संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोडती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है .। उसकी यह झंकार कभी कविता में ढल जाती है तो कभी लघुकथा का रूप ले लेती है और मैं कुछ पलों को उसमें खो जाती हूँ । चंचल -व्यथित के लिए क्या यह काफी नहीं!

सोमवार, 2 नवंबर 2009

कविता -तुमने कहा और मैंने अंश -६



(छह )

आज का सच


मैंने कहा था ----
मुझमें लिपायमान होना ठीक नहीं
न जाने पहले कौन चला जाए
मैं या तुम ,
तुमने मेरे तर्क का खंडन किया --
तुम जाने की बात कर रही हो
मैं जमने की सोच रहा हूँ ।

अभी तो हमारे पास
बहुत कुछ बचा है
बहुत कुछ करना है
और चढ़ानी है
सूखी कन्दरा पर
हरी -हरी बेल

शरीर पंचतत्वों से बना है
एक दिन वह
धूल में मिल जाएगा ,
समय से पहले
इतनी दूर दर्शिता क्यों !
अभी तो शरीर में देनी है
पंचतत्वों की खाद ।
* * * * *

तुमने कहा और मैंने -अंश ५














(पाँच )

त्रिकोण

तब मैंने सुना -----
तुम्हारे एक स्पर्श से
दूर हो जाता है मेरा अकेलापन
न जाने कहाँ घुल जाती है
तन की छटपटा हट
गंगा की धारा में बह जाती है
मन की कड़वाहट
शिराओं में भर जाता है
सागर का जोश
पा जाता हूँ
सांसों की सार्थकता ।

तुम कहोगी -----
मुझे तो ऐसा कुछ नहीं होता है ,
-------नहीं समझोगी !
तुम त्रिकोण में बदल चुकी हो
एक सिरे पर तुम हो
दूसरे पर मैं
और तीसरे पर है
तुम्हारी ममता ।

मैंने तो जहाँ से चलना शुरू किया
आज भी वहीं डटा हूँ
अग्नि को साक्षी मानकर
थामा था तुम्हारा हाथ
उसे लिए खड़ा हूँ

होगा ऐसा ही
लेकिन क्या करूं मैं भी ----
तुम्हारी खामोशी
काटने को दौड़ती है
तुम्हारी नकारात्मक सोच
उलझा देती है
तुम्हारी उदासी
पतझर बनाती है ।

यदि देखना चाहते हो
मुझे मजबूत
तो
खिलखिलाते रहो ,
मेरा अंतर्मन खिलखिलायेगा
आलोकित हो उठेंगी
जीवन की तिमिरतम गुफाएं ।

* * * * * * * * * * *

-तुमने कहा और मैंने-अंश 4











(चार )


केवल तुम हो

जैसी मैं पहले थी
वैसी ही अब हूँ
हाँ ,एक अन्तर अवश्य आ गया है
पहले बहुतों के बारे में सोचा करती थी
अब मेरी सोच में केवल तुम हो ।

तुम मेरे लिए
सूर्य बन गए हो
मैं इस रोशनी में
झिलमिलाना चाहती हूँ ,
तुम्हारी आभा से ही
मेरी दुनिया प्रभायुक्त है
क्या तुम भी ऐसा सोचते हो !

तब तो
हम एकाकार हो गए हैं
हमारा प्यार बढ़ता जा रहा है
प्यार तो पहले भी था
लेकिन उसे व्यक्त करने का
समय न था ।

अब समय ही समय है
क्यों न समय का फायदा उठायें ,
यदि मैं गुम हो गयी तो
तुम्हारे प्राणों में रम जाऊँगी
यदि तुम गुम हो गए तो
स्मृति की आंखों में आँखें डाले
जी लूंगी ।

***

रविवार, 1 नवंबर 2009

तुमने कहा और मैंने--अंश ३


(तीन )

ऐसे तो थे

कल कह रहे थे
--
सोना बड़ा महंगा हो रहा है
एक हार और खरीद लाओ
ठीक वैसा जैसा तुम्हें दिया था
बेहद आत्मीय पलों में ,
उन्हें खूब पहनो
जो करना है करो
मैं पैसे का क्या करूंगा
सब छोड़ कर ही जाना है ।

इस बरस गरमी में
तुम्हारे उस कमरे में
ऐ.सी.जरूर लगवाना है
जहाँ तुम घंटों पढ़ती -लिखती हो
लिखना भी बड़ा कठिन है
पहले लिखो
फिर संशोधन करो
टिकट लगा कर भेजो ।

मैं तो तुम्हारा मुंह देखती रह गयी
मेरे लेखन का इतना मान
मेरी सुविधा का इतना ध्यान
पहले तो तुम ऐसे न थे ।
जब भी जहाँ भी बैठती हूँ
अपनी कुर्सी
पास खिसका लाते हो
गहरे संतोष से भर उठते हो
जैसे अपनी आत्मा को पा लिया हो ।

* * *

कविता -तुमने कहा -- अंश -२

तुमने कहा और मैंने


( दो )

उतार
-चढ़ाव

तुममें भावनाओं का इतना ज्वार
प्यार का उतार चढ़ाव
इससे पहले मैंने कभी अनुभव नहीं किया ।
थोड़ी देर को ओझल हो जाती हूँ
आँख कोना कोना तलाशने लगती है
स्पर्श से हर पल महसूस करना चाहते हो
मैं तुम्हारी हूँ
तुम्हारे पास हूँ ।

कभी उंगलियाँ छूते हो
कभी बालों में उंगलियाँ घुमाते हो
छोटे बच्चों की तरह मेरा हाथ
अपने हाथ में लेकर बैठ जाते हो
डरते हो
साथ छूट न जाय ।

खाते -खाते दो फांकें संतरे की
मेरे मुंह में डाल देते हो
कहते हो ---
अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखतीं
सारे दिन काम करती हो
टैक्सी से जाओ ,स्कूटर से न जाओ
झटके लगेंगे ,कमर का दर्द उठेगा
फिर क्या होगा -----।

शायद सोचते हो
यदि मुझे कुछ हो गया तो
तुम्हें कौन संभालेगा
इससे पहले तो तुमने ऐसा सोचा न था ।

बड़ी स्वादिष्ट लगने लगी है तुम्हें
मेरे हाथ की सब्जी -रोटी
व्यवहार में भी सलीकापन आ गया है
अंग -अंग से फिसलती
शून्य में टिक जाती है तुम्हारी निगाह
फिर टकटकी लगाकर मुझे देखते हो
मानो छूमंतर होने वाली हूँ ।


* * *