दीपावली का पुनीत पर्व
अति शुभ हो I

मित्रवर
दीप से दीप जलें ,सबके मंगल कलश भरें
पुन : गूँज ---
कविता ----
दीप से अगणित दीप जलें----
हिरदय का अँधियारा मिट जाय
साँस -साँस के पोरों में
चंदन सा सौरभ घुल जाए !
द्वार -द्वार पर कलियाँ विहँसें
बंदन बारों में गूंजें मंगल गीत
सारे गलियारों का एकाकीपन
मुस्कानों से भर -भर जाए !
माटी के एक मौन दीये ने
उल्लास उमंग को जन्म दिया
थके पाँव थिरक उठे
अधरों से आशा फूटी जाए !
बोयें अब बीज नहीं कड़वे
नहीं बसायें जाती -भेद का गाँव
विहगों सी चहक उठें वादियाँ
स्नेह का रिश्ता बनता जाए !
क्वार चांदनी सी चमके दीवाली
विजय -ध्वनी से खनक उठें प्राण
निर्माण की देहली पर पाँव जमाये
उपलब्धि की आशा जुड़ती जाए !



सुधा जी..बहुत सुन्दर भाव बोये है...दीपों के इस पावन पर्व पर आपको भी हार्दिक शुभकामनायें।..
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुधा दीदी आपकी कविता अच्छी लगी । आपको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंदीपावली की शुभकामनाएँ
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर रचना ..
प्रत्युत्तर देंहटाएं.. आपको दीपपर्व की असीम शुभकामनाएं !!
"माटी के एक मौन दिये ने
प्रत्युत्तर देंहटाएंउल्लास उमंग को जन्म दिया
थके पांव थिरक उठे
अधरों से आशा फूटी जाय"
बहुत ही भावपूर्ण रचना……
माटी का वह मौन दिया है……हम पुतले गतिशील हैं माटी के………"माटी के मोल" बोल भाव न गिरायें माटी के…।
दीपोत्सव के चौथे दिन "अन्न-कूट गोवर्धन पूजा" की बहुत बहुत बधाई।