संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोडती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है .। उसकी यह झंकार कभी कविता में ढल जाती है तो कभी लघुकथा का रूप ले लेती है और मैं कुछ पलों को उसमें खो जाती हूँ । चंचल -व्यथित के लिए क्या यह काफी नहीं!

रविवार, 25 अप्रैल 2010

किशोर- डायरी ,पन्ना -1



किशो
कोना














किशोरावस्था

किशोरावस्था शैशवावस्था से युवावस्था तक पहुँचने के बीच की कड़ी है Iकिशोर एवं किशोरियाँ अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश इसी अवस्था से शुरू करते हैं I उनमें शारीरिक- मानसिक परिवर्तन परिलक्षित होने लगते है I उलझन में फंसे ,दुविधा में पड़े किशोर अपने माँ -बाप से सहयोग ,मार्गदर्शन प्यार चाहते हैं I


हरदिन किशोर का संसार बड़ा होता है I माँ -बाप की गोदी छोड़कर मित्रों के साथ कल्पना के पंखों पर सवा हो घंटों निकाल देता है Iनित्य नई वस्तुओं को देखकर जिज्ञासा से भर उठता है I वह चाहता है - बड़ों से उसको हर प्रश्न का उत्तर मिले क्योंकि वह उन्हें अपने से ज्यादा अनुभवी समझता है और ठीक भी है उनका संसार विस्तृत होता है I

भावनाओं के ज्वार को संभालता हुआ उसमें कुछ कर गुजरने का जोश होता है ,सबको चकित करने का अरमान मचलता है और असीम ऊर्जा से भर जाता है I कभी -कभी किशोर गलत कदम उठा लेता है और अभिभावकों का कोपभाजन बनता है I इस समय उनका उत्तर दायित्व है कि किशोरों की उसी प्रकार देखभाल करें जैसे एक माली अपने पौधों की करता है I लेकिन ज्यादा रोकटोक से उनमें विद्रोह की भावना पनपने लगती है और विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है I उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का मौका भी देना चाहिए ताकि वे उनसे कुछ सीखें ,उनमें आत्मविश्वास पैदा हो I

बच्चे की कल्पना मासूमियत से भरी पवित्र होती है ,युवक की कल्पना स्वस्थ हो सकती है लेकिन बच्चे से युवक बनने की सीढ़ियाँ एक किशोर लांघता है I यदि उसके जोश ,उत्साह ,और ऊर्जा को एक सृजन संसार प्रदान कर दिया जाये तो वह एक विशिष्ठ व्यक्तित्व का मालिक होगा I व्यक्तित्व का निर्माण किशोरावस्था से पहले नहीं होता बल्कि बाद में होता है I

आज के सुशिक्षित माँ -बाप अपने बच्चों से उम्मीदें तो बहुत रखते हैं पर उम्मीदों का चिराग जलने से पहले पर्याप्त मात्रा में तेल भरे दीपक की बाती को प्रज्ज्वलित करके रखना होता है तभी तो प्रकाश होगा I उसके संसर्ग में जो आएगा वह स्वयमेव प्रकाशमान हो जायेगा I

दुर्भाग्य वश भौतिकवाद के अनुयायी माता -पिता को जीवन की भागदौड़ में इतना समय कहाँ कि वे धैर्य से किशोर की जिज्ञासा को शांत कर सकें ,उसके सिर पर स्नेह की चादर तान सकें ,अपने अहं को एक र्किनारे कर उसके ह्रदय की कोमल तरंगों की आहट पा सकें I

थके -हारे झुंझलाए से अपने व्यंग बाणों और थप्पड़ों से सदैव उसे झुका देखना चाहते हैं I उनकी तानाशाह सी आँखें कहती हैं --खबरदार जो सिर उठाया ,कुचल दिये जाओगे I उपेक्षा ,अपमान ,और ह्रदय हीनता का सामना करते -करते किशोर अवसाद में डूबा जीवन से निराश हो उठता है I

जब तक घरवाले समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और सुनने में आता है --उसके लड़के ने आत्महत्या कर ली है ---बी .ए .के छात्र ने छत से ----छलांग लगा दी ---- I मुश्किल से छोरा चौदह बरस का रहा होगा ---घर से ही भाग गया --Iगजब हो गया !आजकल बच्चों से कछु कहने का धरम नहीं--I

कुछ मित्रों के अनुरोध पर किशोर की डायरी के कुछ पन्ने ब्लाग पर प्रस्तुत कर रही हूं जो 'स्पंदन ' पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं I चाहती हूं ज्यादा से ज्यादा मित्रवर इसे पढ़ें ,किशोरों को समझें और उन
के व्यक्तित्व के विकास का मार्ग प्रशस्त करें I


||किशोर डायरी ||









पन्ना
(१)



माँ आप सुबह सात बजे ही अपने आफिस के लिए घर से निकल पड़ती हो I केवल चाय पी पाती हो I वापस होते समय बहुत थकी होती हो I मुझे आप पर बहुत तरस आता है I जी चाहता है भाग - भाग कर आपके काम करूं i लेकिन कर नहीं पाता Iकरूं कैसे ? जानता ही नहीं उन्हें करना I

कल मेरा गृह कार्य करते समय बहुत झुंझला रही थीं I आज मैंने सोचा--आपके आने से पहले सुलेख तो लिख ही सकता हूं I बहुत ध्यान से धीरे-धीरे लिखा I घर में आपके घुसते ही मैं इतराते बोला --मैंने अपना गृह कार्य ख़त्म कर लिया ----देखो माँ -----I
-क्या माँ --माँ की रट लगा रखी है एक मिनट तो साँस लेने दे I गुलाब सा खिला मेरा चेहरा मुरझा गया I मैं गुमसुम बैठ गया ----शायद मनाने आओ --नहीं आईं ----!

चाय पीने के बाद सो गईं आप Iशाम को उठीं I उस समय मैं बाहर खेलने जा रहा था I आपने मुझे रोक लिया I
-कहाँ चले नबाब !,लाओ जरा देखूँ --क्या किया है ?
सुलेख पर नजर पड़ते ही तमतमा उठीं ---'अरे !यह क्या !ज्यादातर शब्द लाइन से बाहर निकले हैं I कोई अक्षर छोटा है कोई बड़ा I कितनी बार कहा है ठीक से लिखाकर पर नहीं ------ना सुनने की तो कसम खा रखी है 'I

मुझे काटकर आप चली गईं I मेरी सारी खुशियाँ भी अपने साथ ले गईं I

माँ ------ - - -
आप दुनिया में पहले आईं ,मैं बाद में आया I आपके हाथ बड़े -बड़े हैं मेरे छोटे -छोटे हैं I आपको लिखने का जो अनुभव है वह मुझे नहीं-- I अगर मेरे अक्षरों की बनावट ख़राब है तो क्यों आशा करती हो -मैं आपकी तरह मोती से अक्षर बनाऊँ I मुझे कुछ समय दो और अभ्यास करने दो I


(चित्र-गूगल से साभार )
* * * * * * * * * * * *

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

लघुकथा -महाभारत

लघुकथा
















महाभारत
/
सुधा भार्गव


-जल्दी नहा ----देर हो रही है ---I
-अरे मेरा तौलिया कहाँ है ?
-ले तौलिया ,मगर जल्दी छोड़ बाथरूम I
-चुटकी !----ये तौलिया बांधे कहाँ चली - - - - !पापा बोले I
-बालकनी में - - - - मेरी चप्पल नहीं मिल रही I नंगे पैर नहाया नहीं जाता I
-माँ - - - - माँ मेरी ड्रेस पर तो प्रेस भी नहीं है I बड़की झल्लाई I
-अभी करती हूं - - - जल्दी दूध पीओ I
-टिफिन कहाँ है - - - - - ?
-भागो नीचे - - - बस आ गई I
-स्वटर भूल गई बच्ची !ठंडी हवा चल रही है I
अरे किसनी ,(महरी की छोटी लड़की )जल्दी दौड़ - - - -I चुटकी को स्वटर देकर आ और यह चार्ट ले जा ,उससे कहना --कपूर मैडम को दे दे I माँ का स्वर गूँजा I
टन-टन - - - कर्र- - कर्र - - - -टेलीफोन की घंटी I
किसनी के हाथ में रिसीवर ,नीचे से बोली - - -अम्मा - - - बड़की को जल्दी भेजो ,बस जाता है |

आधे घंटे की यह महाभारत सुनंदा फूफी रोज ही देखती है I एक दिन पानी सर से उतर गया तो बोली -
-कौशल बेटा ,यदि रात में ही बच्चों की ड्रेस हैंगर पर लटका दो तो सवेरे की भयानक चिल्ल -पों से बचा जा सकता है I कम से कम पाँच मिनट बचेंगे I उस समय बच्चे दूध -दवा ले पायेंगे I

-फूफी ,ये बच्चे हैं क्या !कक्षा ६-७ में पढ़ने वाले I आज आने दो ,इनको सिखाऊंगा -कपड़े कैसे रखे जाते हैं I
-बच्चे छोटे हैं I डांटने -ठोंकने से कुछ नहीं होगा I कुम्हला जरूर जायेंगे I अपने सुख -आराम के लिए बच्चों का इतनी जल्दी बचपन छीन लेना ठीक नहीं I आज से मैं इनके कपड़ों का प्रबंध करूँगी i
-आप इनकी आदत बिगाड़ देंगी I
-बच्चों को हुकुम देने ,उपदेश देने से बात नहीं बनती I कुछ दिन वे मुझे करता देखेंगे ,बाद में स्वयं वैसा ही करने लगेंगे I
-ये बच्चे कुछ नहीं सीखेंगे I
-क्यों नहीं सीखेंगे ?तुम्हें मालूम है बच्चे कैसे होते हैं ?
-कैसे होते हैं !
-नकलची बन्दर ! सैंकड़ों वर्ष पूर्व हुए महाभारत में उपद्रव करने वाले और अमन -चैन फैलाने वाले आखिर थे तो किसी के बच्चे ही I बचपन में सीखे हुए को ही उन्होंने मूर्त रूप दिया I

चित्रांकन
सुधा
* * * * * * *

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

लघुकथा /सुधा भार्गव

नकलची बन्दर
-जल्दी नहा -----देर हो रही है ---1