वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

लघुकथा संग्रह चर्चा


श्री मती विद्या  भण्डारी का लघुकथा संग्रह 


मित्रवर ,पिछले महीने मैं कलकत्ते गई थी |वहाँ साहित्यिकी संस्था की ओर से आयोजित लघुकथा गोष्ठी में अनेक पुराने मित्रों के साथ -साथ पूर्व परिचित विद्या  भण्डारी से मुलाक़ात हुई |उन्होंने मुझे अपना लघुकथा संग्रह भेंट किया । नाम है --

 यथार्थ के क्षण 
यह साहित्यिकी प्रकाशन  कोलकाता की ओर से 2010 में प्रकाशित हुआ था । विद्या भण्डारी मूलत:कवयित्री हैं |उनकी कविताओं में स्त्रियोंके शोषण का  चित्रण मिलता है |उनकी लघुकथाएं भी स्त्रियों के शोषण पर ही विशेष रूप से केन्द्रित हैं । लेखिका सम्पूर्ण  नारी वर्ग की पीड़ा को इनके माध्यम से अभिव्यक्त करती प्रतीत होती है । स्त्रियों की संवेदनाओं का यह संकलन सुधि पाठकों को अवश्य प्रभावित करेगा ।

नारी की अनकही व्यथा का दर्पण है उनकी एक लघुकथा 
अचानक 
-सुनो ,मुझे छोड़कर कहीं मत जाया करो ,मैं नितांत अकेला हो जाता हूँ ।
-जब मैं नहीं रहूँगी तब --।
-इन बातों को छोड़ो ,कौन पहले जायेगा किसे पता । जब समय आएगा तब सोचेंगे । अभी तो एक दिन भी पहाड़ सा हो जाता है ।

कूछ दिन बीते ,अचानक  वे उखड़े  -उखड़े से रहने लगे । जब -तब मुझे उलाहना देते रहते ,जैसे मेरा -उनका कोई रिश्ता ही न हो । यह अचानक इन्हें क्या हों गया !
एक दिन कहने लगे -बहुत बोलती हो ,मेरी  जिंदगी से चली क्यों नहीं जाती । देखो ,रमेश की पत्नी कैसे पंखे से लटककर मर गई ।
मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं और कानों में जैसे सीसा पड़ गया हो ।
 दुविधा में जान ---
इन्हें कुछ हो तो नहीं गया ,पगलाई सी बातें कर रहे हैं ।
-ये एक साथ दो साड़ियाँ क्यों खरीद लाईं ,रुपयों की कोई कीमत नहीं है क्या ?आजकल बहुत खर्च करने लगी हो ।
मेरे दिमाग की नसें खिंचने लगीं  ,कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करूं । अचानक मौसम बदला -बदला सा क्यों है ।

 अगले दिन रुपयों की गड्डी चुपचाप बैग में डाल रहे थे ।
 -शाम को रुपए लेकर कहाँ जा रहे हो ?मैंने पूछा ।
-वे उछल पड़े --हाँ ,कहीं भी ले जाऊं ,किसी को भी दूँ ,तुम्हें मतलब !
-कोई मिल गई है क्या ?
-हाँ ,मिल गई है और वह तुमसे बहुत अच्छी है ।
मेरे पाँवों तले जमीन खिसक गई । मैं काँपने लगी --ये तो किसी स्त्री की तरफ झाँकते भी नहीं थे ,कितनी आश्वस्त थी मैं । क्या मैं झूठा विश्वास पाले जा रही थी ?  -यह कैसी अनहोनी--बुढ़ापे मेँ दूसरी औरत !
* *

इस पुस्तक का मूल्य केवल 100रुपए है ।जिसे मंगाने की लिए पहले संपर्क करें तब राशि भेजें ।
श्री मती  विद्या भण्डारी
162/A/40 लेक गार्डन्स
कोलकाता 700045
मोबाइल -9674577037






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3 टिप्‍पणियां:

  1. श्रीमती विद्या भण्डारी जी को लघुकथा संग्रह 'यथार्थ के क्षण' के प्रकाशन पर बधाई। आपका आभार कि आपने इस संग्रह से परिचित कराया। उन्हें दो-चार ऐसी जगह इस संग्रह को भेजने की सलाह दीजिए जहाँ इसकी समीक्षा प्रकाशित हो सके।

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  2. बधाई संग्रह से परिचित कराने के लिए। पर प्रस्‍तुत उदाहरण न तो लघुकथा लगता है, और न ही कुछ कहता है। ताजुब्‍ब तो यह भी है कि बलराम जी भी बिना कुछ कहे निकल गए। हालांकि उनकी टिप्‍पणी में इस बात की ओर इशारा है कि इसकी समीक्षा की जरूरत है।

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