शनिवार, 22 मई 2010

बालकथा








अपना
हाथ जगन्नाथ
/सुधा भार्गव


-बेटा ,मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ तुम अपना कोई काम नहीं करते हो |स्कूल से आकर बैग सही जगह पर रखते हो ही अपने जूते खोलते हो | घर में नौकरानी तुम्हारी माँ की सहायता के लिए रखी गई है . कि तुम्हारे जूतों के फीते खोलने के लिए |

-नौकरानी माँ की सहायता कर सकती है ,मेरी नहीं !धीर ने बेरुखी से कहा |

-माँ की सहायता करना जरूरी है क्योंकि वे दूसरों के कामों में सुबह से शाम तक व्यस्त रहती हैं |अगर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होगा तो वे बीमार हो जायेंगी |

-हाँ , माँ की मद को एक व्यक्ति तो होना चाहिए "अधीर बुदबुदाने लगा | वह पिता की दलील से शायद संतुष्ट हो गया था |

-हमारे राष्ट्रपति डा .अब्दुल कलाम आजाद ने भी पूरे राष्ट्र को यह सन्देश दिया था -अपना काम खुद करना चाहिए |

-सचमुच पिता जी !

-हाँ ! हमारे यहाँ परंपरा चली रही थी कि राष्ट्रपति जब गाँधी नेहरू की समाधि पर जाते तो उन्हें पहले एक कुर्सी पर बैठाया जाता ,एक कर्मचारी उनके जूते खोलता | उसके बाद वे नंगे पाँव समाधि पहुँचते |
एक बार डा.कलाम राजघाट गए | एक कर्मचारी झटपट नके पास गया और उनके जूते खोलने को झुका लेकिन उन्होंने बड़ी नम्रता से उसे रोक दिया | वे खुद ही जूते खोलने लगे और नंगे पाँव जाकर बापू की समाधि के दर्शन किये |

-राष्ट्रपति का पद तो बहुत ऊँचा होता है |यदि कर्मचारी उनके सब काम करते हैं तो उससे उनकी शान ही बढ़ती है |

-यही शान तो इंसान को इंसान से अलग करती है |अलग रहकर कभी दिल नहीं जीता जा सकता |काम छोटा हो या बड़ा ,अपना काम करने में क्या शर्म ! अब तो राष्ट्रपति पवित्र स्थानों पर जाने से पहले जूते कार में ही उतार देते हैं ,फिर पैदल चलकर अन्दर जाते हैं |

-हम भी तो ऐसा करते हैं |

-तुम्हें घर में भी अपने काम अपने आप करने चाहिए | नौकरानी से सारा काम करवाना ठीक नहीं | झूठी शान में रहने वालों को अकसर अपमान सहना पड़ता हैं |

अधीर अपने पिता की बात से सहमत था | वह चुपचाप उठा और अपना बिखरा -बिखरा कमरा समेटने में लग गया | कुछ ही देर की मेहनत के बाद उसका कमरा चमक उठा |




अधीर अपने आप ही हँस पड़ा और बोल उठा -"अपना हाथ जगन्नाथ |"


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