वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

लघुकथा ---एक टके ------!

एक टके में बारह

सरोजा का मन आज घूमने में नहीं लगा मन खिन्न जो हो उठा था !सुबह तो बड़ी खुश थी !विशेष जन्मदिन की गुनगुनी धूप में वह सिर से पैर तक नहा चुकी थी !और इस अवसर पर हंसनी की तरह मोती ही मोती चुगना चाहती थी ! इसीलिये तो घूमने के लिए तैयार हुई तो अपने पति का इंतजार करने लगी ! वैसे तो दोनों ने नियम बना रखा था -सुबह उठकर बिना एक दूसरे की प्रतीक्षा किये घूमने निकल जाना ताकि सुखद बेला के साहचर्य से बंचित न होना पड़े !लेकिन आज वह सोचने बैठ गई --कौशल के साथ ही टहलने जाऊँगी !अकेला जाना मुझे अच्छा नहीं लगता ,उन्होंने कितने प्यार से मुबारक बाद दी है ! क्या मैं ५ मिनट इंतजार नहीं कर सकती !'

पल में ही बालू का टीला ढह गया और उसकी जगह हरे -भरे उद्यान ने ले ली !

उस दिन कौशल को तैयार होने में समय लग रहा था गत रात सोने में काफी विलंब हो गया था !सरोजा ने हँसकर कहा --'देखिए मैं आपका इंतजार कर रही हूँ ,मेरी जैसी कोई मिलेगी भी नहीं !'
'कौशल ने तपाक से कहा --'एक टके में बारह मिलेंगी !'
सरोजा अवाक !इन्द्र धनुषी निखार गायब होकर उसके मुखडे को स्याह कर गया !अस्फुट स्वर में बुदबुदाई -'ऐसा नहीं कहना था -----!'
कौशल के लिए 'आप ' शब्द का प्रयोग करने में भी उसे शर्म आ रही थी !
वह तुंरत कुर्सी से उठी और तेजी से पार्क की ओर कदम बढा दिये !विचारों के झंझावत में निश्चय नहीं कर पा रही थी कि कब तक पुरुष नारी को अपमानित करके उसे हीन समझता रहेगा !


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