियां मुड़ जातीं । ओठों का रंग नीला पड़ जाता । हकीमों की जड़ी –बूटियाँ देखीं ,डाक्टरों के टीके भी कराये ,पर फायदा कुछ न हुआ ।
किसी ने एक फकीर के बारे में बताया । सात मील पर उसका डेरा था । पति ने उसे साइकिल पर बैठाया और चल दिया । रास्ते में एक बगीचा आया । हैंडल चुभने का बहाना लगाकर पत्नी उतर गई । दोनों बैठ गये , जी भरकर बातें  कीं । फिर उनकी आत्माएं एक हो गईं । दोनों को रोकने –टोकने वाला कोई न था ,जो मन में आया किया ।
-आज की यात्रा से फूल सा हल्का महसूस कर रही हूँ ,बाबा जी ,जैसे कि कोई रोग ही न हो । डेरे पर पहुँचकर उसने कहा ।
-तो हर बुधवार ,बीस चौकियाँ भरो बेटी । दावा –दारू की जरूरत नहीं । महाराज भली करेंगे ।

2--जेबकतरा /ज्ञान प्रकाश विवेक

बस से उतरकर जेब में हाथ डाला । मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी । जेब में था भी क्या ?कुल नौ रुपए और एक खत ,जो मैंने अपनी माँ को लिखा था कि मेरी नौकरी छूट गई है । अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा । तीन दिनों में वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था ।,पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था ।

नौ रुपए जा चुके थे । यूं नौ रुपये कोई बड़ी बात नहीं थी ,लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो । उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते । 
कूछ दिन गुजरे ,माँ का खत मिला ,पढ़ने से पूर्व मैं  सहम गया ,जरूर पैसे भेजने का लिखा होगा ,लेकिन खत पढ़कर मैं हैरान रह गया । माँ ने  लिखा था ,बेटा ,तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है । तू कितना अच्छा है रे !पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता ।

मैं इसी उधेड्बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा ?
कुछ देर बाद एक और पत्र मिला । चंद लाइनें थीं ,आड़ी –तिरछी । बड़ी मुश्किल से पत्र पढ़ पाया । लिखा था ,भाई नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर ,मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है । फिकर न करना । माँ तो सबकी एक –जैसी होती है न !वह क्यों भूखी रहे ?तुम्हारा जेबकतरा ।

3--रिश्ते का नामकरण/दलीपसिंह वासन 

उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है । रात को स्टेशन पर ही रहेगी । प्रात;वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी । मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था ।पहले घट चुकी एक –दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी ।

-आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है । आप मेरे साथ चलें ,मैं किसी के घर में आपके ठहर  ने का प्रबंध कर देता हूँ ।जब हम गाँव से गुजर रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया –मैं इस  चौबारे में रहता हूँ ।
-अटैची जमीन पर रख वह बोली –थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं । मैं हाथ –मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी ।

बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों  कमरे में आ गए ।
-आपके साथ और कौन रहता है ?
-मैं अकेला ही रहता हूँ ।
-बिस्तर तो दो लगे हुये हैं ।
-कभी –कभी मेरी  माँ आ जाती हैं ।
गुसलखाने में जाकर उसने मुंह –हाथ धोये । वस्त्र बदले । इस दौरान मैं दो कप चाय बना लाया । 
-आपने रसोई भी रखी हुई है ।
-यहाँ कौन सा होटल है !
-फिर तो खाना भी यहीं खाऊँगी ।
बातों –बातों में रात बहुत गुजर गई थी और वह माँ वाले बिस्तर पर  लेट भी गई थी ।

मैं सोने का बहुत प्रयास कर रहा था ,लेकिन नींद नहीं आ रही थी । मैं कई बार उठकर उसकी चारपाई तक गया था । उस पर हैरान था । मुझ में मर्द जाग रहा था ,परंतु उसमें बसी औरत गहरी नींद सोई थी ।
मैं सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर जाकर टहलने लग गया । कुछ देर बाद वह भी छत पर आ गई और चुपचाप टहलने लगी ।
-जाओ सो जाओ ,सुबह आपने ड्यूटी  पर हाजिरी देनी  है । मैंने कहा ।
-आप सोये नहीं ?
-मैं  बहुत देर तक सोया रहा हूँ ।
-झूठ ।
वह बिलकुल मेरे सामने आ खड़ी हुई ,’अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपको उनींदे नहीं रहना था । 
-नहीं –नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं । और मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया
समाप्त 

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

सृजयमान ( सृजनात्मक साहित्य वार्षिकी पत्रिका २०१२ लुधियाना ) में प्रकाशित

मेरी दो लघुकथाएं

1--बंद ताले /सुधा भार्गव 


छोटे भाई की शादी थी । दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड ,हाथ पैर ठिठुरे जाते थे पर बराती बनने की उमंग में करीब १२० बराती लड़कीवालों के दरवाजे पर एक दिन पहले ही जा पहुंचे । 

पिताजी सुबह की गुनगुनी धूप का आनंद लेने के लिए  जनमासे में  चहल कदमी करने लगे । कुछ दूरी पर उन्होंने देखा ५ --६ युवकों की एक टोली बड़े जोश में बातें कर रही है । 
-क्या बात है,तुम लोग नहाये नहीं !। पिताजी ने पूछा
-
कैसे नहायें अंकल ,बाथरूम में बाल्टी ही नहीं हैं ।
-
अभी बाल्टियाँ मंगवाए देता हूं और क्या चाहिए वह भी देख लो ।
-
मेरे बाथरूम में तौलिया भी नहीं है दूसरा युवक बोला ।
-
ठीक है चुटकी बजाते ही सब हाजिर हो जायेगा । 

पिताजी तो चले गये पर लड़कों का लाउडस्पीकर चालू था ।
-
जब इंतजाम नहीं कर सकते तो ये लड़कीवाले बारातियों को बुला  क्यों लेते  हैं ।
-
अरे दोस्त लगता है  ये सस्ते में टालने वाले हैं । हम ऐसे सस्ते में टलने वाले नहीं ।
उनकी बातें विराम पर आना ही नहीं चाहती थीं लेकिन सामने से एक सेवक को  बाल्टियों और तौलियों से लदा -फदा देख उनके मध्य मौन पसर गया -
                                                                           
एक बुजुर्ग महाशय को जब यह पता चला कि बारातियों की  मांगे खुद पिताजी पूरा कर रहे हैं तो उनसे यह भलमानसता  सही न गई ।
बोले- --त्रिवेदीजी  लड़के के पिता होकर समधी  के सामने इतना  झुकना ठीक नहीं । आखिर हम सब हैं तो बराती बराती तो बराती ही होते हैं ।

-लड़के -लडकी का रिश्ता हो जाने के बाद दो परिवार एक हो जाते हैं।  मेरी तो यही कोशिश रहेगी कि दोनों 
के सुख -दुःख ,मान -अपमान  की कड़ियाँ इस  प्रकार बिंधी रहें कि भोगे एक तो अनुभूति हो दूसरे को।  पिताजी  शांत स्वर में बोले । 
सुनने वालों के दिमाग के ताले खुल चुके थे ।
 


2---तुम महान थे /सुधा भार्गव 





अनाथालय के अध्यक्ष महोदय ने भाषण दिया --
-पछले वर्ष 50 अनाथ बच्चों को सनाथ बनाया गया  ।गोद  लेने से पहले उनके होने वाले माता -पिता  की अच्छी तरह से जाँच -पड़ताल की गई ।जब पूरी तरह तसल्ली हो गई कि असीमित प्यार लुटाते हुए वे असीम गहराई के साथ उनका भविष्य निर्माण करेंगे तभी  गोद देने की कार्यवाही पूरी हुई ।सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा ।

भाषण फिर चालू हुआ -पांच वर्ष पूर्व दिए  बच्चों के अभिभावकों को हमने इस समारोह में विशेष रूप से आमंत्रित किया है ताकि बच्चों से सम्बंधित उपलब्धियों को जान कर गर्व का अनुभव किया जा सके ।
भाषण समाप्ति के बाद एक विशिष्ट देश का नागरिक खड़ा हुआ ।
-मैं गोद लिए बच्चे  के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ ।
सब की नजरें उस पर केन्द्रित हो गईं ।
विलियम मेरा दत्तक पुत्र ---तुम महान थे |मेरा पुत्र 11वर्ष का हो गया था ।  
 उसने न जाने  कितनों का जीवन सँवार दिया ।अपनी एक जिन्दगी के बदले 10 को नई जिंदगियाँ दे गया ।लेकिन मुँह से उफ तक न की ।
सुनने वाले  सकपका  गए ।
--आप कहना क्या चाहते हैं ।अध्यक्ष के धैर्य की दीवार ढह गयी ।

विदेशी ने फिर कहना शुरू किया --पिछले माह बम विस्फोट के कारण  स्कूल बच्चों की लाशों से पट गया ।अस्पताल  बच्चों की दर्दनाक चीखों से हिल गया ।विलियम ने जीतेजी अपनी दोनों खूबसूरत आँखें और गुर्दे दूसरों के लिए दान कर दिए ।अफसोस ! उसके दिल का उपयोग न हो सका ।कमजोरी के कारण अचानक उसके ह्रदय की गति रुक गई ।लेकिन उसका बहुत बड़ा दिल था।मेरे प्यारे विलियम --तुम महान  थे । 
सुनने वाले समझ  नहीं पा रहे थे कि वे हँसें या  रोयें , दाद दें अध्यक्ष महोदय की या उस विदूषक की जो अपने को विलियम का पिता कहता था ।
* * * * *