संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोडती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है .। उसकी यह झंकार कभी कविता में ढल जाती है तो कभी लघुकथा का रूप ले लेती है और मैं कुछ पलों को उसमें खो जाती हूँ । चंचल -व्यथित के लिए क्या यह काफी नहीं!

सोमवार, 2 नवंबर 2009

कविता -तुमने कहा और मैंने अंश -६



(छह )

आज का सच


मैंने कहा था ----
मुझमें लिपायमान होना ठीक नहीं
न जाने पहले कौन चला जाए
मैं या तुम ,
तुमने मेरे तर्क का खंडन किया --
तुम जाने की बात कर रही हो
मैं जमने की सोच रहा हूँ ।

अभी तो हमारे पास
बहुत कुछ बचा है
बहुत कुछ करना है
और चढ़ानी है
सूखी कन्दरा पर
हरी -हरी बेल

शरीर पंचतत्वों से बना है
एक दिन वह
धूल में मिल जाएगा ,
समय से पहले
इतनी दूर दर्शिता क्यों !
अभी तो शरीर में देनी है
पंचतत्वों की खाद ।
* * * * *

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